पुरानी चाल: मानवाधिकार या अपने हितों की राजनीति? इराक-लीबिया से वेनेजुएला तक अमेरिका की दखल रणनीति का पूरा सच

वेनेजुएला संकट के बाद यह सवाल फिर नए सिरे से खड़ा हो गया है कि अमेरिका अपनी वैश्विक सैन्य और रणनीतिक दखलअंदाजी को अक्सर लोकतंत्र, मानवाधिकार और सुरक्षा के नाम पर सही ठहराता रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सामरिक संस्थानों और प्रतिष्ठित मीडिया की रिपोर्टें बताती हैं कि इन हस्तक्षेपों के पीछे ऊर्जा संसाधन, भू-राजनीतिक वर्चस्व और रणनीतिक नियंत्रण जैसी ठोस स्वार्थ-संचालित प्राथमिकताएं भी रहीं। इराक में रासायनिक हथियार, अफगानिस्तान में आतंकवाद, लीबिया में नागरिक सुरक्षा और वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाली तथा ड्रग माफिया के खिलाफ कार्रवाई, जैसे दावों पर रैंड कॉरपोरेशन, ब्राउन यूनिवर्सिटी, चैथम हाउस और सिप्री जैसे संस्थानों की रिपोर्ट साफ तौर पर इशारा करती हैं कि अमेरिका अपने निहित स्वार्थों के लिए समय-समय पर रणनीतिक कदम उठाता रहा है। इरान में रासायनिक हथियार का दावा, लेकिन सच्चाई कुछ और रैंड कॉरपोरेशन की रिपोर्ट के अनुसार, इराक में रासायनिक हथियार का दावा किया गया था लेकिन रणनीतिक सच्चाई अलग थी। 2003 में अमेरिकी नेतृत्व में इराक पर हमला किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने दावा किया कि सद्दाम हुसैन के पास रासायनिक व बायोलॉजिकल हथियार हैं। हालांकि दूसरी ओर यूएस सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी और बाद में प्रकाशित ड्यूल्फर रिपोर्ट (यूएस सरकार द्वारा नियुक्त जांच) ने स्पष्ट किया कि ऐसे हथियार नहीं मिले। दरअसल अमेरिका यहां के तेल भंडारों पर कब्जा करना चाहता था। वियतनाम में सैन्य शक्ति के बावजूद ऐतिहासिक हार वियतनाम युद्ध अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी विफलताओं में गिना जाता है। यूएस डिफेंस डिपार्टमेंट और अकादमिक अध्ययनों के अनुसार भारी सैन्य ताकत के बावजूद अमेरिका उत्तर वियतनाम को रोक नहीं पाया और 1975 में पीछे हटना पड़ा। आज भी रैंड कॉरपोरेशन वियतनाम को रणनीतिक चेतावनी के रूप में उद्धृत करता है। ये भी पढ़ें:-US: क्यूबा-मेक्सिको और कोलंबिया पर सैन्य धमकी से लैटिन अमेरिका में तनाव, दबदबे की रणनीति पर काम कर रहे ट्रंप इराक में मौजूदगी से तेल की वैश्विक आपूर्ति में बना रहा अमेरिकी दबदबा यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) और रैंड कॉरपोरेशन के आकलन के अनुसार इराक दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडारों वाले देशों में है और वहां अमेरिकी सैन्य-राजनीतिक मौजूदगी ने वैश्विक तेल आपूर्ति को पश्चिमी प्रभाव-क्षेत्र में बनाए रखने में मदद की। युद्ध के बाद इराकी तेल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुले, जिनमें अमेरिकी और पश्चिमी ऊर्जा कंपनियों को उत्पादन-साझेदारी, तकनीकी सेवाओं और सुरक्षा-समर्थित अनुबंधों में हिस्सेदारी मिली। इससे अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार में कीमतों और आपूर्ति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव, मध्य-पूर्व में ऊर्जा मार्गों पर रणनीतिक पकड़ और चीन-रूस जैसे प्रतिस्पर्धियों की स्वतंत्र पहुंच को सीमित करने का लाभ मिला। अफगानिस्तान- सबसे लंबा युद्ध, अंततः वापसी 2001 में 9/11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू की। उद्देश्य था अल-कायदा का खात्मा और स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था। बीस वर्षों की मौजूदगी के बावजूद 2021 में अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा और तालिबान सत्ता में लौट आया। ब्राउन यूनिवर्सिटी के अनुसार यह अमेरिका की रणनीतिक विफलता थी, जहां घोषित लक्ष्य पूरे नहीं हुए। रैंड कॉरपोरेशन ने भी स्वीकार किया कि केवल सैन्य शक्ति से राष्ट्र-निर्माण संभव नहीं हो सकता, नीयत साफ होनी चाहिए। ये भी पढ़ें:-UN में घिरा अमेरिका: मादुरो की गिरफ्तारी से सहयोगी देश भी नाराज, आरोप भी लगाए; लेकिन ट्रंप के दूत का रुख कायम लीबिया में सत्ता तो बदली पर नहीं आई शांति 2011 में लीबिया में नाटो समर्थित अमेरिकी हस्तक्षेप हुआ। दावा था नागरिकों की रक्षा। चैथम हाउस और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अध्ययनों के अनुसार मुअम्मर गद्दाफी के हटने के बाद लीबिया में स्थिर शासन स्थापित नहीं हो पाया। ह्यूमन राइट्स वॉच और सिप्री की रिपोर्टें बताती हैं कि तेल-समृद्ध देश में मिलिशिया, हथियारों का प्रसार और गृहयुद्ध बढ़ा। यह वह मोर्चा है जहां अमेरिका सत्ता तो बदल सका, लेकिन शांति नहीं ला पाया। ईरान में दबाव की नीति, लेकिन लक्ष्य अधूरा ईरान पर दशकों से प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन सिप्री और आईएईए के आंकड़े दिखाते हैं कि ईरान न केवल टिका रहा, बल्कि क्षेत्रीय प्रभाव भी बनाए रखने में सफल रहा। यह अमेरिका की उस सीमा को दर्शाता है, जहां आर्थिक और सैन्य दबाव भी निर्णायक नहीं बन पाए। ईरान के वर्तमान जन आंदोलनों को लेकर अधिकृत अंतरराष्ट्रीय आकलन साफ करते हैं कि वाशिंगटन इन्हें राजनीतिक और नैरेटिव स्तर पर समर्थन देता है।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 06, 2026, 10:43 IST
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