NGT की रिपोर्ट में खुलासा: यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र की सीमा तय करने में देरी, अब अगस्त 2026 तक टली प्रक्रिया

राजधानी में यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) को चिन्हित करने और अवैध कब्जे हटाने का काम राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के सख्त आदेशों के बावजूद रेंग रहा है। तकनीकी दिक्कतों की वजह से यह प्रक्रिया अब अगस्त 2026 तक टल गई है। यह खुलासा दिल्ली सरकार ने एनजीटी को सौंपी अपनी ताजा रिपोर्ट में किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जियोस्पेशियल दिल्ली लिमिटेड (जीएसडीएल) ने 2007-2008 के पुराने डेटा से एक पीडीएफ मैप तैयार किया, जिसमें 1 मीटर ऊंचाई वाली कंटूर लाइनों को 1:100 साल की बाढ़ सीमा पर लगाया गया। शुरुआती जांच में पाया गया कि यह सीमा ज्यादातर 209-210 मीटर ऊंचाई से मैच करती है, लेकिन जमीन पर वास्तविक जांच (ग्राउंड ट्रूथिंग) नहीं हुई। सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग (आईएंडएफसी) को इसकी जांच करनी है। यह मामला 2023 में एक मीड़िया रिपोर्ट से शुरू हुआ, जिसमें बताया गया था कि यमुना के 22 किलोमीटर हिस्से (वजीराबाद से पल्ला तक) में अवैध निर्माणों की वजह से बाढ़ आई थी। ऐसे में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को अपना मास्टर प्लान बदलना पड़ा। एनजीटी ने खुद ही इस पर संज्ञान लिया और हाई-लेवल कमेटी बनाई। अब तक कई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल हो चुकी हैं, लेकिन प्रगति नाममात्र की है। रिपोर्ट के मुताबिक, पुणे की सेंट्रल वाटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन (सीडब्ल्यूपीआरएस) को सौंपी गई स्टडी पहले 31 अगस्त 2025 तक पूरी होनी थी, लेकिन सर्वे ऑफ इंडिया (एसओआई) से मिला डेटा अपर्याप्त निकला। वहीं, बुराड़ी गार्डन से ओखला बर्ड सैंक्चुअरी तक 28.3 किलोमीटर का हिस्सा गायब है। अब आईएंडएफसी एयरबस कंपनी से नया डेटा खरीदेगा, जो 45 दिन में आएगा। उसके बाद सीडब्ल्यूपीआरएस को अंतिम मैप बनाने में 5 महीने लगेंगे।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 29, 2025, 08:07 IST
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