टाइम मशीन: तेल की लकीरें, अबूधाबी-अरब और रेत पर खिंची रेखाएं
28 अप्रैल, 2026। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल-मजरूई प्रेस के सामने आए। शांत आवाज। सधे हुए शब्द। यूएई ने एक मई, 2026 से ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर निकलने का फैसला किया है। सवाल पूछा गया, क्या आपने सऊदी अरब को पहले बताया मजरूई बोले, हमने यह मुद्दा किसी देश के साथ नहीं उठाया। 64 साल पहले बगदाद के उस कमरे में, जो दुनिया का सबसे मजबूत और ताकतवर गठजोड़ बना था, उसकी एक बड़ी दीवार ढह गई। गिरा भी वह, जिसे सऊदी अरब का सबसे भरोसेमंद साझीदार माना जाता था। 1960 में तेल की दुनिया को दो नाम मालूम थे-जकी यमानी और अल्फांसो पेरेज अलफोन्जो। एक सऊदी, दूसरा वेनेजुएला का। दोनों के मन में एक ही जिज्ञासा थी कि तेल हमारा, तो मुनाफा हमारा क्यों नहीं दोनों ने मिलकर अमेरिकी-यूरोपीय कंपनियों से अपना तेल उद्योग वापस ले लिया। और बना दिया दुनिया का सबसे ताकतवर आर्थिक संगठन, यानी ओपेक। इसने तेल बाजार पर राज किया। मगर अब दुनिया का यह सबसे मजबूत संगठन टूट गया। क्या रेत के नीचे दरार थी एक रंजिश, जो सत्तर साल से सुलग रही थी, और अब फट पड़ी है! आइए, टाइम मशीन गुर्रा रही है। डायल पर दिख रही है तारीख 26 दिसंबर, 1915। तारुत, फारस की खाड़ी। पहले विश्वयुद्ध का धुआं अभी थमा नहीं है। ओटोमन साम्राज्य ढह रहा है। ब्रिटेन को अरब के रेगिस्तान में एक भरोसेमंद दोस्त चाहिए। वह सामने हैं इब्न सऊद, नज्द के अमीर। अरब की रेत से उठा एक जंगजू, जिसने 1902 में महज 40 लोगों के साथ रियाद पर कब्जा किया था। दूसरी तरफ हैं ब्रिटिश डिप्लोमेट सर पर्सी कॉक्स। ट्रीटी ऑफ डॉरिन पर दस्तखत। ब्रिटेन ने इब्न सऊद को मान्यता दी है। इब्न सऊद बदले में देते हैं-ओटोमन साम्राज्य के खिलाफ ब्रिटेन का साथ और एक वादा कि वह कुवैत, कतर और संधि राज्यों पर हमला नहीं करेंगे। यही संधि राज्य आगे चलकर यूएई बनेंगे। खाड़ी के किनारे सात छोटी-छोटी रियासतें हैं। अबूधाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उम्म अल-कैवैन, फुजैराह, रास अल-खैमाह। 1820 से ब्रिटेन ने इनके साथ एक के बाद एक संधियां कीं, जिसके तहत ये रियासतें किसी भी विदेशी शक्ति से बिना ब्रिटेन की इजाजत के बात नहीं कर सकतीं। बदले में ब्रिटेन इनकी रक्षा करता है। डॉरिन की संधि में इन राज्यों की हिफाजत करने का वादा ब्रिटेन ने किया है, पर सऊदी उन्हीं पर नजरें गड़ाए हुए है। ब्रिटेन ने एक ही हाथ से दो दोस्त बनाए, जबकि दोनों एक-दूसरे के दुश्मन थे। यह रेत पर खिंची पहली लकीर है। आगे की हर दरार की जड़ यहीं है। 31 अगस्त, 1952। टाइम मशीन अबूधाबी की सरहद पर बुरैमी के पास उतर रही है। वह देखिए-धूल का बादल। सऊदी अमीर तुर्की बिन अब्दुल्लाह अल-उतैशान की अगुवाई में सऊदी गार्ड अबूधाबी की सरहद पार करके हमासा गांव पर कब्जा कर रहे हैं। सऊदी ने कहा, यह जमीन उसी की है। पर, असल वजह कुछ और है। तेल कंपनी अरामको को पता लगा है कि बुरैमी के नीचे तेल हो सकता है। तेल की गंध ने लालच बढ़ाया, सरहदें खींचीं, बारूद बाद में आया। अबूधाबी में उस शेख को देखिए। वह हैं शेख जायद बिन सुल्तान अल अहयान। अल-ऐन के शासक। यही आगे चलकर यूएई के संस्थापक बनेंगे। यह 1954 है। जिनेवा में मध्यस्थता कराने वाला अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल टूट गया है। सुर्खियों में है कि सऊदी अरब ने ट्रिब्यूनल के अरब सदस्य को खरीद लिया है। पांच अक्तूबर, 1955। बुरैमी में जंग को दूर से देखिए। ब्रिटेन ने अबूधाबी का साथ दिया है। सऊदी अमीर बिन नामी को गोली लगी है। यह जनवरी 1968 है। ब्रिटेन टूट चुका है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्य का बोझ उठाना असंभव हो गया है। पाउंड की कीमत गिरी है। प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन घोषणा कर रहे हैं कि ब्रिटेन अरब इलाकों से अपनी सेनाएं 1971 तक वापस बुला लेगा। टाइम मशीन 18 फरवरी, 1968 को अबूधाबी और दुबई के बीच उतर रही है। जगह का नाम है अरगूब अल सेदीराह। यहां अबूधाबी के शेख जायद और दुबई के शेख राशिद बिन सैयद अल मक्तूम मिलते हैं। तय हुआ है कि अब एक संघ बने, ताकि सऊदी और ईरान के हमलों से बचा जा सके। कतर और बहरीन शुरू में इस संघ में शामिल होते हैं, फिर अलग हो जाते हैं। दो दिसंबर, 1971। अरब इतिहास का यादगार दिन। दुबई गेस्टहाउस में छह रियासतों ने दुनिया को दिया है एक नया मुल्क-संयुक्त अरब अमीरात। सात सदी पुरानी अलग-अलग पहचानें-एक झंडे के नीचे। सऊदी अरब ने यूएई को मान्यता नहीं दी। वह शेख जायद को राष्ट्रपति नहीं मानेगा। यह बुरैमी की हार का बदला है। 21 अगस्त, 1974। हम जेद्दाह में हैं। तेल और ओपेक ने रंजिशें कमजोर की हैं। सऊदी और अमीरात के बीच ट्रीटी ऑफ जेद्दाह हुई। यूएई ने सऊदी अरब को दिया-शयबाह तेल क्षेत्र, खाड़ी तक एक गलियारा, कतर के दक्षिण में जमीन का एक टुकड़ा और सऊदी अरब ने दी अमीरात को मान्यता। 1975 में पता चला कि यह बातचीत तो मौखिक थी। जो लिखित दस्तावेज तैयार हुआ, उसमें दूसरी ही शर्तें थीं। अमीरात ने यह संधि नहीं मानी। फाइल आज भी खुली है। यह 2019 का साल है। टाइम मशीन लाल सागर के ऊपर मंडरा रही है। यहां सऊदी अरब और यूएई कंधे से कंधा मिलाकर हूतियों से लड़ रहे हैं। मगर पर्दे के पीछे सबको पता है कि यूएई उत्तरी यमन के इस्लामवादी गुटों को नहीं मानता, जबकि सऊदी इन्हें मदद देता है। और यह लीजिए, हम आ गए दिसंबर 2025 में। यमन के मुकल्ला बंदरगाह पर अमीरात की मदद वाले लड़ाकों ने सऊदी-समर्थित ताकतों पर, तो सऊदी अरब ने अमीरात के ठिकानों व मुकल्ला बंदरगाह पर हवाई हमले किए हैं। ओपेक के भाई-भाई अब सीधी जंग में आ गए हैं। टाइम मशीन के हमसफरो, ध्यान दें मुकल्ला की जंग इस रिश्ते में टूटन की शुरुआत थी। अबूधाबी ने ओपेक की सदस्यता छोड़ने का समय अपने हिसाब से चुना है। ओपेक के समझौते ने अमीरात के तेल उत्पादन में बढ़त को रोक दिया। उत्पादन क्षमता है 48 लाख बैरल प्रतिदिन। शर्त है केवल 32 लाख प्रतिदिन पंप करने की। ओपेक की जंजीर अब टूट गई। अमीरात बाजार में तेल बेचने को आजाद है। ईरान के हमलों का असर मिटाने के लिए ज्यादा संसाधन चाहिए। जैसे 1966 में चार्ल्स द गॉल ने नाटो की सैन्य कमान छोड़ी थी-अपनी शर्तों पर, अपने वक्त पर। जैसे 1948 में जोसेफ ब्रिज टीटो ने स्टालिन को कहा था, हम कम्युनिस्ट हैं, पर तुम्हारे नौकर नहीं। उसी तरह, ओपेक का टीटो मूमेंट आ गया। टाइम मशीन वापस लौट रही है। सऊदी तेल मंत्री जकी यमानी कहा करते थे-तेल युग पत्थर युग की तरह खत्म नहीं होगा, खत्म होने से पहले हम बेहतर चीज ढूंढ लें। यूएई को वह बेहतर चीज नजर आ रही है। इसलिए वह अपना तेल ओपेक की पाबंदी के बिना जितनी जल्दी हो सके, बेचना चाहता है। और सऊदी अरब वह ओपेक के कमरे में अकेला बचा है। रेत पर खिंची हुई लकीरें मिट जाती हैं, पर तेल के कुओं के ऊपर खिंची लकीरें दिलों में उतर जाती हैं। फिर मिलते हैं अगले सफर पर
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- Source: www.amarujala.com
- Published: May 10, 2026, 07:51 IST
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