स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्यांकन का पैमाना बदले, चिकित्सीय लापरवाही पर सख्त जवाबदेही जरूरी
राजधानी लखनऊ के लोकबंधु अस्पताल में जब प्रसव पीड़ा से छटपटाती एक महिला पहुंची, तो पहले उसे टरकाने की कोशिश की गई, फिर काफी चिरौरी करने के बाद दाखिल किया भी गया, तो उसे अपने हाल पर छोड़ दिया गया। लेबर रूम पहुंचने से पहले ही लापरवाही के चलते प्रसव के दौरान ही बच्चा जमीन पर गिरकर मर गया। दूसरा मामला प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में अधिवक्ता जागृति शुक्ला की मौत का है, जिसके बाद रेजीडेंट डॉक्टरों और वकीलों के बीच हुई हिंसक झड़प ने एक बार फिर चिकित्सकीय लापरवाही के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। इससे पहले लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में अनदेखी के कारण एक मरीज का हाथ काटना पड़ा था। शिकायत के बाद संविदा पर कार्यरत एक स्टाफ नर्स को हटाकर कार्रवाई का संदेश देने की कोशिश की गई। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी कार्रवाई से समस्या खत्म हो जाती है या यह सिर्फ व्यवस्था की खामियों पर पर्दा डालने का एक आसान तरीका है। सच यह है कि चिकित्सकीय लापरवाही अब इक्का-दुक्का घटनाओं तक सीमित नहीं रह गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में चिकित्सकीय लापरवाही के 118 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 869 हो गई। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें 458 मामले अकेले उत्तर प्रदेश से दर्ज हुए, जो कुल मामलों का लगभग 52.70 प्रतिशत हंै। उत्तर प्रदेश में आज 81 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं। वर्ष 2017 की तुलना में एमबीबीएस सीटों की संख्या लगभग 4,500 से बढ़कर 12,500 हो चुकी है। सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं का विस्तार हुआ है और चिकित्सा ढांचे पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता केवल अस्पतालों की संख्या, भवनों की भव्यता से नहीं मापी जाती। उसकी सबसे बड़ी कसौटी मरीज की सुरक्षा, उपचार की गुणवत्ता और जनता का भरोसा है। यदि चिकित्सकीय लापरवाही के सर्वाधिक मामले अकेले उत्तर प्रदेश से सामने आ रहे हैं, तो यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न है। विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश मामलों में ऑपरेशन के दौरान हुई तकनीकी त्रुटियां, शरीर के भीतर सर्जिकल उपकरण छूट जाना, गलत दवा या गलत मात्रा देना, संक्रमण नियंत्रण में लापरवाही, आईसीयू प्रबंधन की कमजोरियां, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की कमी, पैरामेडिकल कर्मियों का अपर्याप्त प्रशिक्षण तथा समन्वय का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। कई अस्पतालों में डॉक्टरों व कर्मचारियों पर अत्यधिक कार्यभार भी रहता है, जिससे गलतियों की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए प्रत्येक गंभीर घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष व वैज्ञानिक जांच हो। यह तय किया जाए कि गलती व्यक्तिगत थी या संस्थागत। यदि अस्पताल में पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ नहीं था, आवश्यक उपकरण समय पर नहीं मिले, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (5 अगस्त, 2005) मामले में स्पष्ट किया था कि चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में किसी डॉक्टर की गिरफ्तारी विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की जांच के बिना नहीं होनी चाहिए। सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में ये मेडिकल बोर्ड कितनी सक्रियता व पारदर्शिता से काम कर रहे हैं क्या प्रत्येक संदिग्ध चिकित्सकीय मृत्यु का स्वतंत्र मेडिकल ऑडिट होता है यदि नहीं, तो यह व्यवस्था तत्काल विकसित की जानी चाहिए। इसी प्रकार क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट अस्पतालों के लिए बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित स्टाफ, संक्रमण नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं के न्यूनतम मानक निर्धारित करता है। इन मानकों का ईमानदारी से पालन कराया जाए। अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्यांकन का पैमाना बदले। उपलब्धियों का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने मरीज सुरक्षित उपचार प्राप्त कर घर लौटे, कितनी शिकायतों का निष्पक्ष निस्तारण हुआ और कितनी संस्थाओं ने गुणवत्ता के निर्धारित मानकों का पालन किया। उत्तर प्रदेश यदि वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनना चाहता है, तो उसे आधारभूत ढांचे के विस्तार के साथ-साथ गुणवत्ता, जवाबदेही, पारदर्शिता और मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। चिकित्सकीय लापरवाही की प्रत्येक घटना को केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार का अवसर माना जाना चाहिए। edit@amarujala.com
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 13, 2026, 03:01 IST
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