कौन हैं वंश तायल?: जिन्हें मिला देश का सर्वोच्च बाल सम्मान, पीएम और राष्ट्रपति से मुलाकात ने बदल दी जिंदगी
मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने था और वह मुझसे एकदम सादगी भरे अंदाज में मेरी कहानी पूछ रहे थे। पीएम के साथ बिताए वह चार मिनट में मेरे जीवन की पूरी रूपरेखा खींच गए। फिर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से सात सेकेंड की मुलाकात और उनके हाथ से मिला देश का सर्वोच्च बाल सम्मान किसी सपने से कम नहीं था। राष्ट्रपति मैडम के कांग्रेचुलेशन वंश के शब्द अभी भी मेरे कानों में गूंज रहा है। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से देश के सर्वोच्च बाल सम्मानों में शामिल प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित चंडीगढ़ के वंश तायल की आंखें इतना कहते हुए नम हो गईं। वंश बोले, मेरा हवाई जहाज चंडीगढ़ की ओर बढ़ रहा था और मैं अपने बचपन की ओर। सोच रहा था पैसा बड़ी बात नहीं, काम और नाम बड़ा है। सोचा था बड़ा होकर पैसे कमाने के बाद फ्लाइट बुक कर आसमान में उड़ूंगा, माता-पिता और स्नेहालय द्वारा दी गई परवरिश से पैसा नहीं पर नाम कमाया और शायद यही वजह थी कि हवाई जहाज पर बैठा पर सरकारी खर्च से। सम्मान लेकर शनिवार को लौटे वंश तायल का स्वागत स्नेहालय द्वारा आतिशबाजी और फूल मालाओं से किया गया। चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा उनको इस उपलब्धि के लिए बधाई दी गई और अब उनको पंजाब लोकभवन से आने वाली कॉल का इंतजार है। वंश तायल ने कहा कि उनको जिस काम के लिए राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया उसने उनको सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरित कर दिया है। वह सेक्टर-45 में रहते थे और मां आंगनबाड़ी वर्कर थीं। शायद यही वजह है कि बच्चों को बचपन से देखा और बचपन से ही सेवा भाव समाया था। वंश ने कहा कि चंडीगढ़ देश के लिए एक बड़ा उदाहरण है। उनकी तमन्ना है कि चंडीगढ़़ में कोई भी बेरोजगार न रहे। वह चाहेंगे कि अपनी कमाई का कुछ हिस्सा स्नेहालय के बच्चों के लिए दें जिससे उनकी परवरिश बेहतरीन ढंग से हो सके। वंश तायल ने कहा कि वह चंडीगढ़ में किसी भी गरीब को सड़कों पर सोता नहीं देखना चाहते हैं। राष्ट्रपति के कांग्रेचुलेशन ने गौरवान्वित कर दिया वंश तायल ने कहा कि राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने जब उनको कांग्रेचुलेशन कहा तो गौरवान्वित महसूस किया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ने पूछा था कि यह पुरस्कार उनकी किस खूबी की वजह से मिला है तो उन्होंने सारी स्टोरी बताई। परिस्थितियां कठिन हो जाएं पर हार मत मानना वंश ने कहा कि उनके जैसे कई बच्चे हैं। ऐसे बच्चों को कभी हार नहीं माननी चाहिए। जब माता-पिता का निधन हो गया था तो वह काफी व्यथित हो गए थे। तभी स्नेहालय में एक पांच साल का बच्चा आया था। वह बीमार भी था, वंश ने बताया कि उस समय उस बच्चे की काफी मदद की। फीजियोथेरैपी की। फिर उनको लगा कि जब यह छोटा सा बच्चा सर्वाइव कर सकता है तो वह क्यों नहीं कर सकते।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 28, 2025, 13:57 IST
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