नक्शा बदला, नीयत बदली... महाशक्तियों में सौदा मजबूरी नहीं, कूटनीति का बड़ा परिणाम

भारत और अमेरिका के बीच हुआ यह व्यापारिक समझौता केवल फाइलों का आदान-प्रदान नहीं है। मार्च में जब इस डील के सभी तकनीकी पन्ने खुलेंगे, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत ने एआई के संकट को एक अवसर में बदल दिया है। राजनीतिक हल्ला चाहे जो हो, लेकिन डील 'मजबूरी' का सौदा नहीं, बल्कि एक उभरती महाशक्ति की मजबूत कूटनीति का परिणाम है, जिसने व्यापार के बहाने अमेरिका से अपना नक्शा तक सही करवा लिया। रूस से तेल और कृषि क्षेत्र को खोलने पर विपक्ष के तीखे सवालों ने सियासी पारा जरूर गरमा दिया है, लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अदृश्य सुनामी भारत के सर्विस सेक्टर की नींव हिला रही है। ठीक उसी नाजुक मोड़ पर भारत और अमेरिका के बीच हुई यह 'महाडील' एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक बनकर उभरी है। यह सिर्फ टैरिफ घटाने-बढ़ाने का खेल नहीं, बल्कि अपने विशाल सेवा क्षेत्र में संभावित झटकों को उत्पादों के निर्यात से पाटने का एक दूरदर्शी आर्थिक समीकरण है। एक बात साफ है कि भारत अब सिर्फ रूस के तेल के भरोसे अपनी अर्थव्यवस्था का भविष्य नहीं लिख सकता। उसे अपने सर्विस एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिकी बाजार से जोड़कर एक अभेद्य आर्थिक कवच तैयार करना होगा। कौन झुका, किसने झुकाया, किसका फायदा, किसका नुकसानइन पांच पहलुओं से समझिए संप्रभुता की जीत : इस डील का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक सच व्यापारिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक है। इस समझौते के साथ ही अमेरिका ने भारत का जो आधिकारिक नक्शा जारी किया है, उसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत के अभिन्न हिस्से के रूप में दिखाया गया है। दरअसल, नई दिल्ली ने स्पष्ट संदेश दे दिया था कि अगर अमेरिका की छवि 'प्रो-पाकिस्तान' बनी रही तो भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार होगा। अमेरिका को यह समझ आ गया कि एक दिवालिया पाकिस्तान के लिए वह भारत जैसे विशाल बाजार को दांव पर नहीं लगा सकता। एआई के प्रहार के बीच सर्विस सेक्टर का बीमा : इस डील के केंद्र में भारत का वह सर्विस सेक्टर है जो देश की जीडीपी में 56 प्रतिशत का योगदान देता है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों में एआई के कारण आई सुस्ती और छंटनी के दौर में यह डील भारत के लिए ऑक्सीजन की तरह है। भारत ने सर्विस सेक्टर में होने वाले घाटे की भरपाई 'माल निर्यात' से करने का रास्ता साफ किया है। भारतीय सामानों पर जो जीरो टैक्स मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार के नए द्वार खोलेगी। खेती की लक्ष्मण रेखा : पहली बार कृषि क्षेत्र का दरवाजा तो खोला गया, लेकिन भारत ने एक सख्त लक्ष्मण रेखा खींच दी है। गेहूं, चावल और डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टरों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। केवल पशु चारे के लिए बाजार खुला है। अमेरिका से सोयाबीन और लाल ज्वार की खली आयात करना भारतीय डेयरी उद्योग की लागत कम करेगा। रूस का तेल व आर्म ट्विस्टिंग :अमेरिकी धमकी- रूस से तेल लोगे तो डील रद्द कर देंगे, इसे विपक्ष दबाव की राजनीति कह रहा है। वहीं सूत्र कह रहे हैं कि यह दबाव नहीं, स्मार्ट इकॉनमी है। भारत ने साफ किया है कि वह तेल वहां से लेगा जहां से उसे सस्ता मिलेगा। यह धमकी से ज्यादा भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा और बजट का सवाल है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी यह मुफीद है। करेंट डेफिसिट और चाबहार का रणनीतिक मोड़ :अगर यह डील न होती और एआई के कारण हमारा सर्विस एक्सपोर्ट गिरता, तो भारत का करेंट डेफिसिट मतलब कमाई से ज्यादा खर्च बेकाबू हो जाता। रुपया बुरी तरह गिर सकता था। अमेरिका के साथ बढ़ती इस नजदीकी का बड़ा लाभ चाबहार पोर्ट पर मिलेगा। ईरान के साथ तनाव के बावजूद, अमेरिका का भारत के प्रति नरम रुख मध्य एशिया तक सुरक्षित रास्ता मुहैया कराएगा। अन्य वीडियो

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Feb 08, 2026, 02:42 IST
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