नेपाल में हिंदी: भाषा से आगे बढ़कर पहचान और राजनीति का सवाल

नेपाल की जनकपुर उपमहानगर पालिका ने अपने अधीन प्राथमिक विद्यालय में मैथिली भाषा की पढ़ाई का फैसला लिया है। भारत में मैथिली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है। चूंकि, जनकपुर के आसपास मैथिलीभाषियों की अच्छी-खासी संख्या है, लिहाजा इस निर्णय का मैथिलभाषी समुदाय में स्वागत होना लाजिमी है। पर, नेपाल का ही एक वर्ग इस फैसले के विरोध में उतर आया है। दिलचस्प यह है कि उसे मैथिली से कोई विरोध नहीं है, बल्कि वह चाहता है कि मधेस इलाकों में हिंदी की विधिवत पढ़ाई होनी चाहिए। हिंदी समर्थक इस वर्ग का तर्क है कि इस कदम से नेपाल में बोली जाने वाली भारतीय मूल की भाषाओं के बीच एकता का संदेश जाएगा और इससे समुदाय की राजनीतिक ताकत को बढ़ावा मिलेगा। पर, मधेस समाज के लोग अपनी-अपनी भाषाओं की अगर पढ़ाई पर जोर देने लगेंगे, तो इससे मधेस समाज में बिखराव आएगा और उनकी एकता में दरार बढ़ेगी। नेपाल में पहाड़ी मूल के अलावा तराई में जो लोग रहते हैं, उन्हें मधेस या मधेसी कहा जाता है। इनकी व्यापकता उत्तर प्रदेश की सीमा से लेकर बिहार होते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा तक नेपाली हिस्से में है। आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल की कुल आबादी का करीब 53 प्रतिशत लोग मधेसी हैं। नेपाल में बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद यहां की शासन व्यवस्था में पहाड़ी मूल के लोगों का ही वर्चस्व रहा है। मधेसी समुदाय का अपने सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों से रोटी और बेटी का रिश्ता है। वे लोग पहाड़ी मूल के लोगों के बजाय सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों की तरह दिखते, रहते, खाते-पीते और बोलते हैं। नेपाल की राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के नेता रह चुके रमन पांडेय इन दिनों हिंदी के लिए स्वतंत्र रूप से अभियान चला रहे हैं। उनका तर्क है कि मैथिली की पढ़ाई से उन्हें एतराज नहीं है, पर इससे मधेस समुदाय की आपसी एकता में दरार पड़ेगी। उनका कहना है कि नेपाल का पहाड़ी समुदाय चाहता है कि मधेस समाज की एकता बाधित हो। इससे पहाड़ी मूल के लोग चुनावों में जीतते रहेंगे और कम संख्या के बावजूद देश पर शासन करते रहेंगे। वहीं, नेपाल में हिंदी की पढ़ाई की मांग करने वाले लोगों का कहना है कि अगर हिंदी को सरकारी मान्यता मिले और स्कूलों में पढ़ाया जाए, तो यह देश की 133 भाषाओं के बीच आपसी संवाद की सबसे प्रभावी भाषा बन सकती है। यह मांग कुछ वैसे ही है, जैसे भारत में आपसी संपर्क भाषा के लिए हिंदी को अपनाने का विचार केशवचंद्र सेन, नर्मदा शंकर उपाध्याय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और विनोबा भावे सदृश हस्तियों ने दिया था। विनोबा भावे और पुरूषोत्तम दास टंडन ने तो देवनागरी लिपि को दूसरी भाषाओं द्वारा अपनाए जाने और उसके विस्तार की जोरदार पैरवी भी की थी। रमन पांडेय जैसे लोग भी नेपाल में हिंदी को कुछ उसी तरह आगे लाने की मांग कर रहे हैं। हिंदी समर्थकों का यह भी तर्क है कि मधेस समुदाय की आपसी एकता को हिंदी के ही जरिये मजबूती मिल सकेगी। मधेस आबादी नेपाल के बाईस जिलों में फैली हुई है। रमन पांडेय जैसे लोगों का तर्क है कि बाईस जिलों के लोगों को एक माला में जोड़ने में हिंदी ही कामयाब हो सकती है। नेपाल और भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत साझा है। अगर हिंदी को मान्यता मिलती है, तो संपर्क भाषा हिंदी को नई ताकत मिलेगी। हिंदी नेपाली समुदायों को तो आपस में जोड़ेगी ही, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से भी नेपाल और भारत के रिश्तों को नई गति मिलेगी। ऐसा नहीं कि नेपाल में हिंदी के विरोधी नहीं हैं। लिपुलेख और कालापानी विवाद के वक्त तो तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाल में हिंदी पर पाबंदी लगाने तक की बात कर डाली थी। हालांकि, इसका विरोध उनकी अपनी पार्टी में ही हुआ था। हिंदी के मशहूर पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने हिंदी में जनपदीय आंदोलन चलाया था। नेपाल के हिंदी समर्थकों को इसे भी ध्यान में रखना होगा। वह जनपदीय भाषाओं को बढ़ावा देने के जरिये भाषाई लोकतंत्र की वकालत कर रहे थे। उन्हें पता था कि जनपदीय भाषाओं के आपसी संपर्क और संवाद के लिए हिंदी ही सहयोगी होगी। नेपाल के हिंदी समर्थकों को भी आपसी भाषाओं के बीच कुछ उसी तरह सौहार्द को बढ़ावा देते हुए हिंदी के विकास की बात करनी होगी। इसी बहाने नेपाल में वे हिंदी को प्रतिष्ठापित करने में सफल हो सकेंगे। edit@amarujala.com

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 15, 2026, 07:05 IST
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