गेमिंग कल्चर में उलझी जेन जी: पूर्वांचल के मैदान तलाश रहे खिलाड़ी, पारंपरिक खेलों को बचाने की चुनौती
अंगूठों की तेजी अब मोबाइल स्क्रीन पर दिखती है जबकि कभी यही फुर्ती गांव के मैदानों में कबड्डी के दांव, गिल्ली-डंडा की चोट और खो-खो की दौड़ में नजर आती थी। जेन जी गेमिंग कल्चर में उलझी है और पूर्वांचल के मैदान अपने खिलाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अभी प्रयास नहीं हुए तो नई पीढ़ी इन खेलों को केवल किताबों और सोशल मीडिया की रीलों में ही देख पाएगी। गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, वाराणसी और चंदौली समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू, रस्साकशी और कुश्ती कभी ग्रामीण जीवन की पहचान हुआ करते थे। शाम होते ही गांव के खाली मैदान बच्चों और युवाओं से भर जाते थे लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। स्मार्टफोन की आसान पहुंच, ऑनलाइन गेमिंग और पढ़ाई के बढ़ते दबाव के कारण बच्चों का मैदान से रिश्ता कमजोर हुआ है। हालांकि, कई ग्राम पंचायतें और सामाजिक संगठन भी स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं करवाकर युवाओं को मैदान तक लाने का प्रयास कर रहे हैं। खेल प्रशिक्षकों का कहना है कि यदि पारंपरिक खेलों को स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं और ग्राम स्तरीय खेल महोत्सवों से जोड़ा जाए तो इनकी लोकप्रियता दोबारा लौट सकती है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Aug 04, 2026, 11:01 IST
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