TEER: सर्जरी के बिना दिल की बीमारी का इलाज, जानें क्या है TEER प्रोसीजर

जिन मरीजों के दिल में माइट्रल वॉल्व लीकेज होता है, उनके लिए ट्रांसकैथेटर एज-टू-एज रिपेयर (TEER) प्रोसीजर एक बेहतर विकल्प हो सकता है। TEER कम से कम चीरा लगाकर (इनवेसिव) उपचार का तरीका है। यह उन मरीजों के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है, जो माइट्रल वॉल्व लीकेज (Mitral Valve Leakage) के गंभीर मामलों में सर्जरी के लिए उच्च जोखिम वाले माने जाते हैं। यह मौजूदा समय में माइट्रल वॉल्व लीकेज के लिए इलाज की सबसे उन्नत तकनीक मानी जाती है। क्या है माइट्रल वॉल्व लीकेज माइट्रल वॉल्व लीकेज को माइट्रल रिगर्गिटेशन के नाम से भी जाना जाता है। यह एक गंभीर हृदय रोग है। इसमें दिल का माइट्रल वॉल्व ठीक से बंद नहीं होता। इसका परिणाम यह होता है कि जब बायां निलय (Left Ventricle) सिकुड़ता है, तो कुछ खून उल्टा बहकर बाएं आलिंद (Left Atrium) में लौट जाता है। इससे रक्त के आगे फेफड़ों की ओर जाने का खतरा पैदा हो जाता है। इससे उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) और सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। यह समस्या मुख्यतः उन मरीजों में देखी जाती है, जिन्हें पहले ह्रदयघात हो चुका हो या जिनका दिल सामान्य आकार से बढ़ा हुआ हो। कुछ मामलों में यह परेशानी ऐसे बुजुर्गों में भी पाई जाती है। इनका माइट्रल वॉल्व समय के साथ कमजोर हो जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर इन मरीजों को समय पर TEER, माइट्रल सर्जरी या वॉल्व रिप्लेसमेंट जैसे विकल्प न दिए जाएं तो 70 फीसदी से ज्यादा मरीजों की जान जाने का खतरा रहता है। माइट्रल वॉल्व हृदय के बाएं आलिंद और बाएं निलय के बीच स्थित होता है। यह फेफड़ों से आए ऑक्सीजन से परिपूर्ण रक्त को शरीर के बाकी हिस्सों तक पहुंचाने का कार्य करता है। हर एक धड़कन के साथ यह पूरी तरह बंद हो जाता है। हालांकि, जब यह वॉल्व पूरी तरह से बंद नहीं होता, तो कुछ रक्त बाएं आलिंद के जरिए फेफड़ों की ओर लौटने लगता है। शुरुआत में इस स्थिति को शरीर खुद संतुलित कर लेता, लेकिन समय के साथ समस्या गंभीर हो सकती है और रक्त का लीकेज बढ़ सकता है। इससे हृदय की काम करने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है और इससे मौत का खतरा भी बढ़ जाता है। क्या हैं माइट्रल वॉल्व लीकेज की वजहें माइट्रल वाल्व लीकेज के प्रमुख कारण हैं। - डिजेनेरिटव वॉल्व डिजीज (वृद्धावस्था में) - अनियमित धड़कनें (Atrial Fibrillation) - रूमेटिक फीवर (गले या मसूड़ों के संक्रमण का इलाज न करवाने से) - दिल का दौरा - इनफेक्टिव एंडोकार्डाइटिस (ह्रदय के वॉल्व में संक्रमण) - जन्मजात रोग (Congenital Valve Defects) लक्षण इस समस्या से जुड़े लक्षण 60 वर्ष की उम्र के बाद दिखने लगते हैं। - सांस फूलना - दिल की धड़कनों का तेज होना - पैरों और एड़ियों में सूजन - ह्रदय से अजीब आवाज आना (Heart Murmur) - सिर का हल्का महसूस होना और थकान - सीने में परेशानी या कमजोरी - बेहोशी इसका पता कैसे लगाया जाता है माइट्रल वॉल्व में समस्या का पता स्थिति बिगड़ने से पहले ही लगाया जा सकता है। इसके लिए ईकोकार्डियोग्राम यानी दिल का अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। बच्चों में जन्म से पहले ह्रदय के वॉल्व से जुड़ी समस्या का पता लगाने के लिए फीटल ईकोकार्डियोग्राम किया जा सकता है। यह बच्चे की मां की गर्भावस्था के दौरान ही किया जा सकता है। अनियमित धड़कनों के लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम किया जा सकता है और दिल के बढ़ने की समस्या का पता लगाने के लिए एक्सरे किया जा सकता है। अगर इन सभी समस्याओं का पहले ही पता लग जाए तो आगे सर्जन ह्रदय में स्थित वॉल्व को बचाने के लिए सही दवाओं से इलाज शुरू कर सकते हैं, जिससे हार्ट फेल या अनियमित धड़कनों के जोखिम से बचा जा सकता है। माइट्रल वॉल्व लीकेज के इलाज का क्या तरीका है अगर माइट्रल वॉल्व लीकेज के मामूली लक्षण दिख रहे हैं तो कुछ दवाओं के जरिए इसे नियंत्रित किया जा सकता है। खासकर शरीर में ज्यादा तरल पदार्थ का बढ़ना रोकने के लिए डियुरेटिक्स (Diuretics) देकर। इसके अलावा बीटा-ब्लॉकर्स (Beta-Blockers) और एसीई इनहिबिटर्स (ACE Inhibitors) के जरिए ह्रदय की कार्यक्षमता को बेहतर किया जा सकता है। जिन मरीजों के ह्रदय की रक्त पंप करने की क्षमता 30 फीसदी से ज्यादा है, उनमें सर्जरी के जरिए भी इलाज किया जा सकता है। हालांकि, माइट्रल वॉल्व लीकेज से जूझने वाले अधिकतर मरीजों में यह क्षमता सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। उनके ह्रदय की रक्त प्रवाहित करने की क्षमता 30 फीसदी से भी कम होती है और ऐसे मरीज पहले से ही दवाओं के जरिए इलाज करा रहे होते हैं। ऐसे लोगों को जरूरत के मुताबिक, TEER प्रक्रिया के जरिए इलाज कराने की सलाह दी जा सकती है। TEER (Transcatheter Edge-to-Edge Repair) प्रक्रिया उन मरीजों के लिए सबसे उपयुक्त है जो सर्जरी के लिए उच्च जोखिम वाले वर्ग में आते हैं। इनमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, वृद्धावस्था, कमजोरी या कमजोर हृदय, किडनी, फेफड़े या लिवर की समस्या झेल रहे लोग शामिल हैं। कैसे होती है TEER प्रक्रिया - TEER एक मिनिमम इनवेसिव प्रोसीजर है यानी इसमें शरीर के साथ कम से कम चीरा लगाया जाता है। यह जनरल एनस्थीशिया के प्रभाव में कैथ लैब (CATH Lab) में की जाती है। मरीज की जांघ की नस (फेमोरल वेन) से कैथेटर डाला जाता है। 3डी ट्रांसओसोफैगल इको (TEE) और एक्स-रे (फ्लोरोस्कोपी) के जरिए शरीर को स्कैन कर कैथेटर को माइट्रल वॉल्व तक पहुंचाया जाता है। - एक छोटा क्लिप माइट्रल वॉल्व की पत्तियों पर लगाया जाता है, ताकि वॉल्व हर धड़कन के साथ ठीक से बंद हो और वॉल्व से रक्त का उल्टा बहाव (रिगर्गिटेशन) रोका जा सके। यह पूरी प्रक्रिया लगभग 3 घंटे में पूरी हो जाती है। TEER प्रक्रिया के क्या हैं फायदे - यह कम से कम चीरे लगाने वाली प्रक्रिया है। - उच्च-जोखिम वाले मरीजों के लिए यह सुरक्षित विकल्प है। - अस्पताल में सिर्फ 3 से 5 दिन रुकना पड़ता है। - हार्ट फेल के दोबारा होने की संभावना कम होती है। - जीवन गुणवत्ता में सुधार होता है। - इलाज के बाद जटिलताएं कम होती हैं और तेज रिकवरी होती है। TEER के बाद देखभाल और रिकवरी TEER के बाद मरीज को 24 घंटे ICU में रखा जाता है और उसकी हृदय गति, रक्तचाप, किडनी की कार्यक्षमता, रक्तस्राव और अन्य जटिलताओं की लगातार जांच और निगरानी की जाती है। अगर प्रोसीजर के बाद मरीज को दिक्कत नहीं होती तो उसे 3–5 दिनों में छुट्टी दी जा सकती है। मेडिकल सलाह के आधार पर मरीज छह हफ्ते के अंदर सामान्य जीवनशैली में लौट सकता है, जैसे टहलना और हल्के कामों में शामिल होना। छह हफ्ते के बाद मरीज डॉक्टर की निगरानी में सामान्य गतिविधियों में शामिल हो सकता है। इस दौरान डॉक्टर मरीजों को ब्लड थिनर्स, एंटी-प्लेटलेट्स, और दिल की कार्यक्षमता सुधारने वाली दवाएं दे सकते हैं। मरीज की स्थिति पर नजर रखने के लिए नियमित फॉलो-अप जरूरी होता है, ताकि वॉल्व की कार्यप्रणाली की निगरानी की जा सके।

#Advertorial #National #University #TopUniversities #VaranasiLiveNews

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jun 20, 2025, 12:43 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




TEER: सर्जरी के बिना दिल की बीमारी का इलाज, जानें क्या है TEER प्रोसीजर #Advertorial #National #University #TopUniversities #VaranasiLiveNews