पश्चिम एशिया संकट: अभी बाकी हैं चुनौतियां, ढांचागत कमजोरियों को दूर करना ही होगा
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर ऊर्जा सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जहां तक भारत की बात है, तो यह आपूर्ति पक्ष के तनाव की परीक्षा है, जो न सिर्फ बढ़ती कीमतों के एक और चक्र को, बल्कि हमारी गहरी ढांचागत कमजोरियों को भी उजागर करता है। यह एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा नीति की आवश्यकता पर जोर देता है, ताकि अल्पकालिक आपूर्ति सुरक्षा और दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों के बीच तालमेल बना रहे। यह मौजूदा और उभरते ईंधनों के बीच विकसित हो रहे ऊर्जा मिश्रण के बारे में स्पष्टता प्रदान करेगा। आज भारत एक ऐसे अभूतपूर्व पथ पर अग्रसर है, जहां हम एक ही समय में ऊर्जा की पहुंच का विस्तार कर रहे हैं, कार्बन उत्सर्जन कम कर रहे हैं और औद्योगीकरण की गति को तेज कर रहे हैं। हमें पारंपरिक ऊर्जा नियोजन के बजाय एक एकीकृत नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। वैश्विक स्तर पर, ऊर्जा संक्रमण मौजूदा स्रोतों से हटकर नहीं हो रहा है, बल्कि सभी स्रोतों का विस्तार हो रहा है, जिसमें बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पारंपरिक ईंधनों के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को भी जोड़ा जा रहा है। भारत की संघीय संरचना को देखते हुए, ऊर्जा संक्रमण के परिणाम राज्य-स्तरीय कार्यान्वयन पर भी निर्भर करते हैं। निवेश को सुगम बनाने और तत्परता से लेकर, भूमि की उपलब्धता, ग्रिड की तैयारी और राज्य के टैरिफ डिजाइन तक, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। फिलहाल, व्यापक स्तर पर यह व्यवस्था स्थिर प्रतीत होती है। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि हमारी आपूर्ति पर्याप्त है और मौजूदा व्यवधानों को संभाला जा सकता है। लेकिन जब हम उपभोक्ता स्तर पर देखते हैं, तो हमें तनाव के संकेत दिखाई देते हैं, विशेष रूप से एलपीजी की उपलब्धता में, जहां स्थानीय स्तर पर कमी सामने आई है और रिफिलिंग में देरी हो रही है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 60 फीसदी आयात करता है, जो कि सबसे ज्यादा संवेदनशील हिस्सा है, क्योंकि इसका लगभग 90 फीसदी हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। तेल के विपरीत, एलपीजी के लिए हमारे आपूर्ति के स्रोत अलग-अलग जगहों से नहीं थे, जिस वजह से मौजूदा संकट में आपूर्ति की आखिरी कड़ी पर काफी दबाव पड़ा। जैसे ही खाड़ी देशों से एलपीजी की आपूर्ति कम हुई, भारत ने एक ही हफ्ते में अमेरिका से लगभग 170,000 टन एलपीजी आयात की। आज ऊर्जा राष्ट्रीय संप्रभुता का एक अहम मुद्दा है, जहां हमारी रणनीतिक प्राथमिकताएं बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, आपूर्ति को सुरक्षित करना और उसकी निरंतरता सुनिश्चित करना होनी चाहिए। हम मूल रूप से आयात पर निर्भर हैं। हमारी कच्चे तेल की लगभग 90 फीसदी और प्राकृतिक गैस की लगभग 50 फीसदी जरूरतें दूसरे देशों से पूरी होती हैं। इसका एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। आयात पर निर्भर व्यवस्था में आपूर्ति का जोखिम होता ही है। यह कोई यदा-कदा होने वाली घटना नहीं है। गैस और एलपीजी के मामले में, सीमित लचीलेपन और अविकसित भंडारण ढांचे के कारण, यह बात विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है। पहले इस तरह के संकट ज्यादातर कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से आते थे, लेकिन इस बार की रुकावट जितनी लागत से जुड़ी है, उतनी ही उपलब्धता से भी। कतर भारत के 40 फीसदी से अधिक एलएनजी आयात की पूर्ति करता है, जिससे इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी रुकावट का असर बेहद गंभीर हो जाता है। तरल ईंधनों के विपरीत, गैस और एलपीजी के लिए पर्याप्त भंडारण क्षमता की कमी इसे आपूर्ति में होने वाले अचानक के झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है। गैस के मामले में, भारत का मौजूदा लचीलापन कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह एक दशक पहले लिए गए उन रणनीतिक फैसलों का नतीजा है, जब तेल की कीमतें 110 डॉलर से ऊपर थीं। 2010 के आसपास हमने अपने दो मुख्य दबाव बिंदुओं को हल करने के प्रयास किए-कीमतों को तेल से अलग करना और भौगोलिक एकाग्रता। कीमतों में आया बदलाव अहम था। बेहतर मूल्य-निर्धारण तंत्र और अनुबंध डिजाइन के जरिये करीब तीन अरब डॉलर की बचत हुई है। ये महत्वपूर्ण और बड़ी उपलब्धियां हैं, पर रणनीतिक गैस व एलपीजी भंडारण का अभाव एक ढांचागत कमजोरी बना हुआ है। गैस के लिए विशेष भंडारण बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है, जैसे कि भूमिगत गुफाएं, खाली जलाशय आदि, जिनमें अधिक पूंजी लगती है और वे भूवैज्ञानिक सीमाओं से बंधे होते हैं। इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से आपूर्ति में छोटी-मोटी रुकावटें भी किल्लत का कारण बन सकती हैं; सरकारी नीतियां बफर्स (सुरक्षित भंडार) बनाने के बजाय राशनिंग पर आधारित होती हैं; और समायोजन का मुख्य तंत्र औद्योगिक उत्पादन पर निर्भर करता है। इस बीच, सुरक्षित भंडार बनाए रखने के लिए विभिन्न वैकल्पिक तरीकों पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक समन्वित और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसे केवल एक ही उपाय से पूरा नहीं किया जा सकता। सबसे पहले, हमें अपने घरेलू उत्पादन को मजबूत करना होगा। दूसरा, आपूर्ति में विविधीकरण। इससे भारत को लंबे समय तक ऊर्जा मिलती रहती है और आपूर्ति के स्रोत भी विविध हो जाते हैं। तीसरा, इंफ्रास्ट्रक्चर/लॉजिस्टिक्स पर नियंत्रण। चौथा, रणनीतिक भंडारण को प्राथमिकता देना। गैस/एलपीजी भंडारण के बुनियादी ढांचे की कमी अब एक वास्तविक एवं व्यावहारिक बाधा बन चुकी है। इस संदर्भ में, भारत को लचीलापन, पीकिंग सपोर्ट और बैकअप प्रदान करने के लिए संतुलनकारी ईंधनों की जरूरत है और यहीं पर प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और अपने ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने की दिशा में काफी प्रगति की है। कार्बन उत्सर्जन में कमी और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ाए जा रहे कदम आवश्यक और अनिवार्य हैं। मौजूदा संकट ऊर्जा और भू-राजनीति के बीच के जुड़ाव को दर्शाता है, और यह कोई असामान्य बात नहीं है। पिछले लगभग एक दशक में भारत ने विविधीकरण और मूल्य-निर्धारण के संबंध में जो रणनीतिक विकल्प अपनाए हैं, उनसे एक निश्चित स्तर की मजबूती पैदा हुई है, लेकिन इस मामले में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 30, 2026, 06:51 IST
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