यूरोप में ढह रहा मध्यमार्गी राजनीति का किला: फ्रांस से जर्मनी तक अतिवादी दलों का उभार; क्यों बदल रहा रुझान?
यूरोप के सबसे बड़े और प्रमुख देशों में मध्यमार्गी राजनीतिक दलों का जनाधार तेजी से खिसक रहा है। धीमी आर्थिक वृद्धि, महंगाई, और युवाओं के सामने धुंधले भविष्य के संकट ने आम जनता के गुस्से को भड़का दिया है। असंतोष का फायदा धुर-दक्षिणपंथी और चरम-वामपंथी राजनीतिक दलों को मिल रहा है। फ्रांस का संकट इसका उदाहरण हैं, लेकिन यह प्रवृत्ति पूरे यूरोप में कई वर्षों से गहरी जड़ें जमा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अगले एक वर्ष में यूरोप के चार बड़े देशों स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड में महत्वपूर्ण चुनाव होने वाले हैं, जहां अतिवादी पार्टियां मुख्यधारा के दलों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। फ्रांस में राष्ट्रपति पद की दौड़ में मरीन ले पेनकी अति-दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली सर्वे में सबसे आगे चल रही है। वहीं, जर्मनी में अति-दक्षिणपंथी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी 28% समर्थन के साथ सबसे लोकप्रिय पार्टी बनकर उभरी है। ब्रिटेन के 2024 के चुनावों में दोनों पारंपरिक दलों लेबर और कंजर्वेटिव का संयुक्त वोट शेयर एक सदी के सबसे निचले स्तर पर आ गया। इटली में दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलनी को भी अति-दक्षिणपंथी धड़ों से चुनौती मिल रही है। ये भी पढ़ें:इटली में दंगों के बाद सरकार सख्त, हिंसक प्रदर्शन पर पांच साल की जेल; नाबालिगों के लिए क्या बदलेगा कानून नोबेल विजेता अर्थशास्त्री ऐसमोग्लू ने बताई वजह पिछले 50 वर्षों में ऑटोमेशन, वैश्वीकरण और अब एआई ने वेतनभोगी कामकाजी वर्ग को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। सरकारें सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने में विफल रही हैं। पारंपरिक वामपंथी और सोशलिस्ट पार्टियों पर बौद्धिक अभिजात वर्ग का कब्जा हो गया है, जो पारंपरिक मजदूर समर्थकों की चिंताओं को अनदेखा करते हैं।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Oct 21, 2026, 04:32 IST
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