उम्मीद पर दुनिया कायम: अमेरिका और ईरान के बीच समझौता बड़ी राहत, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी

पश्चिम एशिया में पिछले करीब साढ़े तीन महीनों से जारी संघर्ष और तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के मध्य उभरता समझौता राहत की उम्मीद तो जगाता है, लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा अभी बाकी है। गौरतलब है कि समझौते की स्पष्ट धाराएं अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन इसे लेकर इस्राइल के रुख और अमेरिकी प्रशासन के भीतरी मतभेदों को देखते हुए आगे की राह आसान नहीं दिख रही। दरअसल, किसी भी कूटनीतिक समझौते की कामयाबी उसके मसौदे से अधिक उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगने वाली सीमाएं क्या होंगी और अमेरिकी प्रतिबंधों में किस हद तक व कितनी जल्दी राहत दी जाएगी, जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों की अलग-अलग अपेक्षाएं हैं। ऐसे में, शुक्रवार को जिनेवा में समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर के बाद जब इसकी स्पष्ट शर्तें सामने आएंगी, तो उनकी अलग-अलग व्याख्याओं को लेकर नए विवाद खड़े हों, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। और, यही वजह है कि हस्ताक्षर के बाद शुरू होने वाला अमल का चरण सबसे चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। अमेरिका व ईरान के बीच दशकों से कायम अविश्वास के अतिरिक्त क्षेत्रीय समीकरण भी इस समझौते को जटिल बनाते हैं। इस्राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। खाड़ी देशों की अपनी चिंताएं हैं, जबकि यमन, सीरिया, लेबनान और इराक में सक्रिय विभिन्न गुटों की तरफ से कोई भी अप्रत्याशित घटना या सैन्य उकसावा पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार सकता है। इन तमाम आशंकाओं के बावजूद इस समझौते के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसे अंत की तरह नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक सफर की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। अगर यह पूरी तरह कामयाब होता है, तो पश्चिम एशिया में स्थिरता बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों को भी निस्संदेह राहत मिलेगी, जिसका लाभ भारत समेत उन सभी अर्थव्यवस्थाओं को मिलेगा, जो काफी हद तक आयातित ऊर्जा पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त, समझौते से उन करीब एक करोड़ भारतीयों को भी राहत मिलेगी, जो खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे हैं। आने वाले हफ्ते और महीने तय करेंगे कि यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होता है या फिर अतीत की भांति अविश्वास, राजनीतिक दबावों और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ जाता है। फिलहाल, इतना स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया एक गहरे भू-राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और इस समझौते की सफलता या विफलता न केवल क्षेत्र, बल्कि पूरी दुनिया की रणनीतिक दिशा को प्रभावित करेगी।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 17, 2026, 02:57 IST
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