रोशनी यहां है: एक हादसे ने बदली लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश की जिंदगी, लाखों लोगों के लिए बने प्रेरणा

आज से छत्तीस वर्ष पहले साल 1989 में तमिलनाडु में एक बालक ने जन्म लिया। समय के साथ उसकी सोच और लक्ष्य, दोनों स्पष्ट होते गए। वह लड़का धरती को केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानता था। जब उसने जाना कि तमिल भाषा में नाडु का अर्थ ही भूमि होता है, तब उसके भीतर अपनी मिट्टी के प्रति एक अनोखा प्रेम जाग उठा-एक ऐसा प्रेम, जिसने धीरे-धीरे देशभक्ति का रूप ले लिया। कॉलेज पहुंचा, तो उसकी नजरें केवल एक डिग्री पर नहीं थीं, बल्कि वह अपने देश के लिए कुछ करना चाहता था। जीवन में एकता और अनुशासन को आधार बनाकर उसने एनसीसी जॉइन की। वहीं से उसकी यात्रा ने दिशा पकड़ी। वर्ष 2009 में वह लेफ्टिनेंट की वर्दी पहनकर अपने सपने के पहले पड़ाव पर पहुंचा। पर 2014 में एक दुर्घटना ने उसकी दोनों आंखों की रोशनी छीन ली। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसकी इसी दृढ़ता ने उसे एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया, जिससे उसका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। आज वह भारत के सशस्त्र बलों के पहले ऐसे अधिकारी हैं, जिन्होंने पूरी तरह से दृष्टिहीन होने के बावजूद सेना में अपनी सेवा जारी रखी। सिर्फ इतना ही नहीं, सैन्य सेवा के साथ वह पैरालंपिक खेलों में भी चमकते सितारे बन गए। उनकी अटूट इच्छाशक्ति और साहस को सम्मान देते हुए, हाल ही में उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्यांगजन श्रेणी में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार-2025 से सम्मानित किया गया है। उनका नाम है लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश चंद्रशेखरन। इससे पहले प्रधानमंत्री कार्यालय भी उनके असाधारण प्रदर्शन को सम्मानित कर चुका है। द्वारकेश चंद्रशेखरन हिम्मत और पक्के इरादों की मिसाल हैं, और उनकी शानदार यात्रा सभी, खासकर युवाओं के लिए प्रेरणा है। बचपन का ख्वाब लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश चंद्रशेखरन की शुरुआती यात्रा साहस, अनुशासन और बचपन से ही सेना में अधिकारी बनने के सपने से जुड़ी रही है। वे तमिलनाडु से हैं, लेकिन पढ़ाई और सेवा के दौरान पुणे से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा। स्कूल के समय उन्होंने एनसीसी जॉइन की और 2004 में तमिलनाडु निदेशालय की ओर से बेस्ट एनसीसी कैडेट चुने गए, जिससे उनके सैन्य कॅरिअर की मजबूत नींव पड़ी। इसके बाद टेक्निकल एंट्री स्कीम के तहत प्रशिक्षण लेकर उन्होंने 2009 में भारतीय सेना में अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया और सैन्य खुफिया कोर में एक युवा, ऊर्जावान अधिकारी के रूप में सेवा शुरू की। एक हादसे ने बदली जिंदगी लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश चंद्रशेखरन के जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 2014 में हुए एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। पुणे में हुए इस हादसे में उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी गंवा दी। वह आठ महीनों तक अस्पताल में रहे। इस घटना में सेना के दूसरे जवान भी मारे गए। आमतौर पर अगर किसी जवान के साथ ऐसी कोई घटना होती है, तो सेना में कॅरिअर खत्म ही माना जाता है, लेकिन द्वारकेश ने लेफ्टिनेंट के पद पर सक्रिय रूप से सेवा जारी रखने का साहसी फैसला लिया। उन्होंने धीरे-धीरे और थोड़ा-थोड़ा करके अपनी जिंदगी को फिर से बुना। सियाचिन ग्लेशियर पर चढ़ाई दृष्टि खोने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई और खेल को अपनाकर जीवन को नई दिशा दी। 2018 में खड़की (किरकी) में तैनाती के दौरान उन्होंने पैरा-स्पोर्ट्स की शुरुआत की और पुणे में तैराकी व शूटिंग में भाग लेना शुरू किया। 2021 की राष्ट्रीय पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में पहला पदक जीतने के बाद वे लगातार राष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता रहे। वे तैराकी और निशानेबाजी दोनों में नेशनल चैंपियन हैं, पैरा शूटिंग में विश्व रिकॉर्ड बना चुके हैं और 10 मीटर एयर राइफल में विश्व रैंकिंग में तीसरे स्थान पर हैं। खेलों के साथ उन्होंने यूजीसी-नेट सहित कई परीक्षाएं पास कीं और सियाचिन ग्लेशियर पर चढ़ाई कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी हासिल की। एआई बना गेमचेंजर दृष्टि खोने के बाद द्वारकेश चंद्रशेखरन के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजमर्रा के काम, पढ़ाई और सैन्य जिम्मेदारियों को निभाने की थी। लेकिन उन्होंने तकनीक को बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनाया। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित जावा स्क्रीन रीडर, वॉयस कमांड सिस्टम, टेक्स्ट-टू-स्पीच और स्पीच-टू-टेक्स्ट टूल्स का इस्तेमाल सीखकर अपनी कार्यक्षमता को बनाए रखा। वह एआई की मदद से दस्तावेज पढ़ने-लिखने और प्रशासनिक कार्यों को प्रभावी ढंग से करने लगे। यही नहीं, उन्होंने एआई-आधारित स्पोर्ट्स एनालिसिस और डाटा टूल्स का उपयोग करके पैरा शूटिंग और तैराकी में भी अपनी तकनीक को बेहतर किया। एआई ने उन्हें यह साबित कराया कि तकनीक सही हाथों में हो, तो वह किसी भी शारीरिक सीमा को पीछे छोड़ सकती है। युवाओं को सीख परिस्थितियां आपको नहीं, आपका दृष्टिकोण आपको परिभाषित करता है। अंधकार तब तक ही ताकतवर होता है, जब तक इन्सान अपने भीतर के उजाले को पहचान नहीं लेता। शरीर की सीमाएं मंजिल तय नहीं करतीं, इरादों की मजबूती तय करती है कि इन्सान इतिहास रचेगा या बहाने।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 15, 2025, 08:04 IST
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