हालात: खेतों में आग हुई कम, मगर हवा में धुआं ही धुआं, आंकड़ों के फेर में उलझ रही है दिल्ली के प्रदूषण की जंग
दिल्ली-एनसीआर की हवा में इन दिनों पराली के धुएं का हिस्सा भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन पिछले सात साल के आंकड़े पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट की तस्वीर दिखाते हैं। वर्ष 2020 में 15 सितंबर से तीन नवंबर के बीच दिल्ली के आसपास के सात राज्यों में पराली जलाने की 55,759 घटनाएं दर्ज की गई थीं। इसी अवधि में इस साल संख्या घटकर 4,333 रह गई है। सात साल में पराली जलाने की घटनाओं में करीब 92 फीसदी की कमी आई है। इस गिरावट के बीच कुछ राज्यों में चिंता बढ़ाने वाले रुझान भी सामने आए हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में पिछले साल के मुकाबले इस साल पराली जलाने की घटनाएं बढ़ी हैं। वहीं, पंजाब में सबसे ज्यादा गिरावट के बावजूद अब भी सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईएआरआई) की तीन नवंबर 2026 तक की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में इस साल पराली जलाने की कुल 4,333 घटनाएं दर्ज हुई हैं। वर्ष 2025 में इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 5,446 था। इस तरह एक साल में भी घटनाओं में करीब 20.4 फीसदी की कमी आई है। विशेषज्ञों को आंकड़ों पर संदेह पराली जलाने की घटनाओं में इतनी बड़ी गिरावट को लेकर विशेषज्ञों ने आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि जागरूकता और सरकारी प्रयासों से घटनाएं जरूर कम हुई होंगी, लेकिन आंकड़ों में आई इतनी बड़ी गिरावट की वास्तविकता की पड़ताल जरूरी है। आशंका है कि पराली देर शाम या ऐसे समय जलाई जा रही हो, जब सैटेलाइट की निगरानी में उसका पता न चल सके।यूनाइटेड नेशंस एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) के एक वैज्ञानिक के मुताबिक, नासा का सैटेलाइट करीब दोपहर 1:30 बजे पंजाब के ऊपर से गुजरता है। ऐसे में संभव है कि सैटेलाइट के गुजरने के समय पराली नहीं जलाई जा रही हो और बाद में आग लगाई जाती हो। इस वजह से सैटेलाइट से दर्ज घटनाओं की संख्या वास्तविक स्थिति से अलग हो सकती है। उनका कहना है कि पराली जलाने की घटनाओं के साथ जली हुई कृषि भूमि (बर्न्ट फार्मलैंड) के आंकड़े भी जारी किए जाने चाहिए। 2020 में सबसे ज्यादा, 2026 में सबसे कम घटनाएं : सात साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2020 के बाद 2021 में पराली जलाने की घटनाएं घटकर 27,543 रह गई थीं। 2022 में इनमें फिर बढ़ोतरी हुई और 29,740 मामले दर्ज हुए। इसके बाद 2023 में 21,199, 2024 में 10,024 और 2025 में 5,446 घटनाएं दर्ज की गईं। इस साल तीन नवंबर तक यह आंकड़ा और घटकर 4,333 रह गया। पंजाब में 95 फीसदी की गिरावट, फिर भी सबसे आगे पराली जलाने की घटनाओं में सबसे बड़ी गिरावट पंजाब में दर्ज की गई है। वर्ष 2020 में यहां 43,994 घटनाएं सामने आई थीं, जबकि इस साल इनकी संख्या घटकर 2,196 रह गई। यानी करीब 95 फीसदी की कमी आई है। इसके बावजूद पंजाब सातों राज्यों में सबसे ज्यादा पराली जलाने वाला राज्य बना हुआ है। खास बात यह है कि तीन नवंबर को अकेले पंजाब में पराली जलाने की 584 घटनाएं दर्ज की गईं। यह एक दिन में सातों राज्यों में सामने आई कुल घटनाओं का बड़ा हिस्सा था। इससे एक दिन पहले यानी दो नवंबर को पंजाब में महज 48 घटनाएं दर्ज हुई थीं।हरियाणा में भी तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है। वाहनों के जाम ने भी बढ़ाई चिंता आईसीएआर-आईएआरआई के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब में 31 अक्तूबर से तीन नवंबर के बीच पराली जलाने की घटनाओं में तेजी आई। तीन नवंबर को अकेले 584 जगह आग दर्ज की गई। इससे पहले 31 अक्तूबर और एक नवंबर को 292-292 घटनाएं दर्ज हुई थीं। आईआईटीएम के डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली के पीएम2.5 प्रदूषण में पराली के धुएं की हिस्सेदारी मंगलवार को करीब आठ फीसदी थी, जिसके बुधवार को 20 फीसदी से ऊपर पहुंचने का अनुमान जताया गया। उधर, दिल्ली में वाहनों की आवाजाही भी प्रदूषण की समस्या बढ़ा रही है। सीमावर्ती इलाकों से लेकर राजधानी के बाजारों तक जगह-जगह जाम की स्थिति बनी हुई है। द्वितीयक कण भी बढ़ा रहे प्रदूषण सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सीएई) में क्लीन एयर एंड सस्टेनेबिलिटी की प्रोग्राम मैनेजर शांभवी शुक्ला के मुताबिक, मौसमी परिस्थितियों में थोड़ा सुधार होने के बावजूद तापमान में गिरावट और हवा में नमी बढ़ने से अमोनियम नाइट्रेट जैसे एयरोसोल तेजी से बन सकते हैं। इसका सीधा असर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पर पड़ता है। शांभवी शुक्ला का कहना है कि हाल के दिनों में प्रदूषण बढ़ाने वाले किसी एक बड़े स्रोत की पहचान नहीं हुई है। पराली के धुएं की हिस्सेदारी में जरूर उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। दिल्ली की हवा पर गंभीर संकट दोगुने हुए प्रदूषण के हॉटस्पॉट दिल्ली में प्रदूषण ने अपने दायरा बढ़ा लिया है। मंगलवार शाम तक राजधानी के 11 निगरानी केंद्र गंभीर श्रेणी में थे, लेकिन बुधवार को इनकी संख्या बढ़कर 22 हो गई। यानी एक दिन में गंभीर प्रदूषण वाले इलाकों की संख्या दोगुनी हो गई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी सीपीसीबी के 59 निगरानी केंद्रों के आंकड़ों के मुताबिक, इनमें 32 केंद्रों पर हवा बहुत खराब और पांच पर खराब श्रेणी में रही। किसी भी केंद्र पर हवा मध्यम श्रेणी में दर्ज नहीं हुई। अच्छे श्रेणी में हवा का होना तो दूर की बात है। आईआईटी दिल्ली में सबसे ज्यादा एक्यूआई बुधवार को सबसे ज्यादा एक्यूआई आईआईटी दिल्ली में 455 दर्ज किया गया। यहां पीएम10 प्रमुख प्रदूषक रहा। मंगलवार शाम यह आंकड़ा 402 था। इस तरह यहां एक्यूआई में 53 अंक की बढ़ोतरी हुई। जहांगीरपुरी में 449, पंजाबी बाग में 446, मुंडका में 439, विवेक विहार में 436, डीटीयू में 434, रोहिणी में 432, अलीपुर और नरेला में 429 तथा सोनिया विहार में 427 एक्यूआई दर्ज किया गया। कम प्रदूषित इलाकों में भी तेजी से बिगड़ी हवा आंकड़ों में सबसे बड़ी चिंता उन इलाकों को लेकर है, जहां मंगलवार को प्रदूषण का स्तर तुलनात्मक रूप से कम था। लोधी रोड का एक्यूआई 212 से बढ़कर 295 पहुंच गया। छावला में 232 से 310, मैदान गढ़ी में 253 से 327 और श्री अरबिंदो मार्ग में 256 से 321 रहा। प्रदूषित हवा बिगाड़ रही सेहत, मरीज परेशान पूर्वी दिल्ली। दिल्ली की प्रदूषित हवा अब लोगों की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। सुबह की सैर से लेकर घर से बाहर निकलने तक प्रदूषण का असर लोगों की सांसों पर दिखाई दे रहा है। खासकर अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। अस्पतालों की ओपीडी में सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लगातार खांसी, सीने में जकड़न और सांस लेने में तकलीफ की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता की बात यह है कि प्रदूषण का असर अब केवल पहले से बीमार लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। सीनियर कंसल्टेंट (पल्मोनरी मेडिसिन) डॉ. राज कुमार के अनुसार, पिछले साल की तुलना में इस बार अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों की संख्या में करीब 10 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। प्रदूषण बढ़ने से पहले से सांस की बीमारी से जूझ रहे मरीजों की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि लोग अब स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं और लगातार खांसी या सांस लेने में परेशानी होने पर समय रहते अस्पताल पहुंच रहे हैं। खांसी, सीने में जकड़न और सांस फूलने की समस्या डॉ. राज कुमार बताते हैं कि प्रदूषण के कारण मरीजों में लगातार खांसी, गले में खराश, नाक में जलन, सीने में भारीपन और सांस फूलने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई मरीजों को सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज भी आती है। प्रदूषण के संपर्क में आने से अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों की बीमारी अचानक गंभीर हो सकती है। कुछ मामलों में उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ती है। लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है। बचाव के लिए बरतें सावधानी सुबह-शाम खुले में टहलने और दौड़ने से बचें जरूरी काम से बाहर निकलते समय एन95 मास्क पहनें घर में धूल और धुएं को कम रखें जरूरत के अनुसार एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें अस्थमा और सीओपीडी के मरीज दवाएं और इन्हेलर नियमित लें डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद न करें सांस फूलने या सीने में दर्द होने पर तुरंत चिकित्सकीय मदद लें
#CityStates #DelhiNcr #Delhi #AirPollutionDelhi #StubbleBurning #VaranasiLiveNews
- Source: www.amarujala.com
- Published: Nov 05, 2026, 02:07 IST
हालात: खेतों में आग हुई कम, मगर हवा में धुआं ही धुआं, आंकड़ों के फेर में उलझ रही है दिल्ली के प्रदूषण की जंग #CityStates #DelhiNcr #Delhi #AirPollutionDelhi #StubbleBurning #VaranasiLiveNews
