जेपी पर विशेष: उत्तर प्रदेश या बिहार... सिताबदियारा से जुड़ा उल्लेख कहां, मौजूदा घर की जमीन किसके अधीन थी?
जेपी के जीते-जी कभी सवाल नहीं उठा कि जेपी कहां जन्मे उनके न रहने के लगभग ढाई दशकों बाद तक भी, यह प्रसंग कभी चर्चा का विषय नहीं बना। वर्ष 2007 के बाद तरह-तरह के नए दावे होने लगे। किसी ने लिखा, जेपी, शाहाबाद के अमुक इलाके में पैदा हुए। इसका आधार बताया कि उनके पिता हरसुदयाल जी, नहर विभाग में (शाहाबाद) पोस्टेड थे। फिर नया प्रसंग उठा जेपी सिताबदियारा में कहां पैदा हुए उत्तर प्रदेश में या बिहार में ये सभी प्रसंग 2008-09 के बाद के ही हैं। खासतौर से चंद्रशेखर जी व जगदीश बाबू (आजीवन जेपी के सहयोगी) के जाने के बाद। जेपी की सबसे पहली जीवनी 'जयप्रकाश' (1947) लिखी थी, बड़े साहित्यकार, रामवृक्ष बेनीपुरी ने। आजादी की लड़ाई में वह जेपी के समाजवादी साथी थे। जेपी के निजी मित्रों में से जेपी पर कई लोगों ने लिखी। इसमें हिंदी के जानेमाने साहित्यकार लक्ष्मीनारायण लाल भी हैं, ('जयप्रकाशः असाधारण विद्रोही')। इस तरह हिंदी व अंग्रेजी में जेपी पर कई किताबें हैं। हाल में 'द ड्रीम ऑफ रेवोल्यूशनः ए बायोग्राफी ऑफ जयप्रकाश नारायण' (वर्ष जन्म 1 जेपी 2021, प्रकाशक-विंटेज) आई। प्रो. बिमला प्रसाद और सुजाता प्रसाद द्वारा लिखित यह उनके जीवन की प्रामाणिक और विस्तृत अद्यतन जीवनी है। जेपी कहां जन्मे इसमें इसका प्रामाणिक उल्लेख हैं। जेपी के आजीवन साथी व सहयोगी रहे, जगदीश बाबू। 1942 में जेपी हजारीबाग जेल से भागे पांच साथियों के साथ। इसके योजनाकारों में से एक थे जगदीश बाबू। जेपी का सारा काम वही देखते व संभालते थे निजी व सार्वजनिक। उनके गांव (सिताबदियारा) का घर संभालते हुए, वहीं रह कर। जेपी मृत्यु की खबर उन्होंने ही सबको दी। जेपी का मौजूदा निवास (जयप्रकाश नगर, बलिया) अब ट्रस्ट है। यह ट्रस्ट चंद्रशेखर की पहल पर बना 1982-85 के बीच। वहां रहते हुए बनवाया जगदीश बाबू ने। उन दिनों चंद्रशेखर भी लगातार वहां रहे। वर्ष 2003 (5 मई) को जगदीश बाबू नहीं रहे। जेपी पर आधुनिक गुरू या ज्ञान स्रोत गूगल पर विरोधाभासी सूचनाएं हैं। विरोधी तथ्य, असलियत से दूर। न प्रशासन, छपरा (बिहार) या बलिया (उत्तर प्रदेश) के पास ठोस जानकारी है। हालांकि सिताबदियारा के हमारी उम्र के लोग, जो 60 से 90 के दशकों में जन्मे, उन्हें पता है। पुरखों से बचपन में जानकारी मिली कि मौजूदा घर तीसरा है। पहले के दो घर गंगा-सरयू के कटाव में दरियाव (नदी) का हिस्सा बन चुके हैं। इस पुराने गांव सिताबदियारा से हमारे पुरखों का बड़ा ममत्व व लगाव था। 19वीं व 20वीं सदी के बीच से 1890-1909 के बीच आठ फेजो में छपरा-बनारस रेल लाइन पूरी हुई। इस रेल लाइन-पुल निर्माण से गांव के कटने की स्थिति बनी। ठेकेदारों ने ऑफिशियल प्रस्ताव दिया कि गांव के लोग एक लाख रुपये जमा कर हमें दें। इस राशि से वे ठोकर बांध बनवाकर इस गांव के न कटने की मुकम्मल व्यवस्था सुनिश्चित कर देंगे। पर जिस गांव में एक फसल होती थी, वह गांव उस जमाने में (1890 से 1912) में कहां से एक लाख देता अंततः वह पुराना सिताबदियारा नदी का हिस्सा बनकर अतीत हो गया। गांव सिताबदियारा गांव का नाम सिताबदियारा है। यह गांव दो नदियों 'गंगा और घाघरा' के बीच है। उत्तर प्रदेश और बिहार के दो राज्यों के तीन जिलों, बलिया (उप्र), सारण (छपरा-बिहार) और भोजपुर (आरा-बिहार) के बीच। दीयर का इलाका जहां एक ही फसल होती थी। गरीबी का आलम था कि चूहों के बिल से अनाज निकालते लोगों को हमने बचपन में देखा था। अपने पुरखों-पिता से ही जाना कि शुरू में सिताबदियारा गांव 27 टोले में था। तब यह इलाका छपरा (बिहार) जिले में था। इस पुराने गांव में जेपी के पुरखे रहते थे। जयप्रकाश जी के घर ही गांव का इकलौता पोस्ट-ऑफिस था प्राइमरी स्कूल था। पुरखों से ही जाना जेपी का जन्म, पुराने लाला टोले के नदी में ढहने से पहले ही हुआ। पर छपरा वाले मूल लाला टोले में नहीं, बलिया में पड़ने वाले 'बबूरवानी' में। कारण, उस वर्ष प्लेग आया था। प्लेग से बचने के लिए गांव के लोगों ने अलग-अलग शरण ली। इस कारण जेपी का परिवार बलिया वाले इलाके में गया, बबूरवानी में। बाद में इसका नाम जयप्रकाश नगर हुआ। चंद्रशेखर के रहने तक 12 फरवरी (जेपी ने गांधी स्मृति में हर साल इस आयोजन की शुरुआत की थी) व 11 अक्तूबर (जेपी का जन्मदिन) बड़े उत्सव बन गए। रिश्ता जगदीश बाबू का जेपी के मौजूदा घर की जमीन डुमरांव महाराज के अधीन थी। जयप्रकाश जी के परिवार ने पुराना लाला टोला (छपरा) में रहते हुए ही सिताबदियारा के दक्षिण हिस्से (बलिया) में जमीन ली थी। जयप्रकाश जी प्रायः पार्टी काम से छपरा आते। एक बार आए तो उन्हें विदा करने के लिए जगदीश बाबू रिविलगंज घाट गए। इसी घाट से सरयू नदी पार कर सिताबदियारावासी पैदल या बैलगाड़ी से अपने गांव पहुंचते थे। नाव पर जयप्रकाश जी, प्रभावती जी वगैरह को बैठा दिया। अचानक जेपी बोल पड़े- रऊआ हमरा गांवें चलीं न ! (आप हमारे गांव चलें)। जगदीश बाबू बोले, हम त रऊआ के विदा करे आइल बानी। हम त कपड़ा-लता कुछ नइखी लेले। (मैं तो आपको विदा करने के लिए आया था। हमने तो कपड़ा वगैरह भी नहीं रखा है)। इसके तुरंत बाद प्रभावती जी बोल पड़ीं-ना-ना रऊआ चलीं। हमार गांव एक बार देख आईं (नहीं, आप चलें, एक बार हमारा गांव देख लीजिए)। पटना लौटने से पहले जेपी ने जगदीश बाबू से कहा, 'रऊआ कुछ दिन रहके हमार ई घरवा बनवा दीं। देखत बानी ढहत बा' (कुछ दिन रुक कर आप हमारा घर बनवा दें। देख रहे हैं, ढह रहा है)। फिर जेपी ने शायद 5 हजार रुपये दिए। जेपी के घर रहते जगदीश बाबू आधुनिक तरीके से उनकी खेती भी कराते थे।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Nov 03, 2026, 07:03 IST
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