जानी दुश्मन... प्रदूषण: लोगों की जिद और आदतें दिल्ली को गैस चैंबर बनाने के लिए जिम्मेदार, हर जतन बेकार
सर्दी के शुरुआती महीनों में राजधानी की हवा जहर बन जाती है। हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि देश-दुनिया में दिल्ली को गैस चैंबर कहा जाने लगता है। आमतौर पर इसके लिए पराली जलाने, मौसम की मार या हवा की रफ्तार को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, लेकिन कारण यही नहीं है। विशेषज्ञों और सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, दिल्ली की बिगड़ती हवा के पीछे खुद दिल्लीवासियों की रोजमर्रा की कुछ आदतें भी बड़ी वजह हैं। अकेले कार लेकर निकलना, छोटे सफर के लिए भी निजी वाहन का इस्तेमाल करना, खुले में कचरा जलाना, नियमों के बावजूद दिवाली पर पटाखे फोड़ना और प्रदूषण से जुड़े नियमों को हल्के में लेना ये सब मिलकर शहर की हवा को और जहरीला बना रहे हैं। जब तक इन आदतों पर लगाम नहीं लगेगी, दिल्ली की हवा को साफ करना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। राजधानी में मेट्रो और बसें जैसे अच्छे सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अपनी कारों में अकेले सफर करना पसंद करते हैं। इससे ट्रैफिक बढ़ता है और वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा को जहरीला बनाता है। ब्लूक्राफ्ट और सीएसई समेत कई अन्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में करीब एक करोड़ से ज्यादा वाहन हैं और इनसे निकलने वाला प्रदूषण पीएम2.5 के 15-25 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार है। लोग कहते हैं कि बस स्टॉप या मेट्रो स्टेशन तक पैदल जाना गंदा लगता है, लेकिन यही आदत प्रदूषण का चक्र चलाती रहती है। अगर ज्यादा लोग सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करें, तो उत्सर्जन कम हो सकता है। खुले में कचरा जलाना, गरीब बस्तियों की मजबूरी पर्यावरणविद् प्रवीण मिश्रा के अनुसार, शहर की गरीब बस्तियों और गांवों में लोग कचरा, पत्तियां या लकड़ी खुले में जला देते हैं, क्योंकि उनके पास बेहतर विकल्प नहीं होते। यह आदत पीएम2.5 के स्तर को तेजी से बढ़ाती है। इसके अलावा, आईआईटी कानपुर की एक स्टडी से पता चलता है कि सर्दियों में रात के समय 70 फीसदी महीन कण इसी जलाने से बनते हैं। वहीं, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में 41 फीसदी घरों में लकड़ी या गोबर जैसे ईंधन इस्तेमाल होते हैं, जो धुआं फैलाते हैं। दीपावली पर पटाखों की जिद कई रिपोर्ट के अनुसार, दीपावली पर पटाखे फोड़ना दिल्लीवासियों की पुरानी आदत है, लेकिन 2025 में भी प्रतिबंध के बावजूद लोगों ने इसे जारी रखा। सीपीसीबी के आकंड़ों से पता चलता है कि दीपावली के बाद दिल्ली की हवा खतरनाक हो गई, क्योंकि पटाखों से निकलने वाला धुआं कम हवा की वजह से फंस जाता है। सीपीसीबी का कहना है कि पटाखे मौसमी पीएम2.5 में 30-40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज जोड़ते हैं। हालांकि, यह स्पाइक 24 घंटे में कम हो जाता है। डीपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पटाखों के अलावा निर्माण और इंडस्ट्री भी प्रदूषण बढ़ने में योगदान देते हैं। पुराने वाहन और निर्माण की अनदेखी दिल्ली में पुराने वाहन चलाना या निर्माण साइटों पर नियम न मानना आम है। लोग नियम तोड़ते हैं और फिर सिस्टम को कोसते हैं। ब्लूक्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि डीजल जेनरेटर सेट्स और निर्माण से निकलने वाली धूल 38-56 फीसदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। एक सर्वे से पता चला कि 82 फीसदी दिल्लीवासी जानते हैं कि कोई न कोई उनके आसपास प्रदूषण से बीमार है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन आदतों को बदलकर ही दिल्ली की हवा साफ हो सकती है। सीएसई की विशेषज्ञ शांभवी शुक्ला ने बताया कि सरकार को सख्ती से नियम लागू करने चाहिए और लोगों को जागरूक होना चाहिए।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 26, 2025, 02:11 IST
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