Kaithal News: टूरिज्म हब के रूप में विकसित होगी पानी से चलने वाली चक्की

विक्रम पूनिया कैथल। सिंचाई विभाग पूंडरी में सिरसा ब्रांच पर अंग्रेजों के जमाने में बनी पानी से चलने वाली चक्की का 35 लाख रुपये से कायाकल्प करेगा। विभाग की ओर से पनचक्की को नया स्वरूप देते हुए टूरिज्म हब बनाने का प्रयास किया जाएगा। नहरी पानी से चलने वाली ये चक्की 1890 से संचालित की जा रही है। यह हरियाणा की एक मात्र पानी से चलने वाली चक्की है। सिंचाई विभाग इसको एक धरोहर के रूप में विकसित करने का प्रयास कर रहा है। पन चक्की का पूरा क्षेत्र करीब डेढ़ एकड़ है। अब इस डेढ़ एकड़ में पहले कच्चे पड़े एरिया को ब्लॉक लगाकर पक्का किया जा रहा है, ताकि पार्किंग बनाई जा सके। साथ ही चारदीवारी और गेट लगाने का कार्य भी किया जा रहा है। वहीं वेटिंग रूम में टायल लगाते हुए इसको वातानुकूलित बनाया जाएगा, ताकि आटा पिसवाने वाले लोग आराम से बैठ सकें। वहीं पहले आटा जमीन पर गिरता था और अब उस कमरे में टाइल लगाते हुए मशीनों के जरिए आटा को सीधा कट्टों में डालने की व्यवस्था की जाएगी ताकि हाथ न लगे। वहीं आटा पिसाई के कार्य में लगे ठेकेदार के कर्मचारियों के लिए भी टॉपी और दस्ताने अनिवार्य किए जाएंगे। ग्राहकों के आने जाने का रास्ता भी अलग होगा और कर्मचारियों का अलग। पहले खराब हालत में पड़े दो कमरों को अब एग्जीबिशन कम-म्यूजियम के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां पर विभाग के पास पहले से संरक्षित पुराने फोटो व पन चक्की की तकनीक को दर्शाने वाले चित्र लगाए जाएंगे, ताकि कोई भी व्यक्ति इस एग्जीबिशन रूम या म्यूजियम का भ्रमण कर आसानी से इसके चलने की प्रक्रिया को समझ सके। बॉक्स एक घंटे में 2 क्विंटल आटे की हो जाती है पिसाई पन चक्की पर 5 चक्की एक ही समय पानी से घूमने वाली टर्बाइन के जरिए चलती हैं। एक चक्की की क्षमता प्रति घंटा 40 किलो की है और पांच चक्की काम कर रही हैं तो एक घंटे में करीब 2 क्विंटल आटे की पिसाई हो जाती है। पूंडरी के नजदीक सिरसा ब्रांच पर स्थित इस चक्की को वर्षों से एक ही परिवार चलाता आ रहा है। हालांकि सिंचाई विभाग हर बार बोली के जरिए ही ठेका छोड़ता है, लेकिन दूसरे लोगों के पास इसको चलाने का अनुभव नहीं तो उनके लिए यह काम मुश्किल हो जाता है। कुछ वर्ष पहले गांव नैना के एक व्यक्ति ने बोली लगाकर इसका ठेका तो ले लिया था, लेकिन वे इसको चला नहीं पाया था। --------ठंडा आटा महीनों तक नहीं होता खराब पन चक्की में अनाज को पानी की धारा से चलने वाले पाटों के बीच अपेक्षाकृत कम गति पर पीसा जाता है। इस प्रक्रिया में घर्षण कम होने के कारण आटे का तापमान अधिक नहीं बढ़ता। इसी वजह से इसे ठंडा आटा भी कहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कम तापमान पर पिसाई होने से गेहूं में मौजूद प्राकृतिक तेल, सुगंध और कुछ संवेदनशील पोषक तत्व अपेक्षाकृत बेहतर बने रहते हैं। वहीं, तेज गति से चलने वाली इलेक्ट्रिक चक्कियों में अधिक घर्षण के कारण आटा गर्म हो जाता है। यदि ऐसा आटा नमी या गर्म वातावरण में रखा जाए तो उसमें बासीपन, कीड़े लगने या खराब होने की संभावना अपेक्षाकृत जल्दी बढ़ सकती है। बॉक्स इसी सिद्धांत पर डैम में बनती है बिजलीसिंचाई विभाग के कनिष्ठ अभियंता तुषार शर्मा बताते हैं कि पन चक्की और जलविद्युत परियोजनाएं एक ही वैज्ञानिक सिद्धांत पर काम करती हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि पन चक्की में बहते पानी की ऊर्जा से चक्की के पाट घुमाकर आटा पीसा जाता है, जबकि बड़े डैम में यही बहता पानी विशाल टर्बाइन घुमाता है। टर्बाइन से जुड़ा जनरेटर उस घूर्णन को बिजली में बदल देता है। आसान शब्दों में समझें तो बहते पानी की ऊर्जा से टर्बाइन का घूमना और काम या बिजली का उत्पादन। पन चक्की में यह ऊर्जा आटा पीसने के काम आती है, जबकि डैम में इसी सिद्धांत से बिजली तैयार की जाती है। इसलिए पन चक्की को जल ऊर्जा के सबसे पुराने और सरल उदाहरणों में से एक माना जाता है। संवादवर्जनये सिर्फ एक पन चक्की नहीं, बल्कि एक धरोहर है जिसका जिम्मा सिंचाई विभाग के पास है। उनके प्रयास हैं कि 100 वर्षों से भी पुरानी इस धरोहर को अब न सिर्फ बेहतर ढंग से चलाया जाए, बल्कि इसको हाईजीनिक तरीके से संचालित कर टूरिज्म हब के रूप में विकसित किया जाए। इसी सोच के साथ एक संस्था के सहयोग से करीब 35 लाख रुपये खर्च कर इसको नया स्वरूप देने के प्रयास हैं। जब ये पूरी तरह से तैयार हो जाएगी तो स्कूली बच्चों के साथ साथ आम व्यक्ति भी यहां भ्रमण कर सकेंगे। - नीरज शर्मा, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग, कैथल। अधीक्षण अभियंता नीरज शर्मा। संवाद अधीक्षण अभियंता नीरज शर्मा। संवाद अधीक्षण अभियंता नीरज शर्मा। संवाद अधीक्षण अभियंता नीरज शर्मा। संवाद

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 14, 2026, 02:30 IST
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