विश्व हिंदी दिवस: जिन्होंने दुनिया में हिंदी को हिंदी बनाया, उन हिंदीतर मनीषियों का स्मरण जरूरी
प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में 10 से 14 जनवरी, 1975 तक आयोजित हुआ था। उसी की याद में हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में हिंदीतर भाषियों की बड़ी भूमिका रही है। आज जब कई देशों में यह दिवस मनाया जा रहा है, तो हमें उन हिंदीतर भाषी मनीषियों का स्मरण जरूर करना चाहिए, जिन्होंने हिंदी की समृद्ध विरासत खड़ी की। हिंदी गद्य का जन्म हिंदीतर क्षेत्र कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज में हुआ। लल्लू लालजी ने अपना प्रेमसागर और सदल मिश्र ने चंद्रावली की रचना यहीं पर की और ये ही दोनों हिंदी गद्य के आचार्य माने जाते हैं। हिंदी का पहला अखबार, जो साप्ताहिक था, उदंत मार्तंड कलकत्ता से ही 30 मई, 1826 को निकला। हिंदी का पहला दैनिक समाचार सुधावर्षण भी श्याम सुंदर सेन ने 1854 में यहीं से निकाला। हिंदी का पहला एमए (नलिनी मोहन सान्याल) कलकत्ता विश्वविद्यालय ने ही 1921 में दिया। मुंशी तारिणी चरण मित्र, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, केशव चंद्र सेन, राजा राममोहन राय, श्याम सुंदर सेन, चिंतामणि घोष, जस्टिस शारदा चरण मित्र, अमृत लाल चक्रवर्ती, राजनारायण बसु, रामानंद चट्टोपाध्याय, श्री अरविंद, बंकिमचंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नलिनी मोहन सान्याल, सुनीति कुमार चाटुर्ज्या, सखाराम गणेश देउस्कर, जैसे बांग्लाभाषियों ने हिंदी की बहुविध सेवा की। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 20 दिसंबर, 1928 को कलकत्ता में आयोजित राष्ट्रभाषा सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में हिंदी के पक्ष में ऐतिहासिक भाषण दिया था। हिंदी को सैकड़ों शब्द देने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर मूलतः मराठीभाषी थे। लक्ष्मीशंकर व्यास ने अपनी किताब पराड़कर जी और पत्रकारिता में लिखा है, पराड़कर जी ने पत्रकारिता तथा साहित्य साधना की आधी शताब्दी में हिंदी भाषा को सैकड़ों नए शब्द दिए। सर्वश्री शब्द पराड़कर जी की ही देन है। इसी प्रकार अंग्रेजी के मिस्टर शब्द के लिए श्री शब्द दिया। राष्ट्रपति, मुद्रास्फीति, लोकतंत्र, नौकरशाही, स्वराज्य, सुराज्य, नक्राशु, मक्राशु, वातावरण, वायुमंडल, कार्रवाई, वाग्यंत्र, अंतरराष्ट्रीय, चालू, परराष्ट्र आदि शब्दों के हिंदी में व्यापक प्रयोग तथा प्रचलन का श्रेय पराड़कर जी को ही है। पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत के अनेक हिंदीतरभाषियों ने हिंदी को सींचने का काम निरंतर किया है। यही नहीं, हिंदीतरभाषी विदेशी विद्वानों ने भी हिंदी की अप्रतिम सेवा की है। मूलतः फ्रेंचभाषी गार्सा द तासी ने हिंदी साहित्य का पहला इतिहास इस्त्वार द ला लितेरात्युर ऐंदुई ए ऐंदुस्तानी शीर्षक से लिखा। उर्दू-हिंदी को पहले हिंदुस्तानी कहा जाता था। तासी ने अपना पूरा जीवन हिंदुस्तानी को पढ़ने-पढ़ाने और शोध करने में लगाया। गार्सा द तासी ने हिंदुस्तानी और हिंदवी के बारे में फ्रेंच में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इंग्लैंड के मूल बाशिंदे जॉर्ज ग्रियर्सन बहुभाषाविद और आधुनिक भारत में भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले पहले भाषा वैज्ञानिक थे। उन्होंने भारतवर्ष में बोली जाने वाली 179 भाषाओं और 544 बोलियों का अध्ययन किया। उन्होंने द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिट्रेचर ऑफ हिंदुस्तान नाम से इतिहास ग्रंथ लिखा। विद्यापति और तुलसीदास के साहित्य का महत्व प्रतिपादित करने वाले वह संभवतः पहले अंग्रेज विद्वान थे। उन्होंने एन इंट्रोडक्शन टू द मैथिली डायलेक्ट्स ऑफ द बिहारी लैंग्वेज ऐज स्पोकन इन नॉर्थ बिहार नामक पुस्तक में मैथिली को भाषा के रूप में स्थापित किया। बेल्जियम के रहने वाले फादर कामिल बुल्के ने 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए और फिर वहीं से रामकथा : उत्पत्ति और विकास विषय पर डीफिल की। वर्ष 1968 में उनके द्वारा तैयार अंगरेजी-हिंदी कोश प्रकाशित हुआ, जो प्रामाणिक कोश माना जाता है। उनकी चर्चित पुस्तकें हैं-मुक्तिदाता, द थीज्म ऑफ न्याय वैशेषिक, रामकथा : उत्पत्ति और विकास, रामकथा और तुलसीदास, नया विधान, एक ईसाई की आस्था रामकथा और हिंदी आदि। उन्होंने रामकथा और संत तुलसीदास पर इतनी गहरी निष्ठा व्यक्त की कि लोगों को लगने लगा कि फादर कामिल बुल्के तुलसीदास के अवतारी पुरुष हैं। मूलतः रूसीभाषी डॉ. येवगेनी पेत्रोविच चेलिशेव का शोध-प्रबंध आधुनिक हिंदी कविता से संबंधित-आधुनिक हिंदी कविता की परंपरा और नवीनता बहुत समादृत रहा। उनकी मौलिक, अनूदित और संपादित लगभग 200 कृतियां हैं। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं-हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास (नए रूप में), सोवियत भारतीय मैत्री के स्रोत, भारतीय साहित्यः कल और आज, भारतीय साहित्य की समस्याएं। मूलतः चीनीभाषी चीन तीङहान ने तुलसीदास के रामचरितमानस, प्रेमचंद के निर्मला तथा यशपाल के झूठा सच का हिंदी से चीनी भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने हिंदी-चीनी मुहावरा कोश (1988), हिंदी पाठ्यपुस्तक (1992), चीनी-हिंदी कोश (2000) का निर्माण किया है। मूलतः जर्मनभाषी लोठार लुत्से ने हिंदी, बांग्ला व कन्नड़ की कई रचनाओं का जर्मन में अनुवाद किया। उनके आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह साहित्य : विविध संदर्भ 1968 में और हिंदी राइटिंग इन पोस्ट-कोलोनियल इंडिया 1985 में प्रकाशित हुई। जापान के हिंदी सेवी प्रो. क्यूया ने प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का जापानी में अनुवाद किया, जिसका प्रकाशन 1959 में हुआ। 1975 में उनकी पुस्तक जापानी-हिंदी शब्दकोश आई। उनकी प्रमुख रचनाओं में संक्षिप्त हिंदी कोश, हिंदी प्रचार अभ्यास पुस्तिका, हिंदी भाषा प्रवेश शामिल हैं। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के हिंदी प्रोफेसर डॉ. रोनाल्ड स्टुअर्ट मैकग्रेगर ने पाश्चात्य देशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक उच्चकोटि के अनुवादक, संतकाव्य के विशेषज्ञ और व्याकरणाचार्य के रूप में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। उनकी पुस्तक द लैंग्वेज ऑफ इंद्रजीत ऑफ ओरछा भाषा-विज्ञान अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण कृति है। उन्होंने नंददास की रास पंचाध्यायी और भ्रमरगीत का अनुवाद किया। उन्होंने हिंदी व्याकरण पर भी आउटलाइन ऑफ हिंदी ग्रामर नामक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी, जिसे यूरोप सहित अन्य हिंदी अध्यापन वाले देशों में पाठ्य-पुस्तक के रूप में स्वीकार किया गया। आज भी सौ से अधिक देशों में सैकड़ों विद्वान हिंदी की सेवा में जुटे हैं।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 10, 2026, 07:17 IST
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