पड़ोसी प्रथम नीति और चिंताएं: दक्षिण एशिया में भारत की चुनौती, पड़ोस में कैसे फिर से जीते भरोसा?
भारत अपने पड़ोस में यदि अकेला पड़ गया है, तो यह अचानक नहीं हुआ है, बल्कि यह दशकों पुरानी कूटनीतिक लापरवाही, रणनीतिक रूप से कम प्रतिक्रिया व राजनीतिक इरादों को ठोस नतीजों में बदलने में लगातार नाकामी का मिला-जुला नतीजा है। नई दिल्ली क्षेत्रीय नेतृत्व की ख्वाहिश रखती है, पर वह सद्भावना को स्थायी प्रभाव में बदलने में हिचकिचाती रही है, जिससे चीन को रणनीतिक शून्य को भरने का मौका मिल गया है। भारत ने उस जगह को छोड़ दिया है, जिसे कभी उसका निर्विवाद प्रभाव क्षेत्र माना जाता था। विदेश नीति के प्रति डोनाल्ड ट्रंप का लेन-देन वाला रवैया, जिसमें अचानक बदलाव, चुनिंदा जुड़ाव और अल्पकालिक फायदे को प्राथमिकता देना शामिल है, ने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय समीकरणों को बिगाड़ दिया है। पाकिस्तान के साथ सामरिक बातचीत फिर से शुरू करने की ट्रंप की नई इच्छा (जो आतंकवाद विरोधी नजरिये, अफगान संकट के असर या कूटनीतिक सौदेबाजी से प्रेरित है) आतंकवाद के मुद्दे पर इस्लामाबाद को कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग करने की भारत की कोशिशों को कमजोर करती है। इस अस्पष्टता के साथ ही बहुपक्षीय फ्रेमवर्क के प्रति ट्रंप की कम होती प्रतिबद्धता और चीन पर लगातार बदलते रुखों ने छोटे दक्षिण एशियाई देशों को प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच ज्यादा आक्रामक तरीके से संतुलन बनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। जैसे-जैसे वाशिंगटन का क्षेत्रीय रुख बदलता है, भारत का अपने आस-पड़ोस में नेतृत्व का दायरा सिकुड़ता जाता है, जिससे नई दिल्ली को उस बढ़ी हुई अनिश्चितता को प्रबंधित करना पड़ता है, जो इस क्षेत्र से बहुत दूर से आने वाली नीति की वजह से पैदा होती है। भारत को तुरंत वास्तविकता, विनम्रता और लगातार बातचीत पर आधारित सुधार की जरूरत है। पहला कदम है उच्च-स्तरीय राजनीतिक वार्ता। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री की ढाका, कोलंबो, काठमांडो, नेप्यीडॉ और माले जैसी राजधानियों की यात्राएं फिर से एक खास इरादे के साथ शुरू होनी चाहिए। घरेलू राजनीति में कथित पक्षपात की जगह राजनीतिक तटस्थता होनी चाहिए। दूसरा, लंबित कार्यों को बिना किसी देरी के पूरा किया जाना चाहिए। तीस्ता समझौता, नेपाल व भूटान के साथ क्रॉस-बॉर्डर कनेक्टिविटी और म्यांमार में इंफ्रास्ट्रक्चर को कूटनीति से आगे बढ़ाना होगा। भारत को चीन के कर्ज पर आधारित मॉडल से खुद को अलग दिखाने के लिए, ऋण के बजाय अनुदान पर आधारित एक दक्षिण एशियाई आर्थिक सहायता कोष बनाना चाहिए। तीसरा, सैन्य कूटनीति को फिर से शुरू करना चाहिए-संयुक्त अभ्यास, अधिकारियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम और सस्ते रक्षा हथियारों की आपूर्ति को चीनी हथियारों के विकल्प के तौर पर पेश किया जाना चाहिए। भारत को भरोसेमंद रक्षा भागीदार के तौर पर अपनी पहचान फिर से बनानी चाहिए, खासकर श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश के लिए। चौथा, भारत को सागर (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) पहल में जान डालनी चाहिए। क्वाड व जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे हिंद-प्रशांत साझेदारों के साथ मिलकर, भारत बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और समुद्र के नीचे पारदर्शी व समावेशी इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर सकता है। पांचवां, छात्रवृत्ति, यूथ एक्सचेंज, बॉलीवुड, योग और क्रिकेट कूटनीति के जरिये सांस्कृतिक कूटनीति को फिर से शुरू किया जाना चाहिए। विश्वास और सद्भावना को बहाल करने के लिए भारत को सिविल सोसाइटी व छात्रों से फिर से जुड़ना चाहिए। छठा, भारत को बहुपक्षीय और मीडिया मंचों पर अपनी बात रखने की जगह वापस पानी होगी। भारत को एफएटीएफ से लेकर ब्रिक्स व बिम्सटेक तक, कदम उठाने चाहिए और पाकिस्तान के आतंकी जुड़ाव को दुनिया के सामने लाना चाहिए। एक नई मीडिया रणनीति के तहत चीन-पाकिस्तान के दुष्प्रचार का त्वरित मुकाबला करना चाहिए, जिसमें स्थानीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री, क्षेत्रीय इन्फ्लुएंसर और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए फंडिंग शामिल हो। सातवां, हार्ड इंफ्रास्ट्रक्चर (सड़कों आदि) में निवेश बहुत जरूरी है। अरुणाचल, लद्दाख और सिक्किम में रणनीतिक सड़कें और निगरानी व्यवस्था उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने कि अंडमान, सेशेल्स, मॉरीशस और संभावित रूप से मेडागास्कर में भारत की समुद्री ताकत को मजबूत करना। भारत की रणनीतिक नाकामियां ऐसी नहीं हैं, जिन्हें ठीक न किया जा सके, पर वे सबक सिखाने वाली हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पता चला कि जब कूटनीतिक सहमति या नैरेटिव पर दबदबा न हो, तो सैन्य ताकत की भी अपनी सीमाएं होती हैं। भारत को एक जिम्मेदार क्षेत्रीय सहयोगी बनना होगा, जो सुनता है, वादे पूरे करता है और समृद्धि साझा करता है। विदेश नीति सिर्फ रणनीतिक रुख से संबंधित नहीं है, बल्कि लगातार मौजूदगी और अर्जित भरोसे से जुड़ा है। भारत को अपनी जगह वापस पाने के लिए सहानुभूति, प्रतीकों की जगह असलियत और वादों की जगह काम करके दिखाना होगा। तभी उसके पड़ोसी दुविधा छोड़ेंगे और उसके नेतृत्व को अपनाना शुरू करेंगे।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Feb 12, 2026, 02:47 IST
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