TMC Rift: एक फोन, एक आरोप और टूट गया वर्षों का साथ; चंद्रिमा ने ममता की किस टिप्पणी से आहत होकर छोड़ा तृणमूल?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी घमासान के बीच पूर्व मंत्री और हाल तक पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष रहीं चंद्रिमा भट्टाचार्य ने अपने इस्तीफे के पीछे की वजह पहली बार सार्वजनिक की है। उनका दावा है कि वर्षों तक ममता बनर्जी के साथ काम करने और हर परिस्थिति में उनके प्रति निष्ठावान रहने के बावजूद एक फोन कॉल में लगाए गए आरोप ने उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच विश्वास की डोर तोड़ दी। चंद्रिमा भट्टाचार्य ने शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष पद समेत पार्टी के सभी संगठनात्मक दायित्वों से इस्तीफा देने के बाद कहा कि शुक्रवार तक सब कुछ सामान्य था। वह रोज की तरह कोलकाता स्थित तृणमूल भवन में अपने कार्यालय में मौजूद थीं। उसी दौरान ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट पार्टी मुख्यालय पहुंचा, लेकिन उनका उससे कोई संपर्क नहीं हुआ। कुछ देर बाद वह कार्यालय से चली गईं। उन्होंने बताया कि अगले दिन ममता बनर्जी का फोन आया। बातचीत के दौरान ममता ने उनसे पूछा, 'क्या तुमने तृणमूल भवन उन्हें सौंप दिया। चंद्रिमा के मुताबिक, यही सवाल उनके लिए सबसे बड़ा झटका था'। यह भी पढ़ें- Supreme Court: 'पति को निजता का अधिकार, उचित प्रतिबंध भी संभव'; तलाक पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में और क्या उन्होंने कहा, मैंने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पार्टी की जिम्मेदारियां निभाईं। जहां तक मेरी जानकारी है, मैंने किसी को कुछ नहीं सौंपा। कोई मेरे कमरे में नहीं आया, किसी से मेरी मुलाकात नहीं हुई। फिर भी मुझ पर यह आरोप लगाया गया कि मैंने पार्टी कार्यालय बागी गुट को सौंप दिया। पूर्व मंत्री ने कहा कि उन्हें सबसे अधिक दुख इस बात का हुआ कि उनकी वर्षों की निष्ठा और विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया। 'जब भरोसा ही खत्म हो जाए तो पार्टी में बने रहने का कोई आधार नहीं बचता। इसी वजह से मैंनेसभी पदों से इस्तीफा देने का फैसला किया'। 'निष्ठा निभाने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी' चंद्रिमा ने कहा कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी उन्होंने पार्टी और ममता बनर्जी का साथ नहीं छोड़ा। वह नियमित रूप से कालीघाट जाकर पार्टी नेतृत्व से मिलती रहीं, तृणमूल भवन में बैठती रहीं और संगठन की बैठकों व कार्यक्रमों में लगातार हिस्सा लेती रहीं। उन्होंने कहा कि उन्हें हमेशा लगा कि उनकी निष्ठा पर कभी सवाल नहीं उठेगा, लेकिन पार्टी कार्यालय विवाद के बाद हालात पूरी तरह बदल गए। बेटे के बागी गुट में जाने के बाद भी बनाई दूरी चंद्रिमा भट्टाचार्य ने अपने बेटे सौरव बसु के बागी खेमे में शामिल होने को लेकर भी सफाई दी। उन्होंने कहा कि 47 वर्षीय बेटे ने अपना राजनीतिक फैसला स्वयं लिया था और उसका उनकी राजनीति से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने दावा किया कि 22 जून को बेटे के ऋतब्रत बनर्जी गुट की बैठक में शामिल होने के बाद उन्होंने घर में उससे राजनीतिक चर्चा तक बंद कर दी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने उसके कार्यालय जाना भी छोड़ दिया था। पार्टी कार्यालय से सीधे घर जाती थीं, ताकि किसी तरह की गलतफहमी या राजनीतिक संदेश न जाए। 'बदलते समय के साथ चलना जरूरी' इस्तीफे के बाद चंद्रिमा भट्टाचार्य विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के कक्ष में बागी नेताओं की बैठक में भी पहुंचीं। इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या वह बागी गुट में शामिल होने जा रही हैं, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से परहेज किया। उन्होंने केवल इतना कहा, जीवन में राजनीति ही सब कुछ नहीं होती। आगे क्या करना है, इस पर अभी फैसला नहीं किया है। बदलते समय के साथ चलना भी जरूरी होता है। हालांकि, उनके इस बयान और बागी नेताओं के साथ बैठक में शामिल होने से राजनीतिक हलकों में उनके अगले कदम को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। यह भी पढ़ें- The Second Orbit: शुभांशु की इस किताब में अंतरिक्ष के किस्से; ISRO की किस चुनौती को पांच दिन में पूरा किया बजट को लेकर भी किया बड़ा दावा चंद्रिमा ने ममता बनर्जी के साथ अपने कामकाजी संबंधों पर भी टिप्पणी की। पूर्व वित्त मंत्री ने दावा किया कि मुख्यमंत्री रहते हुए ममता बनर्जी राज्य के बजट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी उनसे कभी चर्चा नहीं करती थीं। उनके इस बयान को भी तृणमूल के भीतर लंबे समय से चली आ रही अंदरूनी खींचतान के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चंद्रिमा भट्टाचार्य का इस्तीफा केवल एक नेता का संगठन छोड़ना नहीं है, बल्कि यह तृणमूल कांग्रेस में चुनावी हार के बाद बढ़ते अविश्वास, गुटबाजी और नेतृत्व संकट का एक और बड़ा संकेत है। उनकी अगली राजनीतिक पारी किस दिशा में जाएगी, इस पर अब सबकी नजरें टिकी हैं।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 04, 2026, 13:27 IST
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