पढ़ना जरूरी है: सोशल मीडिया के आने से हमारी एकाग्रता घटी, इसने हमें बेसब्र बनाया

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। बच्चों के लिए इससे बेहतर पहल और कोई नहीं हो सकती। खबरों के मुताबिक, छात्रों का स्क्रीन टाइम कम करने और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसमें आगे बताया गया है कि नियमित अखबार पढ़ने से छात्रों की शब्दावली और भाषा शैली बेहतर होती है, जबकि अलग-अलग तरह के लेख और संपादकीय उनका लेखन कौशल विकसित करने में मदद करते हैं। अलग-अलग नजरिये और विश्लेषण पढ़ने से छात्रों में आलोचनात्मक सोच और सही-गलत के बीच फर्क करने की क्षमता विकसित होती है, जिससे वे झूठी खबरों के जमाने में ज्यादा समझदार बनते हैं। हालांकि वे अपने पसंदीदा विषय पर टिके रह सकते हैं, लेकिन अखबार पढ़ने से उन्हें विज्ञान, संस्कृति और खेल जैसे विषयों के बारे में भी पता चलता है, जिनके बारे में वे शायद वैसे नहीं जानते। इससे उनके ज्ञान का दायरा बढ़ता है। डिजिटल स्क्रीन की तुलना में, मुद्रित अखबार पढ़ने से एकाग्रता बढ़ती है। हम सभी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सोशल मीडिया के आने से हमारी एकाग्रता की अवधि घट गई है। छोटे संदेश, व्हाट्सएप और 90 सेकंड के वीडियो ने हमें बेसब्र बना दिया है। हम कंटेंट को जल्दी-जल्दी देखते हैं, पर उसे समझते नहीं हैं। यह बिना चबाए खाना निगलने जैसा है। अगर आप ध्यान दें, तो जो लोग मोबाइल स्क्रीन पर कंटेंट देखते हैं, उन्हें सिरदर्द, पेट दर्द और अवसाद या अजीब-सी अनुभूति होती है। फास्ट फूड इसलिए आया, क्योंकि लोग चलते-फिरते खाना चाहते थे। यह स्वादिष्ट था, लेकिन सेहत के लिए अच्छा नहीं था। फास्ट कंटेंट भी कुछ ऐसा ही है-आप बात करते समय, चलते समय और कुछ मामलों में गाड़ी चलाते समय भी स्मार्टफोन देखते हैं। लेकिन कुछ भी आपके दिमाग में नहीं रहता। पढ़ने की आदत डालने के लिए शुरुआत में, आपको ऐसी आसान व छोटी किताबें पढ़नी चाहिए, जो आपको पसंद हों। इससे आपका मन भी नहीं हटेगा। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे और आपको पढ़ने में मजा आने लगेगा, तो आप थोड़े और मुश्किल विषयों पर भी किताबें पढ़ सकते हैं। कॉमिक्स और छोटी कहानियों से शुरुआत करना कोई बुरा विचार नहीं है, क्योंकि वे बहुत दिलचस्प होती हैं और उन्हें कम समय में पूरा किया जा सकता है। किताब पढ़ना उसी कहानी पर बनी फिल्म देखने से ज्यादा दिलचस्प होता है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि किताब आपको अपनी कल्पना के अनुसार सोचने की आजादी देती है, जबकि फिल्म डायरेक्टर की सोच होती है। उदाहरण के लिए, एक अंधेरी, डरावनी गली में चलना फिल्म में एक ही तरह से दिखाया जा सकता है, लेकिन आप उसे दर्जनों अलग-अलग तरीकों से सोच सकते हैं। एक बहुत ही सफल और लोकप्रिय टीवी प्रस्तोता पालकी शर्मा कहती हैं कि उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है और किताबों ने ही उन्हें वह बनाया है, जो वह आज हैं!' वह स्कूल के दिनों से किताबें पढ़ रही हैं और देखिए, आज कहां पहुंच गई हैं। इसलिए वीडियो में मत डूबिए। वे मजेदार हो सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे आपके दिमाग को खत्म कर रहे हैं। वीडियो आमतौर पर साइबरस्पेस में तैरते-बिखरे हुए टुकड़ों की तरह होते हैं। ये आपके दिमाग को भ्रमित करते हैं और बिना किसी पैटर्न या अनुशासन के एक विचार से दूसरे विचार पर भटकाते रहते हैं। साइकोलॉजी टुडे मैगजीन का कहना है कि वीडियो को इन्सान का दिमाग पाठ की तुलना में साठ हजार गुना तेजी से प्रोसेस करता है। यह आपके दिमाग को बाईपास करके सीधे आपकी भावनाओं तक पहुंचता है, जिससे आलसी सोच को बढ़ावा मिलता है। जैसे आपकी शारीरिक क्षमता की एक सीमा होती है, वैसे ही आपकी मानसिक क्षमता की भी सीमा होती है। उदाहरण के लिए, आप कभी भी 100 मीटर पांच सेकंड में नहीं दौड़ सकते। एक स्वाभाविक सीमा होती है। पुरुषों की 100 मीटर रेस का वर्ल्ड रिकॉर्ड जमैका के उसेन बोल्ट के नाम है, जिन्होंने 2009 में बर्लिन में वर्ल्ड चैंपियनशिप में 9.58 सेकंड का समय लिया था। दूसरी ओर, पढ़ना इंटरैक्टिव और ज्यादा दिलचस्प होता है। आपको मन में तस्वीरें बनानी होती हैं और पेज पर बनी आकृतियों को अपने दिमाग में विचारों में बदलना होता है। यह माध्यम आपको एक मजबूत, ज्यादा अनुशासित विचारक बनाता है, चाहे आप कुछ भी पढ़ें। महान और सफल लोग बहुत पढ़ते हैं। महात्मा गांधी, डॉ. अब्दुल कलाम और नेहरू ने बहुत सारी किताबें पढ़ीं, और वे लियो टॉल्स्टॉय, चार्ल्स डिकेंस और कई अन्य लेखकों से प्रभावित थे। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कहते हैं कि किताबों ने उनके राष्ट्रपति पद के दौरान और पूरे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने सैकड़ों किताबें पढ़ी थीं। अब्राहम लिंकन, जिन्हें ज्यादा औपचारिक शिक्षा नहीं मिल पाई थी, उन्होंने किताबें पढ़कर इसकी कमी पूरी की और खुद से पढ़ाई की। कॉर्पोरेट जगत में कई सीइओ और सीनियर एग्जीक्यूटिव बहुत ज्यादा पढ़ते हैं। जब आप पढ़ते हैं, तो आपका बोलने का तरीका बेहतर होता है। सफल लोग चुनिंदा किताबें पढ़ते हैं और मनोरंजन साहित्य के बजाय उन्हें शैक्षणिक व ज्ञानप्रद पुस्तकें पसंद आती हैं। वे दूसरे सफल लोगों और उनकी कहानियों के बारे में पढ़ने में रुचि लेते हैं। एलन मस्क ने खुद किताबें पढ़कर रॉकेट बनाना सीखा। बॉलीवुड में बहुत-सी हस्तियां हैं, जिन्हें किताबें पढ़ने का शौक है। अलग-अलग लेखकों को पढ़ना चाहिए, क्योंकि हर लेखक के लिखने की अपनी शैली होती है और अलग-अलग लेखकों को पढ़ने से अलग-अलग शैली सीखने को मिलते हैं। अगर आप नहीं पढ़ेंगे, तो आप लिख नहीं पाएंगे। यह सिर्फ नौकरी पाने के लिए ही नहीं, बल्कि कॅरिअर में आगे बढ़ने के लिए भी जरूरी है। आपको अलग-अलग विधाओं की किताबें -रोमांचक उपन्यास, थ्रिलर, रहस्यमयी किताबें, महान लोगों की आत्मकथाएं/जीवनी, इतिहास और क्लासिक्स पढ़नी चाहिए। अमेरिकी लेखक जॉर्ज आरआर मार्टिन कहते हैं, 'एक पाठक मरने से पहले हजार जिंदगी जीता हैजो आदमी कभी नहीं पढ़ता, वह सिर्फ एक ही जिंदगी जीता है।' भारत में शिक्षा राज्य का विषय है। हर राज्य को इस पर फैसला लेना चाहिए। अगर आप 'विश्वगुरु' बनना चाहते हैं, तो पहले सीखें, और इसका एकमात्र तरीका पढ़ना है। सभी स्कूलों में स्थानीय भाषा में अखबार पढ़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए। यह बात मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से भी आनी चाहिए।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 05, 2026, 04:01 IST
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