Report: जेनेटिक्स-हार्मोन-केमिकल कलर से समय पूर्व झड़ रहे महिलाओं के बाल, आधुनिक सौंदर्य आदतें भी पड़ रही भारी

महिलाओं के बाल जिन्हें सदियों से सुंदरता, पहचान और आत्मविश्वास का प्रतीक माना गया आज वैश्विक स्तर पर एक जैविक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में बड़ी संख्या में महिलाएं अपेक्षाकृत कम उम्र में ही गंभीर हेयर लॉस का सामना कर रही हैं। यह समस्या केवल सौंदर्य या उम्र से जुड़ी नहीं, बल्कि जेनेटिक संरचना, हार्मोनल बदलाव, पोषण, तनाव और केमिकल हेयर ट्रीटमेंट्स के संयुक्त प्रभाव का नतीजा है जिसे आधुनिक विज्ञान अब आंकड़ों और प्रयोगों के जरिए स्पष्ट रूप से समझा रहा है। द अटलांटिस की रिपोर्ट के अनुसार बाल झड़ना एक कॉम्प्लेक्स बायोलॉजिकल फेनोमेनन है। रिपोर्ट में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) और जर्नल ऑफ इन्वेस्टिगेटिव डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित शोधों का हवाला देते हुए बताया गया है कि महिलाओं में बाल झड़ने का सबसे आम स्वरूप फीमेल पैटर्न हेयर लॉस है, जिसमें बाल पूरी तरह झड़ने के बजाय धीरे-धीरे पतले होते जाते हैं। यह प्रक्रिया अक्सर वर्षों तक चलती है और शुरुआती चरणों में पहचान में भी नहीं आती। ये भी पढ़ें:-Health Tips: 25 के बाद ये पांच टेस्ट कराने का डॉक्टर ने दिया सुझाव, तीन तो आप घर पर ही कर सकते हैं क्या कहती है रिपोर्ट, जानिए रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में बालों की मजबूती सीधे तौर पर एस्ट्रोजन हार्मोन से जुड़ी होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अध्ययनों का हवाला देते हुए रिपोर्ट बताती है कि एस्ट्रोजन बालों को लंबे समय तक ग्रोथ फेज में बनाए रखता है। गर्भावस्था के बाद, रजोनिवृत्ति के दौरान या हार्मोनल असंतुलन की स्थिति में जब एस्ट्रोजन घटता है, तब बड़ी संख्या में हेयर फॉलिकल्स एक साथ रेस्टिंग फेज में चले जाते हैं, जिससे अचानक तेज झड़ाव दिखाई देता है। रिपोर्ट में जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट और अमेरिका के ब्रॉड इंस्टीट्यूट के जेनेटिक अध्ययनों का उल्लेख है। इन अध्ययनों के अनुसार महिलाओं में बाल झड़ने से जुड़े कई जीन ऐसे होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। यदि परिवार में मां या नानी को कम उम्र में बाल पतले होने की समस्या रही हो, तो अगली पीढ़ी में इसका जोखिम सांख्यिकीय रूप से कहीं अधिक पाया गया है। हालांकि रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि जेनेटिक्स ट्रिगर नहीं, बल्कि प्रीडिस्पोजिशन है।असल गिरावट जीवनशैली से शुरू होती है। लंबे समय तक तनाव शरीर में बढ़ाता हैकोर्टिसोल का स्तर जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी और स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के शोधों का हवाला देते हुए रिपोर्ट बताती है कि लंबे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव शरीर में कोर्टिसोल का स्तर बढ़ाता है, जो हेयर फॉलिकल्स की सामान्य कार्यप्रणाली को बाधित करता है। इसके साथ-साथ आयरन, विटामिन डी और प्रोटीन की कमी बालों के झड़ने की गति को कई गुना बढ़ा सकती है। खासकर शहरी महिलाओं में जहां अनियमित खान-पान आम होता जा रहा है। ये भी पढ़ें:-Health Tips: शुगर और इंफेक्शन दोनों कम करता है करेला, पर खाने से पहले इन सावधानियों का भी रखें ध्यान बालों का झड़ना वैश्विक समस्या यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी की डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. एंटोनेला तोस्ती का कहना है कि महिलाओं में बाल झड़ना अचानक शुरू होने वाली समस्या नहीं, बल्कि वर्षों तक चलने वाली जैविक प्रक्रिया हैैं। हार्मोनल बदलाव विशेषकर एस्ट्रोजन में गिरावट, इस प्रक्रिया को तेज कर देते हैं। क्लीवलैंड क्लिनिक की वरिष्ठ डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. विल्मा बर्गफेल्ड चेतावनी देती हैं कि आधुनिक सौंदर्य आदतें बालों की सेहत पर भारी पड़ रही हैं। महिलाओं में आयरन की कमी, थायरॉयड असंतुलन और लंबे समय तक रहने वाला तनाव ये तीनों कारक मिलकर बालों के झड़ने को वैश्विक समस्या बना रहे हैं, जिसे केवल कॉस्मेटिक समाधान से नहीं रोका जा सकता।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 06, 2026, 03:35 IST
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