High Court : बरामदगी से घटना का रिश्ता जोड़े बिना दोषसिद्धि संभव नहीं, रिहाई का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 26 साल पुराने चर्चित हत्या के मामले में अलीगढ़ के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए उम्रकैद पाए तीन दोषियों को बेगुनाह माना। कहा कि महज बरामदगी के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक घटना से उसका सीधा संबंध न हो। यह फैसला न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने पाया कि गवाहों ने दावा किया कि दो गोलियां चलीं जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल एक का घाव मिला। कोर्ट ने इसे एक बड़ी विसंगति मानी। बरामद तमंचों की फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह पुष्टि नहीं हो सकी कि इन्हीं हथियारों का इस्तेमाल वारदात में हुआ था। लिहाजा, कोर्ट ने इसे संदेहास्पद माना। मामला अकराबाद थाना क्षेत्र का है। 10 अगस्त 2004 की रात भगवान सिंह की सोते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले में मृतक के भाई पप्पू सिंह और मां कलावती को चश्मदीद गवाह बनाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने जुगेंद्र सिंह, डिप्टी सिंह और रामवीर को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ तीनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे ठोस सबूतों से साबित करना अनिवार्य कोर्ट ने गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। कहा कि रात में गहरी नींद से अचानक जागने के बाद आरोपियों की पहचान करने के गवाहों के दावे अविश्वसनीय हैं। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि आपराधिक मामलों में संदेह कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे ठोस सबूतों से साबित करना अनिवार्य है। मौजूदा मामले में अभियोजन इन अनिवार्यताओं को पूरा नहीं कर सका। अभियोजन मामले को संदेश से परे साबित करने में विफल रहा।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 08, 2026, 17:01 IST
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