Nuvama Report: 2026 में कैपेक्स की तुलना में खपत बनी रहेगी विकास का इंजन, अर्थव्यवस्था पर नुवामा की रिपोर्ट
भारत की अर्थव्यवस्था में वर्ष 2026 के दौरान 'खपत' में मजबूती बने रहने की उम्मीद है। एक रिपोर्ट के अनुसार, निवेश और बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च यानी 'कैपेक्स' की सुस्त रफ्तार के बीच, घरेलू मांग आर्थिक विकास की मुख्य चालक बनी रहेगी। ब्रोकरेज फर्म 'नुवामा' की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राजकोषीय नीति में बदलाव और क्रेडिट सेक्टर में तेजी से खपत को समर्थन मिल रहा है, हालांकि कॉरपोरेट निवेश को लेकर फिलहाल सावधानी बरती जा रही है। क्यों पिछड़ रहा है कैपेक्स नुवामा की रिपोर्ट में उन तीन प्रमुख कारणों का उल्लेख किया गया है, जिनकी वजह से 2026 में खपत, कैपेक्स से आगे निकल जाएगी। ऐसा देखा गया है कि आर्थिक विकास की गति धीमी होने पर खपत का प्रदर्शन निवेश की तुलना में बेहतर रहता है। सरकार की वित्तीय नीतियों में अब खपत को बढ़ावा देने की स्पष्ट प्राथमिकता दिख रही है। साथ ही, कर्ज की बढ़ती उपलब्धता इस ट्रेंड को और मजबूत कर रही है। हालांकि आय वृद्धि की धीमी रफ्तार के कारण खपत में बहुत तेज उछाल की संभावना नहीं है, लेकिन उच्च आय वर्ग की तुलना में निम्न और मध्यम आय वाले वर्गों की मांग अपेक्षाकृत मजबूत रहने की उम्मीद है। आय वृद्धि में बाधा, लेकिन लेवरेज और सरकारी मदद का सहारा रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि घरेलू आय में वृद्धि फिलहाल सीमित है और 'वेल्थ इफेक्ट' में भी कमी आई है। इन कारणों से खपत की विकास दर एक दायरे में रह सकती है। वित्त वर्ष 2026 में उपभोग मुख्य रूप से 'लेवरेज' (ऋण आधारित खर्च) और सरकारी हस्तांतरण के जरिए संचालित होगा, न कि घरों की आय में किसी बड़े सुधार के कारण। बावजूद इसके, निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों की ओर से आने वाली मांग, अर्थव्यवस्था के इस इंजन को कैपेक्स के मुकाबले आगे रखेगी। कॉरपोरेट और सरकारी निवेश में सुस्ती निवेश के मोर्चे पर 2026 का परिदृश्य थोड़ा चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। राजकोषीय स्थिति सीमित होने के कारण सरकार के पास सार्वजनिक कैपेक्स में भारी बढ़ोतरी करने की क्षमता कम है। बड़ी कंपनियां अपने निवेश प्लान को लेकर फिलहाल वेट-एंड-वॉच की मुद्रा में हैं। कमजोर राजस्व और मुनाफे में कमी की वजह से नए प्रोजेक्ट्स को लेकर कॉर्पोरेट जगत में सावधानी देखी जा रही है। हाउसहोल्ड-लेवल कैपेक्स में भी नरमी के संकेत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रीमियम और हाई-एंड रियल एस्टेट सेक्टर वर्तमान में एक 'सॉफ्ट पैच' (सुस्ती के दौर) से गुजर रहा है। सरकारी योजनाओं का असर रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT), विशेषकर महिलाओं पर केंद्रित योजनाओं ने निम्न आय वर्ग की खपत को एक सुरक्षा कवच प्रदान किया है। हालांकि, चेतावनी यह भी दी गई है कि इन हस्तांतरणों के लिए फंड अक्सर कैपेक्स जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के खर्च में कटौती करके जुटाया जा रहा है। संतुलित विकास की चुनौती खपत और कैपेक्स भारतीय अर्थव्यवस्था के दो जुड़वां इंजन माने जाते हैं। खपत जहां मांग पैदा करती है, वहीं कैपेक्स आपूर्ति क्षमता बढ़ाता है और रोजगार सृजन करता है। 2026 में खपत का कैपेक्स से आगे निकलना यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था फिलहाल मांग के सहारे टिकी है, लेकिन टिकाऊ विकास के लिए निवेश चक्र का दोबारा सक्रिय होना जरूरी है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 05, 2026, 13:18 IST
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