अमेरिका के लिए खतरनाक हैं ट्रंप? जिन्होंने इसके सम्मान को ठेस पहुंचाई

व्यावसायिक इतिहासकारों की यह प्रवृत्ति रही है कि वे मानव जाति के भाग्य को गढ़ने में व्यक्तियों की भूमिका को कम करके आंकते हैं। ई.एच. कार ने 1961 में छपी अपनी पुस्तक व्हाट इज हिस्ट्री में उस इतिहास-लेखन शैली का मजाक उड़ाया था, जिसे उन्होंने बैड किंग जॉन एंड द गुड क्वीन बेस शैली कहा था। जैसा कार्ल मार्क्स ने कभी कहा था, व्यक्ति अपना इतिहास स्वयं बनाते तो हैं, परंतु वैसी परिस्थितियों में नहीं जो उन्होंने खुद चुनी हों। वे अपनी क्रियाओं में तत्कालीन आर्थिक और सामाजिक स्थितियों से बंधे होते हैं, और विशेष रूप से तकनीक और वर्ग-संबंधों से। इसके बावजूद कभी-कभी व्यक्ति इतिहास को आकार देने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और यहां तक कि निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, चाहे अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए। लेनिन के बिना शायद सोवियत राज्य का अस्तित्व न होता और हिटलर के बिना तो निश्चित रूप से नाजी राज्य का कोई वजूद नहीं होता। आज की दुनिया में ऐसे व्यक्तियों का प्रभाव और भी बढ़ गया है और उनमें सबसे प्रमुख हैं डोनाल्ड ट्रंप। यह सच है कि उनका सत्ता में आना व्यापक आर्थिक और तकनीकी बदलावों की पृष्ठभूमि में समझना चाहिए। वैश्वीकरण की वजह से श्वेत मजदूर वर्ग की निराशा और नए मीडिया माध्यमों के जरिये उनकी छवि व झूठी बातों का प्रसार, इन सबने उनकी राह आसान की। लेकिन एक बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने लाखों लोगों के जीवन और भविष्य को सक्रिय रूप से प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए, यदि 2026 में अमेरिका का राष्ट्रपति कोई और होता तो संभव है कि इस्राइल के उकसावे पर ईरान के खिलाफ युद्ध नहीं होता, जिससे पश्चिम एशिया के देशों को विनाश से बचाया जा सकता था और अन्य देशों को तेल, गैस और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों का सामना नहीं करना पड़ता। इस लेख में मैं ट्रंप के ईरान युद्ध से दुनिया को हुए नुकसान से इतर उनके दूसरे कार्यकाल में अमेरिका को पहुंचाए गए नुकसान पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं। जिस देश को उन्होंने फिर से महान बनाने का वाद किया था, उन्होंने कम से कम सात तरीकों से उस देश को कमजोर किया है। पहला हमला उन्होंने सरकार के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर किया है। यह बात सर्वविदित है कि अमेरिकी राष्ट्रपति तकनीकी रूप से वहां के प्रधानमंत्री से अधिक शक्तिशाली होता है, फिर भी उसे दूसरों से परामर्श करना आवश्यक होता है। लेकिन ट्रंप ने कांग्रेस और अक्सर अपने कैबिनेट को भी नजरअंदाज करते हुए एकतरफा निर्णय लेना पसंद किया। वेनेजुएला और ईरान के खिलाफ युद्ध की घोषणा इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अपने दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष में उन्होंने 225 कार्यकारी आदेश जारी किए। इनमें से कुछ के गंभीर दुष्परिणाम हुए, जैसे महत्वपूर्ण सरकारी विभागों को बंद करना और मनमाने ढंग से टैरिफ बदलना। कुछ आदेश हास्यास्पद भी थे, जैसे संघीय सरकार में वोक एआई को रोकनाऔर ट्रक ड्राइवरों के लिए सामान्य समझ के नियम लागू करना। दूसरा हमला उन्होंने निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर किया। विशेष रूप से न्याय विभाग का राजनीतिक दुरुपयोग के अलावा ईमानदार अधिकारियों और आईसीई एजेंटों को डेमोक्रेटिक राज्यों में भेजकर असहमति रखने वाले नागरिकों को डराने-धमकाने की कोशिश की। तीसरा हमला उन्होंने अमेरिकी सेना पर किया। सेना के जवान कानून के तहत राष्ट्रपति के आदेशों का पालन करते हैं, लेकिन उन्हें किसी विशेष राजनीतिक दल या नेता से नहीं जुड़ना चाहिए। ट्रंप ने अपने जन्मदिन पर राजधानी में सैन्य परेड आयोजित कर इस परंपरा को तोड़ा। ईरान युद्ध के दौरान उन्होंने अपने रक्षा सचिव को एक सम्मानित सेना अधिकारी को हटाने की अनुमति दी, क्योंकि वह अधिकारी पदोन्नति को जातीय या लैंगिक पक्षपात से मुक्त रखना चाहता था। तकनीकी रूप से अमेरिकी सेना अभी भी सबसे उन्नत है, लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेपों के कारण इसकी संस्थागत क्षमता को नुकसान पहुंचा है। चौथा आघात प्रेस की स्वतंत्रता पर हुआ है। ट्रंप ने कुछ मीडिया मालिकों को डराकर अपने पक्ष में लिखने के लिए मजबूर किया। कुछ मामलों में उन्होंने ऐसे उद्योगपतियों को मीडिया संस्थानों पर नियंत्रण दिलाया, जो उनके करीबी माने जाते हैं, जिससे आलोचनात्मक रिपोर्टिंग दब सकती है। पांचवां हमला विश्वविद्यालयों पर हुआ है। गाजा में इस्राइल की कार्रवाई के खिलाफ छात्रों और शिक्षकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के बाद ट्रंप ने विश्वविद्यालयों की फंडिंग काटने और उनके फंड पर कर लगाने की धमकी दी। वे विश्वविद्यालयों को अपनी राजनीतिक सोच के अनुरूप ढालना चाहते हैं, भले ही इससे स्वतंत्र बौद्धिक खोज की परंपरा कमजोर हो जाए। छठा हमला उन्होंने अपने पड़ोसी देशों पर किया, जैसे कि कनाडा के साथ अमेरिका के हमेशा अच्छे संबंध रहे, लेकिन अब वह व्यापार युद्ध, विलय और राजनीतिक अपमान की धमकियों का सामना कर रहा है। नाटो जैसे मजबूत गठबंधन पर भी उनके व्यवहार के कारण दबाव बढ़ा है, खासकर ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जाने की धमकी और यूरोपीय देशों पर उनके युद्ध में साथ न देने का आरोप। अंततः, ट्रंप ने राष्ट्रपति पद की गरिमा को भी कमजोर किया है। उनके सोशल मीडिया पोस्ट की भाषा और अपने पद का निजी लाभ के लिए उपयोग इसकी मिसाल हैं। पहले भी कुछ राष्ट्रपतियों ने अनुचित भाषा का इस्तेमाल किया था, लेकिन ट्रंप ने इसे सार्वजनिक रूप से और अधिक बढ़ा दिया। यह सूची पूरी नहीं है, लेकिन यह दर्शाती है कि उन्होंने अपने ही देश को कितना नुकसान पहुंचाया है। कुल मिलाकर, उन्होंने अमेरिका को पहले से कमजोर करने के साथ उसके सम्मान को भी ठेस पहुंचाया है। अंत में, एक महत्वपूर्ण बात। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने मनमाने फैसले लिए। दूसरे कार्यकाल में वे और अधिक खतरनाक तथा सोची-समझी रणनीति के तहत काम करते दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने अन्य देशों के नेताओं के तरीकों का अध्ययन किया है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर चुके हैं। इन सभी ने अपने-अपने देशों की लोकतांत्रिक क्षमता को कम किया है। लेकिन इतिहास शायद ट्रंप को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले नेता के रूप में याद रखेगा, क्योंकि अमेरिका के पास खोने के लिए सबसे अधिक था।

#Opinion #National #DonaldTrump #VaranasiLiveNews

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Apr 19, 2026, 07:40 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




अमेरिका के लिए खतरनाक हैं ट्रंप? जिन्होंने इसके सम्मान को ठेस पहुंचाई #Opinion #National #DonaldTrump #VaranasiLiveNews