आहत अरावली: सदियों पुरानी पर्वत शृंखला पर मंडरा रहा है संकट, दिल्ली-एनसीआर का अदृश्य प्रहरी खतरे में

दिल्ली-एनसीआर की हवा पहले से जहरीली और दमघोंटू है। लोगों का खुली हवा में सांस लेना तक इन दिनों दूभर है। अगर अरावली पहाड़ियां नहीं रहीं तो राजस्थान से आने वाली रेत और धूल की आंधी दिल्ली की हवा को अैर नर्क बना देगी। पर्यावरण विशेषज्ञों, डॉक्टरों का कहना है कि यह पर्यावरण ढाल के रूप में काम करती है। लगातार हो रहे खनन, पहाड़ियों के कटाव से यह प्राकृतिक दीवार कमजोर होती जा रही है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2025 में अरावली की परिभाषा बदल दी, जिसमें 100 मीटर से ऊंची जगहों को ही पहाड़ी माना जाएगा। इस आदेश से सिर्फ राजस्थान के 15 जिलों में 20 मीटर से ऊंची 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 (8.7 फीसदी) ही इस मानक को पूरा कर सकेंगी और 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा। इससे बड़े इलाकों में माइनिंग शुरू हो सकती है, जो पर्यावरणविदों को चिंता में डाल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला पर्यावरण की अनदेखी है। इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, क्योंकि इससे दिल्ली का प्रदूषण और बढ़ सकता है। दिल्ली-एनसीआर की हवा बचाने के लिए अरावली को संरक्षित करना जरूरी है वरना आने वाली पीढ़ियां जहरीली हवा में सांस लेंगी। जगी उम्मीद अरावली को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने सभी राज्यों में अरावली क्षेत्र में खनन पट्टे रद्द कर दिए। साथ ही, राज्य सरकारों को नए पट्टे जारी करने पर भी रोक लगा दी। सरकार ने स्पष्ट किया कि संरक्षित क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार अरावली के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है अब 7 जनवरी को सुनवाई से उम्मीद सुप्रीम कोर्ट में इसआदेश पर पुनर्विचार के लिए पूर्व वन संरक्षक डॉ. आरपी बलवान ने इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन भेजी है जिस पर सुनवाई सात जनवरी को है। अरावली विरासत जन अभियानने सुप्रीम कोर्टके आदेश पर पुनर्विचार याचिका के लिएहस्ताक्षर अभियानचलाया हुआ है।हरियाणा में अरावलीकी उपस्थिति मेवात, फरीदाबाद, पलवल, गुरुग्राम, महेंद्रगढ,रेवाड़ी, चरखी दादरी और भिवानी में है। तो घुटेगा दिल्ली-एनसीआर का दम अरावली पहाड़ियां राजस्थान से दिल्ली तक फैली हुई हैं और ये दिल्ली-एनसीआर के लिए फेफड़ों की तरह काम करती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, धूल दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में 30-40 फीसदी तक योगदान देती है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) की रिपोर्ट के अनुसार, सड़क की धूल अकेले पीएम10 के 65% तक जिम्मेदार हो सकती है। गुरु तेग बहादुर अस्पताल की यूसीएमएस रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग की प्रो. डॉ. अंकिता गुप्ता के अनुसार, प्रदूषण से सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं। अरावली की तबाही से जहरीली हवा फेफड़ों को नुकसान पहुंचाएगी, जिससे दिल और श्वसन रोग बढ़ेंगे। उन्होंने अरावली को बचाने के लिए अरावली ग्रीन प्रोजेक्ट की मांग की है, क्योंकि क्षतिग्रस्त इलाके दिल्ली के पीएम10 प्रदूषण में 15-20 फीसदी योगदान देते हैं और तापमान 1.5-2 डिग्री बढ़ा देते हैं। सुप्रीम आदेशों से ऐसे संरक्षित रही अरावली 30 नवंबर 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर किसी भी प्रकार के खनन पर रोक लगा दी थी। इससे पहले 1990 से 1999 तक पंचायत की कम्यूनिटी लैंड वन विभाग के पास थी। वन विभाग के गार्ड इसका संरक्षण कर रहे थे। वर्ष 1999-2000 में अरावली के साथ की जमीनें पंचायतों को दे दी गई। अवैध खनन की शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट के सेंटर्ड इम्पावर्ड कमेटी ने इसकी जांच कराई। शिकायत मिली कि खनन को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। 18 मार्च 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली के पास डीम्ड फॉरेस्ट पर वन अधिनियम 1980 के लागू होने का फैसला सुनाया था। इससे पहले 12 दिसंबर 1996 के गोदावर्मन निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने वन क्षेत्र की परिभाषा स्पष्ट करते हुए निर्देशित किया कि किसी प्रकार का मालिकाना हक वन भूमि को वन संरक्षण अधिनियम 1980 की अनुमति के बिना गैर वानिकी कार्यों के लिए प्रयोग नहीं किया जाएगा। राजस्थान में खत्म हो चुकी हैं 31 पहाड़ियां द अरावली इको सिस्टम मिस्ट्री ऑफ सिविलाइजेशन पुस्तक लिखने वाले डॉ. आरपी बलवान बताते हैं कि तर्क दिया जा रहा है कि राजस्थान में ऐसा आदेश 2006 से लागू है। सुप्रीम कोर्ट के सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार अरावली की 31 पहाड़ियां खनन से खत्म हो गईं। कमेटी ने राजस्थान के 15 जिलों को इससे प्रभावित बताया था। इस फैसले के बाद हरियाणा और दिल्ली से अरावली खत्म हो जाएगी। पर्यावरण के नुकसान को धता बताते हुए खनन से हर साल करीब 5000 करोड़ की रॉयलिटी विभिन्न माइनिंग कंपनियों को मिलती है। छेड़छाड़ हुई तो उजड़ जाएंगे गांव, बिगड़ जाएगा संतुलन अरावली पर्वत शृंखला आसपास बसी आबादी के लिए प्राकृतिक धरोहर के साथ हवा, पानी, आजीविका और सांस्कृतिक परंपराओं की रीढ़ है। फरीदाबाद में ही अरावली क्षेत्र के अंतर्गत करीब 20 गांव बसे हैं, जिनमें पाली, धौज, मांगर, सिलाखरी, मेवला महाराजपुर, अनखीर, बड़खल, कोट, सिरोही, खोरी जमालपुर, मोहबताबाद समेत कई गांव इस पर्वतमाला पर निर्भर हैं। मवेशियों के लिए चारा, पानी और खुले चरागाह अरावली से मिलते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि अरावली को नुकसान पहुंचा तो पशुपालन सबसे पहले प्रभावित होगा, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी। जंगली जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक तत्वों से होकर गुजरने वाला यह पानी मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ाता है। अरावली पर्वत शृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन रेंज में से एक है, जो मुख्य रूप से प्रोटेरोजोइक युग लगभग 2.5 अरब वर्ष पूर्व बनी हैं। इनका निर्माण टेक्टोनिक प्लेट्स के टकराव और ओरोजेनी (पर्वत निर्माण) प्रक्रियाओं से हुआ। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह भारतीय शील्ड का हिस्सा है, जो प्राचीन क्रेटॉन्स के टकराव से बना है। ऋषि पराशर की तपोभूमि फरीदाबाद से सटी अरावली की पहाड़ियों में पांच हजार साल पुराना परसोन मंदिर है। मंदिर के महंत का कहना है कि ऋषि पराशर की तपोभूमि है। मान्यता है कि महर्षि वेद व्यास का जन्म भी इसी स्थल पर हुआ था। उर्वरक की जरूरत नहीं कुछ किसानों का कहना है बारिश के मौसम में अरावली से नीचे उतरने वाला पानी इतना पोषक होता है कि फसलों में अलग से उर्वरक डालने की जरूरत नहीं पड़ती।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 26, 2025, 05:59 IST
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