आतंक का साया हटा तो छाए मेधावी: लिखी सफलता की नई इबारत, सम्मान मिला, तस्वीरें खिंची, चेहरे खिले; गूंजी तालियां

एक दौर था जब शोपियां, कुपवाड़ा, बांदीपोरा और अनंतनाग के कई गांवों में सुबह की शुरुआत स्कूल की घंटी से नहीं बल्कि गोलियों की आवाज और बंद के एलान से होती थी। आतंकियों के डर से स्कूलों के दरवाजे बंद हो जाते थे। महीनों ताले लटके रहते थे। बच्चों के सपनों का पौधा बड़ा होने से पहले ही मुरझा जाता था। बचपन किताबों से ज्यादा अनिश्चितता, खौफ और बंदिशों के बीच गुजरता था। अब हालात सामान्य हुए तो इन्हीं बच्चों ने अपनी उम्मीदों के दीये से घाटी को रोशन कर दिया है। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में मेरिट सूची में अपना नाम दर्ज कराकर इन होनहारों ने यह दिखा दिया कि उनके हौसले भय से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। यह केवल अच्छे अंकों की कहानी नहीं बल्कि उस बदलाव की दास्तान है जिसमें बारूद की गंध पर किताबों की खुशबू भारी पड़ी है।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 23, 2026, 15:19 IST
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