जो पाकिस्तान ने बोया: खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल से आंतरिक संघर्ष उजागर, क्या बड़ी राजनीतिक भूल कर रहे शरीफ?
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लागू करने और गवर्नर शासन लगाने के फैसले को संसद की मंजूरी मिलने से जहां जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी की निर्वाचित प्रांतीय सरकार निलंबित हो गई है, वहीं यह घटनाक्रम आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान के गहराते आंतरिक संघर्ष को भी उजागर करता है। भले ही शरीफ की सरकार ने बढ़ती आतंकी हिंसा और आतंकवाद विरोधी सैन्य अभियानों में प्रांतीय सरकार के कथित असहयोग का हवाला देकर वहां आपातकाल लागू किया है, पर वहां के विपक्षी दलों एवं वकीलों ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए इसे बड़ी राजनीतिक भूल बताया है। उल्लेखनीय है कि इमरान खान की रिहाई के लिए मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व में पीटीआई पार्टी के समर्थक एक बड़ा जुलूस निकाल रहे थे। इस प्रदर्शन और सैन्य नेतृत्व के खिलाफ उठती आवाजों को दबाने के लिए संघीय सरकार ने यह कठोर कदम उठाया है। लेकिन, इससे केंद्र व प्रांतीय सरकार के बीच पहले से जारी टकराव और गहराने की आशंका बढ़ गई है। पाकिस्तान की राजनीति में यह प्रवृत्ति नई नहीं है। वहां निर्वाचित सरकारों को कमजोर करने, राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाने और सत्ता के संघर्ष में सांविधानिक संस्थाओं को विवादों में घसीटने का लंबा इतिहास रहा है। सेना का राजनीतिक प्रभाव भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास में बाधा बनता रहा है। पाकिस्तान के इस आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल को देखते हुए भारत को सतर्क व संतुलित रणनीतिक रुख अपनाना होगा। अफगानिस्तान की सीमा से सटे खैबर पख्तूनख्वा में सेना की सीधी तैनाती और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे आतंकी संगठन के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई से कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। और, इस अस्थिरता का फायदा उठाकर ध्यान भटकाने के लिए आतंकी संगठन भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश कर सकते हैं। लिहाजा, सुरक्षा बलों और भारतीय खुफिया एजेंसियों को एहतियातन सीमा की निगरानी बढ़ा देनी चाहिए। इस्लामाबाद में अगर मानवीय संकट या सुरक्षा संघर्ष बढ़ता है, तो उसका असर दक्षिण एशिया की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है, इसलिए ऐसी संवेदनशील स्थिति पर भारत को पैनी नजर रखनी चाहिए। पाकिस्तान के मौजूदा संकट का एक बड़ा सबक यह भी है कि आतंकवाद को राजनीतिक सुविधानुसार देखने और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की कीमत अंततः पूरे देश को चुकानी पड़ती है। जिस आतंकवाद को पाकिस्तान अपने रणनीतिक लाभ के औजार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है, वही आज उसकी आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 17, 2026, 02:35 IST
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