भरोसे की आग पहली चमक: दिखाने का मोल करती खिड़कियां; इवेंट के ईंधन में बदले हमारे सुख-दुख, विश्वास की तलाश...

ऐसा लगता है, जिंदगी का हर क्षण सिर्फ इवेंट हो गया है, जिसे या तो प्रायोजक की तलाश है या एक ऐसे एंडोर्समेंट की जिसमें हम कह सकें कि हमने यह कर दिखाया। दिखाने के लिए, दिखाने को, दिखाने का मोल करती खिड़कियों ने हमारे सुखों, दुखों और आकांक्षाओं को इवेंट के ईंधन में बदल दिया है। हम भौंचक हैं, विश्वास खोज रहे हैं। विश्वास का क्यूआर कोड स्कैन करते हैं और नए अविश्वास के लिंक पर पहुंच जाते हैं। आपमें से बहुतों को मेडागॉस्कर नाम याद आते ही नाचते लीमर दिखाई देते होंगे। कुछ को खूबसूरत जंगलों के साथ कोई राजनीतिक घटना भी याद आती होगी लेकिन अधिकांश, हॉलीवुड की मेहरबानी से एक नाचते-गाते कॉर्निवाल को ही मेडागॉस्कर का पर्याय समझते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि दक्षिणी मेडागॉस्कर के 60 प्रतिशत लोग अकेलापन महसूस करते हैं। क्यों क्योंकि सैलानियों की जगमग से चौंधियाया हुआ दुकानदार कहता है, आसपास ग्राहक ज्यादा हैं, दोस्त नहीं। इस दूसरे आंकड़े को देखिए। बर्तानवी पालतू जानवरों की दीवानगी का आलम यह है कि दो हजार के सैम्पल में सारे वे लोग थे जिन्होंने इंस्टाग्राम पर पालतू के फोटो अपने पार्टनर के मुकाबले, तीन गुना ज्यादा पोस्ट किए। लंदन की लैंडमार्क कही जाने वाली जगहों पर पालतुओं के पोट्रेट खिंचवाने का नया दौर चल पड़ा है। 2025 में 49 प्रतिशत बिल्ली पालने वाले प्रोफेशनल थे और 16 प्रतिशत वे थे जिन्होंने अपने पालतू का सोशल मीडिया एकाउंट बना रखा था। और, ताजा खबर है कि ओपन एआई ने एक एप लॉन्च किया है-टेक्स्ट विद् जीसस! आप अपनी आत्मिक परेशानियों के सवाल वहां कर सकते हैं। बिल्कुल जीसस जैसा एक अवतार आपको जवाब देता है। करीब डेढ़ लाख यूजर हो गए हैं जो अपनी आशा, निराशा, संदेह और भ्रम उस अवतार से दूर करवाने को प्रस्तुत हैं। पोप लियो ने कहा है, इस एग्रीगेटेड डेटा उर्फ संकलित ज्ञान भंडार से अपनी जिंदगी का ज्ञान मत लो। जीवन है, जीवन की तरह, जीवन से जीवनी शक्ति लो। नए साल पर ऐसी बातें इसलिए कि सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों को चुनने वाले शब्दकोश भी सिर्फ और सिर्फ ऑनलाइन जिंदगी से सत्व लेने पर मजबूर हैं। वेब्स्टर को स्लॉप (Slop) शब्द सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगा है जिसका सीधा अर्थ है एआई से बना घटिया कन्टेंट! ऑक्सफोर्ड को रेज बेट (Rage Bait) स्वाभाविक ही इसलिए उचित जान पड़ा क्योंकि उकसाने के इरादे से डाले गए कन्टेंट की बहार है। जब कुछ न हुआ तो कैम्बि्रज की पकड़ में आया-पैरा सोशल (Para Social)। इसे यूं समझिए कि सोशल में तो कुछ इधर के, कुछ उधर के हो सकते हैं। इसमें सिर्फ एकतरफा ही चाहिए। सोशल साइंटिस्ट रॉबर्ट पटनम का निष्कर्ष है कि लोग दूसरों पर भरोसा करना छोड़ रहे हैं। साठ के दशक में अगर 55 प्रतिशत भरोसा था तो नब्बे के दशक तक आते-आते 34 प्रतिशत रह गया। अभी के नए आंकड़े और डरा सकते हैं। उबन्तू एक दक्षिण अफ्रीकी जीवन दर्शन है। उसका सार है-मैं हूं क्योंकि हम हैं। एक आदमी दूसरे आदमियों से आदमी बनता है। मगर विश्व स्वास्थ्य संगठन का 150 देशों का सर्वे कहता है, उबन्तू के देश में भी उबन्तू छीज रहा है। तो हमें क्या नए साल की सुबह संदेह और अविश्वास से शुरू करना चाहिएक्षमा कीजिए, मेरा ख्याल है, आपको एक बार फिर विश्वास के खेल या ट्रस्ट गेम के नियमों से गुजर जाना चाहिए। सोचिए, आखिर हम अनजानों पर कैसे भरोसा करते हैं रेस्तरां में ऑर्डर करते हैं और मानते हैं कि वेटर जो खाने के लिए लाएगा वह शुद्ध और सेहतमंद होगा। वेटर भरोसा करता है कि आप खाने के बाद बिल चुकाएंगे। मालिक विश्वास करता है कि वेटर रोजाना सही वक्त पर काम पर आएगा। वेटर विश्वास करता है कि महीने की तय तारीख पर उसे तनख्वाह मिलेगी। आप सैलून में सिर झुकाकर बैठते हैं और विश्वास से कैंची चलने देते हैं। प्लंबर और ड्राईक्लीनर या ड्राइवर के भरोसे नल, कपड़े या गाड़ी छोड़ देते हैं। मगर जब ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं तो विश्वास की दिशा बदल जाती है। आप पैसा पहले देते हैं और विश्वास करते हैं कि ऑर्डर तय वक्त पर घर पहुंच जाएगा। दूसरी तरफ आपकी अलार्म क्लॉक धोखा दे जाए और सही वक्त पर अलार्म न बजे तो विश्वास / धोखा = निराशा का जो समीकरण होगा क्या वही तब भी होगा जब कोई करीबी दोस्त तय वक्त पर एक महत्वपूर्ण मिलन की बेला में न पहुंचे।यानी एक तरफ घड़ी है, एक तरफ आदमी। विश्वास भी जीवन के होने न होने से बदल जाता है। अब थोड़ी सी कहानी रेशनल एक्टर मॉडल की। जब आपको पता होता है कि किसी का फायदा उठाने से उसका कुछ नुकसान नहीं होगा तो आप उसके विश्वास का फायदा उठा लेते हैं। डेविड लुडन ने ट्रस्ट गेम का उदाहरण देते हुए एक जगह कहा है, ए को पांच रुपए दो और कहो कि वह बी को देगा तो चौगुने हो जाएंगे। 'बी' के पास बीस होने पर वह दस ए को दे देगा। तो इस हिसाब से खेल के लिए दोनों तैयार हो जाएंगे। क्योंकि अंतत: दोनों के पास दस-दस होंगे जो मूल पांच से ज्यादा ही होंगे। लेकिन यही बात उनसे ऐसे कही जाए कि पांच लॉटरी में लगा दो। पचास-पचास प्रतिशत जीत-हार के चांस रहेंगे, ये पचास हो सकते हैं। तो तब शायद कोई तैयार नहीं होगा। वजह लॉटरी आदमी नहीं है। आदमी, अनजान आदमी पर भरोसा कर सकता है, बनिस्बत किसी प्राणहीन वस्तु के। किसी लॉटरी या घड़ी पर उसकी आशाएं-निराशाएं बिल्कुल अलग होती हैं।हम परोपकार भी इसलिए करते हैं कि अच्छा लगता है। ऐसा करना चाहिए-इस सामूहिक विश्वास की दीवार पर खड़े होकर भरोसे की चमक देखते हैं। संदेह का लाभ भी तभी तक किसी को मिलता है, जब लाभ का भरोसा हो। कई बार जब भरोसे सिकुड़ते हैं तो अस्तित्व सिकुड़ता है। इस दौरान मानवीय आकांक्षाओं और आत्मिक उलझनों की पहचान के दुर्लभ चित्र भी खड़े हो जाते हैं। रूस के प्रहार और चीन की दंबगई के बीच अमेरिका से परित्यक्त यूरोप अपनी अस्मिता और शक्ति, खाने में खोज रहा है। हाल में इटली की कृषि मंत्री इस बात पर भड़क गई थीं कि ब्रसेल्स में एक दुकान जो रेडीमेड कार्बोनारा सॉस (Carbonara Saus) बेच रही थी, उसके मूल तत्व रेसिपी से अलग थे। उनका कहना था, क्रीम मिला कार्बोनारा कैसे बेचा जा सकता है पिज्जा पर पाइन एपल कैसे होगा सबकी अपनी शुद्ध रेसिपी हैं। करंसी और कानून एक करने को तैयार यूरोप खाने पर क्यों हिल रहा है इसलिए कि, उसे उसमें अस्तित्व का बचा आकाश दिखाई देता है।यह स्वयं को बचा लेने की एक सभ्यतागत तरकीब है। दुनिया के सर्वाधिक कमाई करने वाले यूट्यूबर मिस्टर बीस्ट ने मशहूर जादूगर डेविड ब्लेन के एक स्टंट की कॉपी फिल्माई और उसे 285 मिलियन बार देखा गया। तो असली जादूगर कौन हुआ मिस्टर बीस्ट या डेविड ब्लेनठहर कर सोचिए। अपने भीतर के भरोसे की आग की पहली चमक को याद कीजिए। आप डेविड ब्लेन के साथ जाएंगे।शुभकामनाएं।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 01, 2026, 07:52 IST
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