काशी का पुरनका रंग : चुनटदार अद्धी, मलमल का कुर्ता और बेफिक्री चाल... ये था बनारस का हाल

25 साल पहले बनारस सिर्फ एक शहर नहीं, अपने आप में पूरी संस्कृति था। यहां आदमी की पहचान उसके पेशे से कम, उसके संस्कार और इलाके से ज्यादा होती थी। चाल में ठहराव, बातों में अपनापन और जीवन में बेफिक्री यही उस दौर की काशी की असली तस्वीर थी। बनारस की पहचान उसके लोगों के ठाठ, मिजाज और संस्कार से होती थी। फिल्म शोले में मौसी का किरदार निभाने वाली लीला मिश्रा को देख लीजिए, उनके अभिनय में खांटी बनारसीपन साफ झलकता है। घूंघट संभालने का अंदाज, सच्ची-सपाट बात और व्यवहार में एक अलग ठसक। तब बनारस में घालमेल कम था। साहित्यकार अपनी दुनिया में, संगीतकार अपने रियाज में, नेता राजनीति में, पत्रकार खबरों में और इलाके के दबंग अपनी सीमाओं में रहते थे। एक-दूसरे के काम और दायरे का लिहाज था। गुंडे-मवाली भले किसी से न डरें, लेकिन क्राइम रिपोर्टर से दूरी बनाकर रखते थे। उस दौर में बड़ा आदमी वही माना जाता था जो रिक्शे की फुल सीट रिजर्व करा ले। लहुराबीर से गोदौलिया तक डबल सवारी चवन्नी-चवन्नी में शेयर होकर चलती थी। रिक्शेवाला इशारे में पूछताफुल कि हाफ सुबह की शुरुआत बाबा दरबार और संकट मोचन मंदिर के पट खुलने से होती थी। आरती के बाद कचौड़ी-जलेबी की दुकानों पर भीड़ लग जाती। गोदौलिया के जलजोग से लेकर विश्वेश्वरगंज के राम भंडार और विश्वनाथ भंडार तक सुबह से लाइनें दिखती थीं।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 09, 2026, 11:55 IST
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