मैकाले गो वेंट गोन: मैकाले हमें कैसे चला सकता है!
एक बड़े मीडिया घराने के एक समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने जैसे ही मैकाले की शिक्षा की रीति-नीति को धोया, वैसे ही मैकाले की कुछ ज्ञानी संतानें प्रधानमंत्री की मैकाले की आलोचना पर मेहरबान हुईं। प्रधानमंत्री ने जो कहा, उसका आशय यह था कि मैकाले की शिक्षा की रीति-नीति, 1835 ने भारतीयों के आत्मविश्वास को तोड़ दिया, उनमें हीन भावना भर दी, उनमें गुलामी की मानसिकता घर कर गई। आजादी के बाद यह और पुख्ता हुई। भारतीय भाषाओं का अवमूल्यन हुआ। 2035 तक इस मानसिकता को खत्म होना चाहिए। जबाव में एक ज्ञानी ने कहा कि यों मोदी का निशाना ठीक था, लेकिन भाजपा व संघ की मानसिकता मैकाले की मानसिकता से अलग नहीं। ऐसे लोग भला वि-उपनिवेशीकरण की बात कैसे कर सकते हैं भाजपा व संघियों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं। असली वि-उपनिवेशवादी तो गांधीजी थे। दूसरी ऑनलाइन टिप्पणी में कहा गया कि प्रधानमंत्री की भाषा अर्ध-सत्य कहती है। मानसिक गुलामी का कारण सिर्फ अंग्रेजी नहीं। भाषा बहुलार्थक होती है। कई लोगों के लिए वह आजादी की भाषा है। अपने यहां जब-जब मैकाले की बात होती है, इसी तरह होती है। एक ओर उसके आलोचक होते हैं, जो अक्सर राष्ट्रवादी होते हैं, भारतवादी होते हैं और भारत के स्वत्व की वापसी के दावेदार होते हैं। ऐसे सभी, उन ज्ञानियों के निशाने पर आ जाते हैं, जो अपने को वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न व सेक्युलर मानते हैं और अंग्रेजी को ज्ञान विज्ञान की भाषा मानते हैं। लेकिन कुछ हमारे जैसे हिंदी वाले भी हैं, जो ऐसे देसी अंग्रेजों से सहमत नहीं होते। उनको भी अंध हिंदीवादी खित्ते में डाल दिया जाता है, फिर हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के उस मुहावरे में बंद कर दिया जाता है, जिसे एक शताब्दी से कुछ पहले हिंदी लेखक प्रताप नारायण मिश्र ने चलाया था। तब हिंदी-उर्दू के बीच मुकदमे चलते थे और अंग्रेजी वाले मजे लेते थे, क्योंकि अंग्रेज और अंग्रेजी ही उस ओरिएंटलिस्ट योजना की पुरस्कर्ता थी, जिसके जरिये अंग्रेज उपनिवेशवादी भारत को अपनी तरह का बनाते हुए हांकना चाहते थे। एडवर्ड सईद के अध्ययन ओरिएंटलिज्म के मर्म को समझें, तो मैकॉले सारे ओरिएंटलिस्टों का उस्ताद नजर आता है, जिसने अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करने की रीति-नीति के जरिये औपनिवेशिक भारत को नियंत्रित करने के शिष्ट तरीके बताए, जिनका एक बड़ा औजार अंग्रेजी भाषा और शिक्षा रही। अंग्रेज चले गए, लेकिन अंग्रेजी छोड़ गए! और यही मैकाले का जलवा है कि आज भी वह हमारे दिलो-दिमाग पर राज करता है कि हम अब भी अंग्रेजी को प्रामाणिक ज्ञान का भंडार मान कर चलते हैं। चाहे अंग्रेजी स्पीडली स्पीकिंग कोर्स से अंग्रेजी बोलना सीखें या तीस दिन में अंग्रेजी सीखें, हम अधकचरे अंग्रेज होकर ही अपने को कामयाब समझते हैं और असली ब्लू ब्लड, जो बचपन से ही नामी मिशनरी स्कूलों-कॉलेजों में अंग्रेजी पढ़ता है, फिर ऑक्सफोर्ड-हार्वर्ड से पढ़-पढ़ाकर साल में एक महीने हमें यहां ज्ञान देने आता रहता है, मैकाले को अपना बाप समझता है, जबकि ऐसों को भी असली अंग्रेज ब्राउनी ही कहते हैं, ब्लडी इंडियन ही मानते हैं, भले खुलकर न कहते हों। इस तरह एक दर्द इन ब्लडी इंडियंस को भी महसूस होता होगा, जिसे ये कह नहीं सकते। मैं अपने दर्द में इनका दर्द मिलाकर चलना चाहता हूं, भले ये मेरे जैसों के दर्द को अपना न मानें। शायद इसी दर्द को समझकर हिंदी के कवि रघुवीर सहाय ने एक कविता में इसे एक दर्जा नीचे रहने का दर्द कहा है। अंग्रेज कहें न कहें, लेकिन देसी अंग्रेज जरूर कहता है कि यह दर्द अंध राष्ट्रवादी है, हिंदूवादी है, जातिवादी है, डेंगू है, मलेरिया है, एचआईवी है, जिसे हर हाल में खत्म किया जाना चाहिए। लेकिन वह इसे ही फासिस्ट भी कहता है! ये कैसा वैज्ञानिक ज्ञान है भाई, जो एक दर्जा नीचे जीता है, जो डेंगू है, मलेरिया है, वह फासिस्ट भी है! कहीं आप भी तो अपनी तरह के फासिस्ट नहीं और अब यह विडंबना देखें-जो दर्द औपनिवेशिक शासन में कभी हास्य-व्यंग्य के जरिये व्यक्त किया जा सकता था, उसे अब अगर कोई कहता है, तो सीधे पिछड़ा, प्रतिक्रियावादी, बहुसंख्यकवादी और फासिस्ट कहकर किनारे कर दिया जाता है। अगर इस पर भी कोई शर्मिंदा नहीं होता, तो हमें ऐसे पर शर्म आती है और यह तब और बढ़ जाती है, जब मैकाले की ये औरस संतानें उसकी आलोचना करने वालों को एकदम पैदल से तर्क देने लगती हैं कि ये कैसे मैकाले विरोधी हैं, जो अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों या विदेशों में पढ़ाते हैं। अरे भई, जब अंग्रेजी का वर्चस्व है, तो रोटी कमाने के लिए तो उसे जानना ही होगा। क्या उसका यह हक चला जाता है कि वह अंग्रेजी पढ़े और उसके जरिये की जाती ज्यादतियों को कोसे भी अपने यहां एक कहावत चलती है कि मियां की जूती मियां के सिर। जब आजादी के आंदोलनकारियों ने यही नीति अपनाई, तो आजादी के बाद इसे अपनाने की मनाही है क्या और उसे प्रधानमंत्री मोदी या संघी या कोई और क्यों नहीं अपना सकते मैकालेेबाजी से मुक्ति पाने के इस प्रसंग में हमें प्रेमचंद की एक कहानी याद आती है, जिसका शीर्षक है ये मेरा देश नहीं। इस कहानी के हिसाब से चलें, तो हम उस वृद्ध की तरह, जो कुछ नया है, आधुनिक है, उसे कोस सकते हैं और किसी गुफा में वास कर सोच सकते हैं कि हम मैकाले से मुक्त हो गए, लेकिन मुक्त नहीं होने के। इसमें हम राजकपूर के उस गाने को भी जोड़ लें, जो आजादी के ऐन बाद की अवशिष्ट औपनिवेशिकता से मुक्ति का एक नया पूरक आख्यान गढ़ते हुए कहता है कि मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंगलिस्तानी! सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी!! बहुत ज्ञान बघारने की जगह मैं इसे भारतीय लोगों की जुगाड़ू तरकीब मानता हूं, जो बिना किसी अपराधबोध के अपनी जुगाड़बाजी से बड़े-बड़ों को मात देती आई है। यह वि-उपनिवेशीकरण इस जुगाड़बाजी से शुरू होता है, शेष मियां की जूती मियां के सिर से खत्म होता है। अंग्रेज आज बिना भारतीयों के अपने घर तक को नहीं चला पा रहे, तो मैकाले हमें कैसे चला सकता है! एक न एक दिन तो जाना ही है, इसलिए अंग्रेजी भी अपनी सीमा में रहे! आप अपने घर को संभालें। हमारी चिंता न करें, उसकी हम कर लेंगे!edit@amarujala.com
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 09, 2025, 05:40 IST
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