बेंथम, रोनाल्डो और कामू: फुटबॉल का खेल सिखाता है जीत ही सब कुछ नहीं

क्या फुटबॉल भी अपने साथ कोई दर्शन लेकर आता है क्या इस खेल के खिलाड़ी कभी दार्शनिक की तरह ड्रिबल करते हैं शायद हां, क्योंकि फुटबॉल वर्ल्ड कप में जीत-हार के बीच का फासला, किसी भी खिलाड़ी को जीवन भर के लिए या तो विजेता या चुका हुआ बना सकता है। इस वर्ल्ड कप में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। संसार कुछ खिलाड़ियों को अनुपयोगी बनाने पर लगा हुआ है। आखिरकार इस युग में जो जीतता है, वह खुद के लिए और समाज के लिए भी बेंथम के उपयोगिता सिद्धांत को साबित करता है, लेकिन जो हार जाता है या टीम को जीत की दहलीज पर लाने से चूक जाता है, उसे पूरी दुनिया चुका हुआ साबित करने में लगी रहती है। दुनिया के सबसे चर्चित खिलाड़ियों में शुमार, पुर्तगाल के रोनाल्डो की टीम जब वर्ल्ड कप से बाहर होती है, तो उसके साथ रोनाल्डो का भी सपना टूटता है, क्योंकि उनके रहते पुर्तगाल वर्ल्ड कप नहीं जीत पाया। लेकिन इस घटना ने पूरे संसार में यह बहस छेड़ दी कि रोनाल्डो अब अनुपयोगी या कमतर हो गए। वहीं ब्राजील के नेमार भी अपना अंतिम वर्ल्ड कप खेल रहे थे, लेकिन अपनी टीम को पराजय से उबार नहीं पाए। पुर्तगाल वर्ल्ड कप से बाहर हो गया और ब्राजील भी। और इसके साथ ही वह सब कुछ समाप्त हो गया, जिसे रोनाल्डो या नेमार के साथ फुटबॉल ग्राउंड पर होना था। वह ऊर्जा, वह ड्रिबल, वह फ्री किक, वह सब कुछ, जो उनके मुल्क की टीम की पराजय के बाद मौन हो गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी रोनाल्डो को वे प्रश्न ढूंढते रहे, जो उनको अनुपयोगी साबित करने पर तुले थे। प्रश्न यह है कि क्या हार पूरे व्यक्ति को कुछ ही पलों में निरर्थक बना देती है अगर हां, तो फिर सिर्फ निराशा हाथ आती है और जीवन के प्रति वह उत्साह नहीं रह जाता। लेकिन फुटबॉल का दर्शन उस पराजय से उबरने की सलाह देता है। बीसवीं सदी के महानतम साहित्यकारों और दर्शनिकों में से वह एक रहे और फुटबॉल में गोलकीपर की भूमिका उन्हें बहुत भाती थी। यहां तक कि वह अपने दर्शन का सफर भी उस गोल पोस्ट के बीच खड़े होकर तय कर लेते थे। वह मानते थे कि जीवन एक गोल पोस्ट है। वह कहते हैं, 'मैंने यह सीखा कि जब-जब आप गेंद को अपने पास आने की उम्मीद करते हैं, वह आपके पास नहीं आती। तो क्या हुआ खुद को बिना ईश्वर जैसा महसूस किए जीता जा सकता है और खुद को बिना कचरा जैसा महसूस किए हारा भी जा सकता है। मैंने पाया कि किसी भी तरह का कौशल बहुत आसानी से नहीं प्राप्त किया जा सकता।' उन्हें मात्र चवालीस साल की आयु में साहित्य का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार मिला और रूडयार्ड किपलिंग के बाद इस सम्मान को हासिल करने वाले वह सबसे युवा लेखक भी बने। वह अस्तित्ववादी भी माने गए। वह और कोई नहीं, अल्बैर कामू हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैंने इस लेख में महान कामू को क्यों याद किया है। वह इसलिए कि कामू ने फुटबॉल के खेल से दर्शन में प्रश्नों का उत्तर ढूंढा। जहां एक ओर हमारा देश चीन को पीछे छोड़कर अब दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन चुका है और उसकी आबादी 142.86 करोड़ पहुंच गई है तथा मौजूदा समय में हमारे देश की जनसंख्या की औसत आयु करीब 28.2 वर्ष है, वहीं दूसरी ओर इस देश के युवा को मानो किसी की नजर लग गई है। वह सिर्फ और सिर्फ अपने को उपयोगी बनाने में लगा हुआ है। कॉलेज के दाखिले में उसका पहला सवाल उस एकेडमिक ईयर के अंतिम पड़ाव के लिए होता है और वह होता है प्लेसमेंट। वह उन कॉलेजों की दीवारों की साख उस प्लेसमेंट के फैक्ट्स और सीटीसी से आंकता है और गर उसका दाखिला वहां नहीं होता, तो वह फिर खुद को अनुपयोगी मानने लगता है। यानी प्लस टू के बाद से प्रतिशत, प्लेसमेंट और रैंकिंग की दौड़ लिए वह इंजीनियरिंग, मेडिकल, सिविल सर्विसेज की दौड़ में अपने आप को प्रतिशत से ज्यादा कुछ नहीं समझ पाता है। अगर जीवन फुटबॉल का मैदान है, तो वह सिर्फ गोल करना चाहता है, गोल खाना नहीं। और जब कोई छात्र असफल होता है, तो जीवन त्याग देता है। कामू आगे अपने निबंध द मिथ ऑफ सिसिफिस में लिखते हैं, आत्महत्या अपने आप मंे सबसे बड़ी फिलॉसॉफिकल प्रॉब्लम है। वह आत्महत्या को पूरी तरह नकारते हैं और मानते हैं कि जीवन का अर्थ मृत्यु में नहीं, बल्कि सिर्फ जीवन में ही है और जिंदगी का अर्थ और उसकी अहमियत जीवन के ही साथ समझी जा सकती है। नेमार हों या रोनाल्डो, फुटबॉल के ये सारे दिग्गज उस हार के बाद बच्चों की तरह फूट-फूटकर रोते नजर आए। लेकिन उनकी बातों से यह तनिक भी नहीं लगा कि वे चुक गए या चूक गए। स्पोर्ट्स के एथिक्स को मानो वे अपनी धमनियों में उतार चुके थे। और स्पोर्ट्स हमें नफरत पोषित करना नहीं सिखाता। निराशा मन में बैर भी लाती है, पर वे महान खिलाड़ी तो अपने प्रतिद्वंद्वी से हाथ मिला रहे थे। स्पेन के खिलाफ विश्वकप से बाहर होने के बाद, रोनाल्डो ने भावुक होते हुए कहा कि वह पूरी तरह से संतुष्ट मन से विदा ले रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मुझे पूरा विश्वास है कि मैंने अपना सब कुछ दे दिया है, इसलिए मैं बिल्कुल शांत और संतुष्ट मन से यहां से जा रहा हूं।' मुझे लगता है कि फुटबॉल के मैदान में दौड़ता यह दर्शन उन सारे युवाओं को यह सीख दे पाएगा कि महान मेसी से भी पेनल्टी किक मिस हो सकती है; लेकिन खेल के अंतिम मिनटों में वही फील्ड गोल भी कर डालते हैं। इसलिए पराजय या अनुपयोगी होने का भाव तो सबसे सफल खिलाड़ियों के भी हिस्से आता है, पर वह उनके इरादे और कौशल को ग्रहण नहीं लगा पाता। गर वे पराजित हो भी गए, तो भी फुटबॉल के दर्शन को सुनते और समझते हैं। जैसा कि कामू भी कहते हैं कि गेंद कभी उस दिशा से नहीं आती, जहां से आप उम्मीद करते हैं। जीवन एक गोल पोस्ट की तरह है और मुसीबत में सारा दारोमदार गोलकीपर पर आ जाता है, क्योंकि उसे ही गोल बचाना होता है। तो बस आप भी जिंदगी के मैदान में ड्रिबल भी करिए, पास भी दीजिए, गोल करिए और गोलकीपर की तरह गोल बचाइए भी, लेकिन पराजय के बाद खुद को अनुपयोगी न मानिए। आखिरकार रोनाल्डो भी कहते हैं कि हार के बाद भी आगे बढ़ना है और आगे बढ़ते रहना ही फुटबॉल का दर्शन है।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 13, 2026, 03:01 IST
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