जेपी की अंतिम गांव यात्रा और खर्च पर सवाल: गांव छोड़ने से पहले चंद्रशेखर से कहा- 'हमार गइयां देखत रहिह'

जीवन के अंतिम दिनों में जेपी कब अपने गांव आये इसका मार्मिक प्रसंग है। साल 1978। चंद्रशेखर ने कहा- अब जेपी की इच्छा व ललक है, एक बार अपना घर देखूं। तब जेपी की डायलिसिस होती थी। एक दिन अंतराल पर। वह कठिन प्रक्रिया होती। डायलिसिस के दिन सुबह से शाम तक, वह थके रहते। अशक्त व श्लथ। उन दिनों सड़क मार्ग से पटना से गांव (महज 110-120 किलोमीटर) की दूरी तय करने में एक या दो दिन लगते। नदियों को पार कर, फिर गांव पैदल या बैलगाड़ी की यात्रा कर। चंद्रशेखर ने कहा, हेलिकॉप्टर के प्रबंध में हूं। बिहार सरकार से भी कहा हूं। उत्तर प्रदेश सरकार से भी। तब तक बिहार और उप्र में जनता पार्टी की सरकार बन चुकी थी। बिहार में कर्पूरी जी मुख्यमंत्री थे। उप्र में रामनरेश यादव। इस तरह अंतिम बार 1978 में जेपी गांव आये। हेलिकॉप्टर से। शायद पहली बार कोई हेलिकॉप्टर गांव आया हो। जेपी के साथ आये, उनके निजी मित्र वीपी कोइराला, कर्पूरी ठाकुर, रामनरेश यादव, चंद्रशेखर साथ थे। गांव के लोगों के घर ही सब अलग-अलग रूके। जेपी एक दिन रह पाये। कई दिनों पहले ही जगदीश बाबू जेपी के पटना घर से गांव आ गए थे। जेपी की इस यात्रा के प्रबंध में। जगदीश बाबू ने डायलिसिस की ट्रेनिंग ली। जेपी की डायलिसिस के लिए। बीमारी में जसलोक अस्पताल (मुंबई) में साथ रहे। जेपी की इस अंतिम गांव यात्रा का प्रबंध भी उन्होंने ही किया। जेपी की 1978 यात्रा के दौरान गांव में एक बड़ी सभा हुई। जेपी के घर व आश्रम पर। गांव से तब बड़े-बुजुर्ग, पुराने लोग बड़ी संख्या में जेपी से मिलने आये। जेपी सबसे मिले। अश्रुपूरित आंखों से। उन्हें और मिलने वाले दोनों पक्षों को एहसास था कि शायद जेपी की यह अंतिम गांव यात्रा है। गांव से विदा होने के पहले (1978) चंद्रशेखर से जेपी ने कहा, 'तनी हमारा गइयां घूमा दैब' (यानी हेलिकॉप्टर से हमारा पूरा गांव सिताबदियारा एक बार दिखा दें)। ऐसा ही हुआ। फिर गांव छोड़ने से पहले चंद्रशेखर से कहा- 'हमार गइयां देखत रहिह'। (यानी हमारे गांव का ध्यान रखिएगा) प्रो. विमला बाबू व सुजाता प्रसाद जी की पुस्तक में 'लाला टोला' में जेपी के जन्म का भी उल्लेख है। स्वाभाविक है, प्रो. बिमला प्रसाद व सुजाता प्रसाद की इस पुस्तक पर कोई सवाल कर दे, बिना आधार, बगैर तथ्य। ऐसी स्थिति में सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं, खुद जेपी। वे अपने जन्म के बारे में खुद क्या बता गये हैं सच और तथ्य अलग नहीं हो सकते। अपनी राय, मान्यता व विचारधाराएं भिन्न होती हैं, होनी चाहिए। पर ऐतिहासिक तथ्यों-सच के साथ, छल व राजनीति, भविष्य, देश व समाज के साथ बड़ा अपराध है। जेपी का जन्म जेपी से कई दशकों तक जुड़े रहने वाले व उनके आत्मीय रहे प्रो। विमला प्रसाद की जेपी की जीवनी में सबसे प्रामाणिक तथ्य है कि जेपी कहां जन्मे इसके पहले अध्याय, 'The Formative Years' का एक अंश हैं। 'यह पुराना 'लाला टोला' (पुराना सिताबदियारा) के संदर्भ में है, जो बाद में सिताबदियारा के अन्य टोलों के साथ 'घाघरा' सरयू में चला गया। कटाव व ढाह के कारण। पर इस घर के कटाव के पहले ही, यह गांव (पुराना सिताबदियारा) या टोला (पुराना लाला टोला) रहते ही जेपी का जन्म, उत्तर प्रदेश के बलिया वाले इलाके में हुआ। गांवों में लोग इसे 'छावनी या डेरा' कहते थे। जेपी के जन्म के समय ही (1902) गांव में प्लेग फैला। गांव के लोग, गांव खाली कर इधर-उधर चले गये। उन्हीं दिनों जेपी का परिवार लाला टोला के अपने घर (छपरा, बिहार) से, अपने उत्तर प्रदेश वाले इलाके बलिया जिले में स्थित 'छावनी या डेरा' में चला गया। उन्होंने अपने घर के पास सर्वोदय आश्रम बनवाया। अपनी जमीन में कुछ लोगों को बसाया। यहीं रह कर जगदीश बाबू व सरयू भाई उनकी खेती करवाते थे। यही 60 के दशक में विनोबा जी आये। जेपी के इस गांव में रहते देश के जाने माने नेता, चिंतक, लेखक यहां आते रहे। यहां सर्वोदय का बड़ा सम्मेलन हुआ। जन्म की कहानी जेपी की जुबानी नेहरू लाइब्रेरी में एक मशहूर व्यक्ति हुए, डॉ. हरिदेव शर्मा। दुर्लभ विद्वान व इतिहासकार। उन्होंने उल्लेखनीय लोगों से बात कर उन पुरानी चीजों को रिकॉर्ड किया है। आज शायद किसी को मालूम भी नहीं, जेपी 1972 में सपत्नीक दो माह गांव (सिताबदियारा) रहने के लिए आए। उस दौरान उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखनी शुरू की। कुछ पन्ने लिखे भी। तभी उन्हें फोड़ा हुआ। बांह में। दिखाने के लिए वह बनारस गए। डॉ. केएन उडप्पा, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सक के पास। योजना थी एक सप्ताह में जेपी गांव लौट आएंगे। बनारस जाकर जेपी का घाव तो ठीक होने लगा पर प्रभावती जी को कैंसर का पता चला। फिर जेपी बनारस से प्रभावती जी के इलाज के लिए मुंबई चले गए। आत्मकथा वाली वह कॉपी, जेपी के नहीं रहने पर भी जगदीश बाबू के पास ही थी। उन्हीं डॉक्टर हरिदेव शर्मा ने 29 जून 1972 को जेपी से उनके जीवन के संबंध में दुर्लभ बातचीत की है। यह पूरी बातचीत 'मौखिक इतिहास इंटरव्यू' है। इस बातचीत में जेपी खुद बताते हैं कि 'मेरा जन्म हमारे गांव सिताबदियारा में 11 अक्तूबर, 1902 को हुआ था। उस समय पिताजी थे, मेरी बड़ी बहन का छुटपन में ही देहांत हो गया था। मेरे बड़े भाई जब छपरा शहर में पढ़ते थे, हाई स्कूल में थे, उसी वक्त उनका देहांत हो गया था। इसके बाद जेपी, बताते हैं कि 'मेरे गांव में उस वक्त प्लेग फैला हुआ था। हम लोगों की जो जमीन थी, वह बलिया जिले में पड़ती थी। गांव से कोई दो ढाई मील पश्चिम की तरफ जिसको 'बबूरबानी' कहते थे, वहां हम लोगों का एक डेरा था। प्लेग की वजह से वहां हमारे परिवार के लोग गए थे और वही मेरा जन्म हुआ'।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Nov 03, 2026, 07:03 IST
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