पर्यटन का विस्फोट और खतरे की घंटी: जबलपुर जैसे हादसों का समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं

इस हफ्ते जबलपुर में नर्मदा नदी के बरगी बांध पर मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग की क्रूज बोट के अंधड़ में पलट जाने से नौ लोगों की डूबकर दर्दनाक मौत हो गई। दो हफ्ते पहले उत्तर प्रदेश के वृंदावन में यमुना में भी नाव पलटने से दस लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। सुरक्षा नियमों का लागू न होना और बिना लाइफ जैकेट के पर्यटकों को नावों, स्टीमरों या क्रूज बोट्स में सैर-सपाटा कराना, इन हादसों के मुख्य कारण हैं। ऐसे हादसे देश में आए दिन हो रहे हैं, लेकिन इनसे किसी भी राज्य की सरकार या प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया। लगता भी नहीं कि आने वाले दिनों में इस दिशा में कोई कड़ी पहल की जाएगी। पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों, तीर्थ नगरियों और कुंभ जैसे धार्मिक उत्सवों में लगातार बढ़ती दर्शनार्थियों की भीड़ अब इतनी बेकाबू हो गई है कि उसमें कुचल कर सैकड़ों जानें चली जाती हैं। जैसे जनवरी 2025 में प्रयाग के कुंभ में बहुत लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए थे। यही हाल कई बार वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में हुआ। मार्च 2026 में शीतला मंदिर (नालंदा, बिहार) में पूजा के दौरान भगदड़ में आठ लोग मारे गए, कई घायल हुए। 2025 में देश में कुल आठ से ज्यादा भगदड़ में 129 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें ज्यादातर धार्मिक स्थलों पर हुईं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि उनके यहां पर्यटकों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन यह नहीं बताते कि पर्यटकों की इस बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने में वे कितना विफल हो रहे हैं। भीड़ को व्यवस्थित या नियंत्रित करना बिल्कुल भी असंभव नहीं है। मुझे याद है कि 1984 में मैं स्विट्जरलैंड के माउंट ब्लांक के सर्वोच्च शिखर पर जाने लिए जब उस पर्यटन स्थल से 50 मील दूर था, तो स्थानीय पुलिस ने हमारी जैसी सैकड़ों गाड़ियों को वहीं रोक दिया और हमें तब तक इंतजार करने को कहा, जब तक कि एक खास संख्या में उधर गई गाड़ियां लौट नहीं आईं। इस तरह उन्होंने भीड़ को अनियंत्रित होने से रोका। क्या ऐसी नीतियां हमारी सरकारें नहीं अपना सकतीं अगर वीआईपी की सुरक्षा में तैनात पुलिस को भीड़ नियंत्रण के लिए तैनात किया जाए, तो बहुत हद तक दुर्घटनाओं और परेशानियों से बचा जा सकता है। पर्यटन बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन पर्यटन विस्फोट से जो अव्यवस्था फैल रही है, प्लास्टिक और कूड़े के अंबार लगते हैं, उससे निपटने की न सिर्फ योजना बनाई जानी चाहिए, बल्कि उसे अमल में भी लाया जाना चाहिए। पर्यटन बढ़ाने की इस आपाधापी में प्रांतीय सरकारों को इस बात की चिंता नहीं है कि नागरिकों को खाने की चीजों में कितना जहर परोसा जा रहा है। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे कई अन्य राज्यों में भारी मात्रा में नकली घी के भंडार पकड़े गए हैं। पर ये कार्रवाई प्रतीकात्मक ज्यादा है, प्रभावी कम। इसी तरह रसायनों से बने नकली दूध और पनीर सरेआम बेचा जा रहा है। फल और सब्जियों पर भी हानिकारक कीटनाशक और खतरनाक रसायन छिड़क कर नकली रंगों से तरो-ताजा दिखा कर बेचा जा रहा है। आम आदमी असहाय है, वह कुछ कर नहीं सकता। पर्यटन और तीर्थ क्षेत्रों में तो मिलावट का धंधा कई गुना ज्यादा हो रहा है, क्योंकि विक्रेता के सामने जो ग्राहक खड़ा है, वह एक बार ही पास आया है। अगले दिन कोई दूसरा ग्राहक आ जाएगा। इसलिए उसे शिकायत नहीं झेलनी पड़ती। इस तरह पर्यटन विस्फोट ने इन क्षेत्रों के आधारभूत ढांचों की कमर तोड़ दी है, जिसका समाधान शहरीकरण के नए-नए मेगा प्रोजेक्ट बनाना नहीं है। इससे पर्यटन क्षेत्र का नैसर्गिक स्वरूप व आध्यात्मिक चेतना, दोनों का तेजी से विनाश होता है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत के ये क्षेत्र नासूर बनकर रह जाएंगे। दुनिया के तमाम देशों ने अपने पर्यटन उद्योग को नियमों के तहत रखा है और अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को बिगाड़ने नहीं दिया। अमेरिका के पश्चिमी तट पर एक तरफ पहाड़ व घने जंगल, तो दूसरी तरफ लहराते समुद्र के बीच हमारी कार तेजी से दौड़ रही थी। मुझे भूख लगी, तो मेरे मेजबान ने जंगल के भीतर जाती एक छोटी सड़क पर कार मोड़ दी। कुछ किलोमीटर जंगल पार करने के बाद मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां खाने-पीने और मनोरंजन का एक बड़ा केंद्र था। पर वह समुद्र तट और जंगल के बाद था। इसलिए समुद्र तट का प्राकृतिक सौंदर्य इससे प्रभावित नहीं हुआ था। जबकि केरल में त्रिवेंद्रम का कोवलम बीच या गोवा के समुद्र तट बेतरतीब विकसित हुए होटलों के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो चुके हैं। आखिर हम कब जागेंगे

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: May 04, 2026, 07:39 IST
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