मुद्दा: खाप पंचायतों का प्रगतिशील चेहरा, समस्याओं पर कर रही विचार

हाल ही में, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद के सोरम गांव में एक बहुत बड़ी सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत आयोजित की गई। इसमें उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के 36 बिरादरियों के खाप चौधरी, थांबेदार और हजारों किसानों ने सामाजिक सुधार से जुड़े 11 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर सर्वसम्मति से मुहर लगाई। कुछ वर्ष पहले खाप पंचायतों के प्रेम विवाह व प्रेमी-युगलों से संबंधित कुछ फैसलों को लेकर कई सवाल उठे थे। इस पंचायत में भी माता-पिता की सहमति से प्रेम विवाह करने की बात की गई और लिव-इन-रिलेशनशिप का विरोध किया गया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट से प्रेम विवाह को कानूनी मान्यता न देने की अपील की गई। सवाल यह है कि इस दौर में इस तरह के फैसले कितने प्रासंगिक हैं 21वीं सदी में पंचायत के इन दो-तीन फैसलों पर समाज के लोगों और बुद्धिजीवियों के विचारों मेें मतभेद हो सकता है, लेकिन इसमें ज्यादातर ऐसे फैसलों पर भी मुहर लगाई गई, जो इस दौर में काफी प्रासंगिक हैं। सोरम पंचायत में मृत्यु भोज, दहेज प्रथा व कन्या भ्रूण हत्या पर प्रतिबंध, नशा मुक्ति, पर्यावरण और जल संरक्षण पर महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। इसके अतिरिक्त, शिक्षा का स्तर ऊंचा करने और लड़कियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। पंचायतों में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात भी कही गई। 21वीं सदी में खाप पंचायतों की प्रासंगिकता और उनके परंपरागत रवैये पर कई सवाल उठ चुके हैं, लेकिन यदि खाप पंचायतें समय की जरूरत को भांप कर वर्तमान समस्याओं पर मंथन कर रही हैं, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। अब गांवों में बड़े पैमाने पर मृत्यु भोज का चलन बढ़ता जा रहा है। शहरों में आमतौर पर लोग तेरहवीं में शोक सभा के समय ही पहंुचते हैं और भोजन नहीं करते। आमतौर पर रिश्तेदार ही भोजन करते हैं। लेकिन ग्रामीण इलाकों में पूरे गांव को मृत्यु भोज में आमंत्रित करने का चलन बढ़ता जा रहा है। पहले मृत्यु भोज में बहुत कम व्यंजन परोसे जाते थे। मसलन उत्तर भारत में नीचे पंगत में बैठाकर आलू, पूड़ी, कद्दू, मठ्ठा और लड्डू परोसे जाते थे, लेकिन आज मृत्यु भोज में काफी ज्यादा व्यंजन परोसे जाने लगे हैं। लगता है कि जैसे यह भोज मृत्यु के अवसर पर नहीं, बल्कि शादी के अवसर पर हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में तेरहवीं में बड़ी-बड़ी दावतों के आयोजन को स्टेटस सिंबल बना दिया गया है। तेरहवीं की इन दावतों मेें राजनेताओं को भी आमंत्रित किया जाता है और समाज में अपना रुतबा दिखाने की कोशिश की जाती है। खाप पंचायतें मृत्यु भोज पर रोक लगाने की बात पहले से ही कहती रही हैं, लेकिन इसे ग्रामीणों ने उस तरीके से स्वीकार नहीं किया, जिस तरीके से किया जाना चाहिए था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर समाज के कुछ गांवों में जरूर मृत्यु भोज बंद कर दिया गया है। सोरम की सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत में चौधरियों ने कहा कि मृत्यु भोज से छोटे किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है। छोटे किसान बड़े किसानों की देखादेखी बड़े स्तर पर मृत्यु भोज का आयोजन करना चाहते हैं, भले ही रुपये उधार लेकर उन्हें यह काम करना पड़े। इसी वजह से पंचायत में मृत्यु भोज को खत्म करने की अपील की गई। खेती की लागत निरंतर बढ़ती जा रही है। ऐसे में, किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ता है, तो उनका आर्थिक गणित गड़बड़ा जाता है। इस दौर में कुछ अपवादों को छोड़कर किसानों के बच्चे ही खेती नहीं करना चाहते हैं। गांव में किसानों ने पशु रखने बंद कर दिए हैं या फिर कम पशु रखने लगे हैं। परिवार में जब विभाजन होता है, तो पीढ़ी दर पीढ़ी खेतों का आकार कम होता चला जाता है। गांवों में नशे की बढ़ती लत के कारण कई किसान परिवार बर्बाद हो गए हैं। यही कारण है कि खाप पंचायतें बच्चों को नशे से दूर रहने का आह्वान कर रही हैं। कन्या भ्रूण हत्या की वजह से लैंगिक अनुपात बिगड़ रहा है। लड़कों की शादी के लिए उस अनुपात में लड़कियां नहीं मिल पा रही हैं। इसलिए खाप पंचायतें भ्रूण हत्या को रोकने की बात भी कह रही हैं। शादी में दहेज देने के लिए कर्ज लेना पड़ता है, जिससे उबरने में किसानों को कई साल लग जाते हैं। इसी वजह से दहेज प्रथा को खत्म करने की बात भी कही गई है। बड़ी बात यह है कि खाप पंचायतें पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और पंचायतों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं। इन सारी समस्याओं को देखते हुए खाप पंचायतें यह समझ रही हैं कि शिक्षा के बिना किसानों के बच्चों का उद्धार नहीं हो सकता। इसी तरह कई मुद्दों पर सोरम पंचायत में दिशा-निर्देश तैयार किए गए। इन सभी दिशा-निर्देशों का असली उद्देश्य यही है कि किसान अपने बच्चों को अधिक से अधिक पढ़ाएं। खाप पंचायतों के इन प्रयासों का निश्चित रूप से स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन देखना यह होगा कि खाप पंचायतों के ये फैसले ग्रामीण समाज किस हद तक स्वीकार कर पाता है। कुछ अपवादों के बावजूद क्या खाप पंचायतें प्रगतिशीलता की तरफ बढ़ रही हैं

#Opinion #KhapPanchayat #Khap #खाप #खापपंचायत #VaranasiLiveNews

  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 09, 2025, 05:27 IST
पूरी ख़बर पढ़ें »




मुद्दा: खाप पंचायतों का प्रगतिशील चेहरा, समस्याओं पर कर रही विचार #Opinion #KhapPanchayat #Khap #खाप #खापपंचायत #VaranasiLiveNews