खंडित दुनिया और कूटनीति की सीमाएं: स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को कुछ समझौते करने पड़ेंगे
इस्लामाबाद में संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच हालिया वार्ता एक बार फिर यह स्पष्ट करती है कि आज की खंडित वैश्विक व्यवस्था में कूटनीति की सीमाएं कितनी गहरी हो चुकी हैं। जिस बातचीत को शुरुआत में एक संभावित बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा था—जिसे पाकिस्तान ने आयोजित किया और चीन तथा कुछ खाड़ी देशों का समर्थन प्राप्त था—वह अंततः विफलता में समाप्त हुई। लेकिन इस विफलता के पीछे एक जटिल कहानी छिपी है, जो बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों, प्रतिस्पर्धी रणनीतिक हितों और स्थायी शांति की राह में मौजूद संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करती है। पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास उसकी महत्वाकांक्षा और आवश्यकता, दोनों को दर्शाता है। आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट से जूझ रहे इस देश के लिए कूटनीति अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रासंगिकता पुनः स्थापित करने का एक साधन है। उच्च-स्तरीय वार्ताओं की मेजबानी करके और बैकचैनल संवाद को प्रोत्साहित कर इस्लामाबाद ने वैश्विक ध्यान आकर्षित करने में सफलता तो हासिल की, लेकिन ठोस परिणाम देने में असफल रहा। यह भूमिका उसके लिए नई नहीं है। 1971 में अमेरिका–चीन निकटता के दौरान हेनरी किसिंजर की गुप्त बीजिंग यात्रा, जिसे याह्या खान ने संभव बनाया, और जिसने आगे चलकर रिचर्ड निक्सन की ऐतिहासिक चीन यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया, इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने अमेरिका और तालिबान के बीच वार्ताओं में भी मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। हालांकि, इस बार स्थिति कहीं अधिक जटिल है। शीत युद्ध के दौर की अपेक्षाकृत स्पष्ट रणनीतिक पुनर्संरचना के विपरीत, अमेरिका-ईरान संघर्ष क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं, वैचारिक टकरावों और सुरक्षा चिंताओं के जटिल जाल में उलझा हुआ है। यहां तक कि संघर्ष विराम की परिभाषा भी सभी पक्षों के लिए अलग-अलग है। ऐसे परिदृश्य में पाकिस्तान की भूमिका सीमित रहना तय था—वह एक सुगमकर्ता (facilitator) तो बन सकता था, लेकिन निर्णायक मध्यस्थ नहीं। इस्लामाबाद में हुई वार्ता की विफलता, जिसमें जेडी वेंस को लंबी बातचीत के बाद लौटना पड़ा, मुख्यतः ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरे मतभेदों का परिणाम थी। अमेरिका के लिए यह सुनिश्चित करना कि ईरान परमाणु हथियार न बनाए, एक अनिवार्य शर्त है। वहीं, ईरान इन मांगों को अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता पर हमला मानता है। यही मूलभूत असहमति वार्ता को आगे बढ़ने से रोकती है। इसके अलावा, तेहरान द्वारा रखी गई अन्य शर्तें—जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, जमे हुए धन की रिहाई और युद्ध क्षतिपूर्ति—स्थिति को और जटिल बनाती हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संकट का केंद्र है। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा वहन करता है, और इसका बंद होना अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालता है। संघर्ष के दौरान इसके अवरुद्ध होने से तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की आशंकाएं बढ़ गईं। अस्थायी संघर्ष विराम ने इस मार्ग के फिर से खुलने की उम्मीद जगाई थी, लेकिन व्यापक समझौते के अभाव में यह अनिश्चित बना हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्रीय संघर्ष अब वैश्विक आर्थिक स्थिरता से गहराई से जुड़े हुए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, हालांकि अक्सर उसे गलत तरीके से समझा जाता है। बीजिंग के सक्रिय प्रयास वास्तव में भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा से अधिक आर्थिक व्यावहारिकता से प्रेरित हैं। एक निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण, जो खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आयात पर निर्भर है, चीन के लिए क्षेत्रीय स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और व्यापार मार्गों में बाधा उसके आर्थिक विकास के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसके बावजूद, चीन ने प्रत्यक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाने से परहेज किया है। उसने संवाद को प्रोत्साहित करने, पाकिस्तान जैसे देशों का समर्थन करने और किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होने से बचने की रणनीति अपनाई है। यह दृष्टिकोण चीन की व्यापक विदेश नीति को दर्शाता है। वह कूटनीतिक पहलों को समर्थन देने और सुविधा प्रदान करने के लिए तैयार रहता है, लेकिन किसी भी पक्ष पर दबाव डालने से बचता है। ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों की बहाली में उसकी सफलता एक अलग परिस्थिति का परिणाम थी, जहां सभी पक्षों के हितों में कुछ समानता थी। वर्तमान संकट में ऐसा कोई साझा आधार नहीं दिखता। पाकिस्तान के लिए यह घटनाक्रम अवसर और सीमा, दोनों को उजागर करता है। एक ओर, उसने अमेरिका और ईरान जैसे प्रतिद्वंद्वियों को बातचीत की मेज पर लाकर अपनी कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन किया है। दूसरी ओर, ठोस परिणाम न निकाल पाने से यह भी स्पष्ट हो गया कि उसकी प्रभाव क्षमता सीमित है। बिना पर्याप्त आर्थिक या सैन्य शक्ति के, वह केवल संवाद की सुविधा दे सकता है, उसे दिशा नहीं दे सकता। इस पूरे घटनाक्रम का निहितार्थ यह है कि वैश्विक कूटनीति का स्वरूप बदल रहा है। जैसे-जैसे बड़ी शक्तियां अपनी-अपनी प्रतिस्पर्धाओं में उलझी हैं, मध्य शक्तियों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं। पर यह जरूरी नहीं कि वे संघर्षों का समाधान भी कर सकें। अमेरिका–ईरान वार्ता यह दिखाती है कि बातचीत की शुरुआत कराना एक बात है, और स्थायी समाधान निकालना बिल्कुल अलग। भारत की भूमिका इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। नई दिल्ली ने संतुलित और सतर्क रुख अपनाया है, जिससे वह सभी पक्षों के साथ अपने संबंध बनाए रखने में सफल रहा है। यह रणनीति उसे अनावश्यक जोखिम से बचाती है और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में उसके हितों की रक्षा करती है। अंततः, इस्लामाबाद की वार्ता की विफलता को एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक व्यापक प्रवृत्ति के रूप में समझना होगा। अमेरिका और ईरान के बीच गहरे अविश्वास, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण त्वरित समाधान की संभावना कम है। संघर्ष विराम अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन स्थायी शांति के लिए दोनों पक्षों को अपनी कठोर स्थितियों से पीछे हटना होगा, जो फिलहाल कठिन प्रतीत होता है। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान ने भले ही खुद को एक कूटनीतिक मंच के रूप में पुनः स्थापित किया हो, लेकिन प्रभावी मध्यस्थ बनने की उसकी राह अभी लंबी है। चीन के लिए यह संकट उसके आर्थिक हितों की प्राथमिकता को रेखांकित करता है। और वैश्विक समुदाय के लिए यह एक चेतावनी है कि आज की दुनिया में शांति स्थापित करना पहले से कहीं अधिक जटिल और अनिश्चित हो गया है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 14, 2026, 07:16 IST
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