राम वी सुतार: जिनके हाथों में पत्थर बोलते थे
दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के रचयिता के रूप में अमर हो गए राम वी सुतार के निधन से भारतीय मूर्तिकला जगत के एक युग का अंत हो गया। वह मूर्तियों में ऐसी जीवंतता लाते थे, मानो पत्थर बोल उठे। उनकी पहली बड़ी रचना 45 फुट ऊंची चंबल माता की प्रतिमा थी, जो मध्य प्रदेश के गांधी सागर बांध पर स्थापित है। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इससे प्रभावित होकर उन्हें भाखड़ा बांध के श्रमिकों की स्मृति में एक विशाल स्मारक बनाने का कार्य सौंपा। उन्होंने छह दशकों में 8,000 से अधिक मूर्तियां बनाईं, जिनमें से 50 से ज्यादा विशाल स्मारक हैं। राम सुतार जी का जन्म 19 फरवरी, 1925 को महाराष्ट्र के धुले जिले में हुआ था। उनके पिता वंजी हंसराज बढ़ई और मूर्तिकार थे। उनकी प्रतिभा को उनके गुरु श्रीराम कृष्ण जोशी ने पहचाना व बंबई (अब मुंबई) के प्रसिद्ध सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला दिलवाया। 1953 में उन्होंने मॉडलिंग में मेयो गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद उन्होंने पुरातत्व विभाग में बतौर मॉडलर अजंता-एलोरा की गुफाओं में प्राचीन मूर्तियों की बहाली सीखी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची कांस्य प्रतिमा है, जो गुजरात के नर्मदा जिले में स्थित है। स्प्रिंग टेंपल बुद्धा से भी ऊंची इस प्रतिमा ने ही उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। सुतार जी को अपनी संसद भवन परिसर में ध्यानमग्न मुद्रा में स्थापित महात्मा गांधी की 17 फुट ऊंची प्रतिमा बेहद प्रिय थी। सुतार जी ने ही पटना के गांधी मैदान में स्थापित गांधी जी की मूर्ति को भी तैयार किया है। राजघाट के पार्किंग क्षेत्र में मौजूद 1.80 मीटर ऊंची गांधी जी की कांस्य प्रतिमा भी उन्होंने ही डिजाइन की थी। संसद में छत्रपति शिवाजी महाराज की घुड़सवारी की मुद्रा वाली प्रतिमा भी उनकी ही कृति है। उनके अन्य उल्लेखनीय कार्य अमृतसर में महाराजा रणजीत सिंह की 21 फुट ऊंची प्रतिमा, कुरुक्षेत्र में कृष्ण-अर्जुन रथ स्मारक, बंगलूरू में केंपेगौड़ा की 108 फुट ऊंची प्रतिमा व गोवा में भगवान राम की 77 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा है। उन्होंने डॉ. आंबेडकर, गोविंद बल्लभ पंत व कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं की मूर्तियां भी बनाईं। वह कहते थे कि मूर्तिकला केवल कला नहीं, बल्कि इतिहास को संरक्षित करने का माध्यम भी है। 90 की उम्र पार करने के बाद भी वह सक्रिय रहे और अयोध्या में भगवान राम की प्रस्तावित विशाल प्रतिमा के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। वह धुन के पक्के थे और अपने आसपास की दुनिया के ध्यानपूर्वक निरीक्षण में सक्षम थे। अमर उजाला शब्द सम्मान की गंगा की प्रतिकृति भी उन्हीं के हाथों बनी थी। वह कहते थे कि मूर्तिकार से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह तय समयसीमा पर काम पूरा कर लेगा। मूर्तिकला समय लेने वाली और श्रमसाध्य प्रक्रिया है। अच्छे मूर्तिकार को धैर्यवान, दृढ़ व प्रतिबद्ध होना चाहिए। उसे कला के इतिहास और सिद्धांत का भी ज्ञान होना चाहिए। अच्छा मूर्तिकार तकनीकी रूप से कुशल, रचनात्मक, कल्पनाशील, अवलोकनशील, समस्या-समाधान में कुशल होता है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 19, 2025, 07:00 IST
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