पश्चिम में जेंटल पैरेंटिंग का मिथक टूटा: बिना डांट-फटकार जिद्दी हो रहे बच्चे; किसने छेड़ी वैश्विक बहस?
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी जगत में जेंटल पैरेंटिंग यानी बिना डांट-फटकार और अत्यंत स्नेहपूर्ण परवरिश की सोच तेजी से लोकप्रिय हुई। इसका असर यह हुआ कि नॉर्वे मॉडल सामने आया, जिसमें बच्चों को जरा-सी भी डांट-फटकार लगाने पर अभिभावकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तक की जाने लगी। इस सोच को ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस समेत कई देशों ने अपनाया। लेकिन अब इस मॉडल को लेकर पश्चिमी देशों में गंभीर बहस शुरू हो गई है और कई विशेषज्ञ इसे बच्चों के भविष्य के लिए नुकसानदेह बता रहे हैं। क्या जेंटल पैरेंटिंग बच्चों के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है शीर्ष मनोवैज्ञानिकों और बाल रोग विशेषज्ञों ने जेंटल पैरेंटिंग की अवधारणा पर सवाल उठाए हैं। इस बहस के केंद्र में फ्रांस की प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. कैरोलिन गोल्डमैन हैं। उन्होंने अपनी नई किताब में जेंटल पैरेंटिंग को भ्रामक और खतरनाक बताते हुए लिखा है कि इसने ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है, जिसके माता-पिता यह तक नहीं जानते कि बच्चों को कब और कैसे "ना" कहना चाहिए। उनका कहना है कि बच्चे स्वयं सही-गलत का निर्णय नहीं ले सकते, इसलिए सीमाएं तय करना जरूरी है। कुछ यूरोपीय नेताओं ने भी इस मॉडल की आलोचना की है। ब्रिटेन की पूर्व गृहमंत्री और सांसद सुएला ब्रेवरमैन, फ्रांस की शिक्षा एवं बाल नीति से जुड़ी जनप्रतिनिधि सुजैन मॉर्गन तथा अमेरिका के फ्लोरिडा के गवर्नर रोन डिसेंटिस ने भी उदार पालन-पोषण की सीमाएं तय करने की वकालत की है। नॉर्वे मॉडल में डांटने पर भी क्यों हो सकती है कानूनी कार्रवाई यूरोप के कई देशों में बच्चों के अनुशासन को लेकर बेहद सख्त कानूनी मानक हैं। नॉर्वे में बच्चों को शारीरिक दंड देना पूरी तरह गैरकानूनी है। इतना ही नहीं, बच्चे को अत्यधिक डांटना, उस पर चिल्लाना या मानसिक दबाव डालना भी दंडनीय माना जाता है। वहां की बाल कल्याण एजेंसी को यदि स्कूल या पड़ोसी की ओर से शिकायत मिलती है कि बच्चे के साथ अनुचित व्यवहार हुआ है, तो वह अभिभावकों से बच्चे की अभिरक्षा तक छीन सकती है। स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड में भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर ऐसे ही सख्त नियम लागू हैं। बाद में नॉर्वे मॉडल को फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन और अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी काफी हद तक अपनाया गया। क्या बच्चे की हर जिद मानना उसके भविष्य के लिए सही है डॉ. गोल्डमैन का कहना है कि बच्चे की हर जिद और चीख-पुकार को उसकी भावना समझकर स्वीकार करना उसे समाज के अनुरूप व्यवहार करना नहीं सिखाता। उनका मानना है कि बच्चों को टाइम-आउट (कुछ समय शांत बैठाना) देना और अनुशासन सिखाना भी आवश्यक है। पेरिस की प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक कैथरीन जूसलेम ने भी जेंटल पैरेंटिंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि माता-पिता हर बात पर बच्चे से वयस्कों की तरह बातचीत करने लगेंगे, तो बच्चा सुरक्षित महसूस करने के बजाय असुरक्षित हो सकता है। बच्चों के लिए यह जानना जरूरी है कि घर में निर्णय लेने और नियंत्रण की जिम्मेदारी किसके पास है। जापान और दक्षिण कोरिया ने बच्चों के अनुशासन को लेकर क्या कदम उठाए जापान में अप्रैल 2020 से बाल शोषण रोकथाम कानून और बाल कल्याण अधिनियम में संशोधन कर माता-पिता द्वारा अनुशासन के नाम पर बच्चों को थप्पड़ मारना या किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड देना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। वहां बच्चे को शारीरिक पीड़ा पहुंचाना अपराध माना जाता है। वहीं, दक्षिण कोरिया ने जनवरी 2021 में 1958 के उस कानून को समाप्त कर दिया, जिसमें माता-पिता को बच्चों को सुधारने या अनुशासित करने के लिए दंड देने का अधिकार प्राप्त था। ये भी पढ़ें:ट्रंप बनाम डेमोक्रेट्स:मेल-इन वोटिंग की लड़ाई पहुंची SC; क्या बदलेगी अमेरिका में मेल-इन वोटिंग की व्यवस्था भारत में जेंटल पैरेंटिंग का असर कितना बढ़ रहा है भारत के महानगरों और डिजिटल माध्यमों से जुड़े परिवारों में भी जेंटल पैरेंटिंग का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। कई माता-पिता बच्चों पर हाथ उठाने या डांटने से बचते हैं, लेकिन समय न दे पाने के अपराधबोध में उनकी हर जिद पूरी कर देते हैं। वरिष्ठ बाल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की पारंपरिक परवरिश हमेशा से सख्ती और स्नेह के संतुलन पर आधारित रही है। उनका कहना है कि अत्यधिक कठोरता बच्चे के विकास में बाधा बन सकती है, जबकि जरूरत से ज्यादा उदारता बच्चों को जिद्दी, असहिष्णु और चिड़चिड़ा बना सकती है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jul 28, 2026, 04:31 IST
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