खोज: चंद्रयान-3 की मिट्टी का 1981 में पृथ्वी पर मिले उल्कापिंड से मिलान, सामने आई चौंकाने वाली जानकारी
चंद्रयान-3 के चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने के लगभग तीन साल बाद वैज्ञानिकों ने एक बड़ी खोज की है। उन्होंने पाया कि प्रज्ञान रोवर ने जिस मिट्टी की जांच की थी, उसकी रासायनिक बनावट उस पहले उल्कापिंड (पत्थर) से बहुत मिलती है, जिसे वैज्ञानिकों ने चंद्रमा से पृथ्वी पर आया हुआ माना था। यह खोज चंद्रयान-3 के 'शिव शक्ति स्टेशन' से मिले आंकड़ों को उस उल्कापिंड से जोड़ती है, जो साल 1981-82 में अंटार्कटिका के एलन हिल्स इलाके में मिला था। इसे चांद से आया पहला आधिकारिक उल्कापिंड माना जाता है। अध्ययन किसने किया यह अध्ययन भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) के वैज्ञानिकों द्विजेश रे, ऋषितोष के. सिन्हा, संतोष वी वडावले, एम षणमुगम और अनिल भारद्वाज ने किया है। इस शोध को अंतरिक्ष विज्ञान की एक वैज्ञानिक पत्रिका 'एनपीजे स्पेस एक्सप्लोरेशन में प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिकों ने प्रज्ञान रोवर के उस वैज्ञानिक यंत्र अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (एएपीएक्सएस) से मिले आंकड़ों की तुलना पृथ्वी पर मिले 66 चंद्र उल्कापिंडों से की। इनमें एएलएचए 81005 नाम का पत्थर सबसे अधिक मिलता-जुलता पाया गया। दोनों की रासायनिक बनावट चंद्रमा की दो अलग-अलग तरह की चट्टानों के बीच की श्रेणी में पाई गई। शिव शक्ति स्टेशन की मिट्टी में क्या पाया गया आंकड़ों के अनुसार, शिव शक्ति स्टेशन की मिट्टी में लगभग 26.1 प्रतिशत एल्यूमिनियम ऑक्साइड है, जबकि एलएचए 81005 पत्थर में यह 25.8 प्रतिशत है। यह मात्रा चंद्रमा के ऊंचे इलाकों में आम तौर पर मिलने वाले लगभग 29.6 प्रतिशत से कम है। वहीं, उतरने वाली जगह (लैंडिंग) की मिट्टी में लौह और मैग्नीशियम ऑक्साइड की कुल मात्रा 14.4 प्रतिशत है, जबकि उस पत्थर में यह 13.7 प्रतिशत है। यह चंद्रमा के ऊंचे इलाकों के औसत 8.15 प्रतिशत से लगभग दोगुनी है। हालांकि, इसरो ने साफ किया कि इसका यह मतलब नहीं है कि वह पत्थर चंद्रयान-3 के उतरने वाली जगह से ही आया था। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि दोनों चंद्रमा की सतह पर मौजूद एक जैसी मैग्नीशियम से भरपूर चट्टानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 के लैंडिंग के बाद उसके वैज्ञानिक यंत्र ने वहां की मिट्टी की जांच की। इसमें चंद्रमा के दूसरे ऊंचे इलाकों की तुलना में कम एल्यूमिनियम और ज्यादा लौह व मैग्नीशियम पाया गया। ये भी पढ़ें:तीन साल में चार गुना बढ़े बाघ:आखिर असम के नामेरी टाइगर रिजर्व में कैसे हुआ यह चमत्कार WII ने भी लगाई मुहर लैंडिंग स्थल की मिट्टी में मैग्नीशियम की चट्टानों का मिश्रण अध्ययन के अनुसार, लैंडिंग स्थल की मिट्टी केवल ऊपरी परत की नहीं है, बल्कि इसमें चंद्रमा की गहराई से ऊपर आई मैग्नीशियम से भरपूर चट्टानों का मिश्रण भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सामग्री दक्षिणी ध्रुव- ऐटकेन विशाल गड्ढे के बनने के समय ऊपर आई थी। यह सौर मंडल के सबसे बड़े टक्कर वाले गड्ढों में से एक है और चंद्रयान-3 के उतरने वाले स्थान से लगभग 350 किलोमीटर दूर है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अरबों साल पहले जब यह विशाल गड्ढा बना, तब चंद्रमा की गहराई में मौजूद चट्टानें बाहर निकलकर आसपास के इलाकों में फैल गईं। इन्हीं इलाकों में बाद में चंद्रयान-3 ने अध्ययन किया। इस अध्ययन से लूनर मैग्मा ओशन सिद्धांत को भी समर्थन मिलता है। इस सिद्धांत के अनुसार, शुरुआती समय में पूरा चांद पिघली हुई चट्टानों के विशाल महासागर से ढका हुआ था। समय के साथ यह ठंडा हुआ और अलग-अलग खनिजों से चांद की परतें और अंदरूनी संरचना बनी।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 03, 2026, 18:24 IST
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