Indian Army: 23,000 करोड़ से 300 के-9 तोपों की होगी खरीद, दोहरे मोर्चे की चुनौती से निपटने की तैयारी
चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर अपनी तैयारी मजबूत करने के लिए सेना 23,000 करोड़ रुपये की लागत से 300 के-9 वज्र स्वचालित तोपों की खरीद करने जा रही है। सूत्रों ने बताया कि इस प्रस्ताव को जल्द ही रक्षा खरीद बोर्ड के समक्ष रखा जाएगा, जिसके बाद इसे अंतिम मंजूरी के लिए रक्षा खरीद परिषद को भेजा जाएगा। मंजूरी मिलने पर यह सौदा सबसे बड़े तोपखाना खरीद सौदों में शामिल होगा। मंजूरी मिलने के बाद इसका ठेका लार्सन एंड टुब्रो कंपनी को मिलने की संभावना है। यह कंपनी दक्षिण कोरिया की कंपनी हनव्हा एयरोस्पेस के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते के तहत भारत में के-9 वज्र तोपों का निर्माण करती है। इस नए सौदे के साथ लार्सन एंड टुब्रो द्वारा निर्मित इन तोपों की कुल संख्या 500 से ज्यादा हो जाएगी, जो निजी क्षेत्र द्वारा अब तक का सबसे बड़ा एकल तोपखाना उत्पादन कार्यक्रम होगा। एआई तकनीक से लैस होगी तोप सेना के-9 वज्र तोप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक जोड़ रही है। इसके अंतर्गत यह तोप स्वचालित रूप से ड्रोन की पहचान करने और निशाना बनाने में सक्षम होगी। तोपों में उन्नत जैमर और सेंसर भी लगाए जाएंगे, जिससे वे दुश्मन के ड्रोन व अन्य हवाई खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकें। दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से पहले बदल लेती है लोकेशन के-9 वज्र 155 मिमी/52 कैलिबर की अत्याधुनिक स्वचालित तोप है, जिसकी मारक क्षमता 40 किलोमीटर से ज्यादा है। यह तोप मात्र 15 सेकंड में तीन गोले दाग सकती है। इस तोप को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किसी ट्रक या अन्य वाहन की जरूरत नहीं होती। यह तोप रेगिस्तानी इलाकों से लेकर दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों तक खुद तेजी से संचालित हो सकती है। यह शूट-एंड-स्कूट (गोला दागो और भागो) तकनीक से लैस है। यानी यह दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से पहले ही फायर करके अपनी लोकेशन बदल लेती है। रेगिस्तान से लेकर लद्दाख तक तैनात इससे पहले दिसंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने एल एंड टी के साथ 100 अतिरिक्त के-9 वज्र तोपों की खरीद के लिए 7,628 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। इन तोपों को मुख्य रूप से पश्चिमी सीमा पर रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया था, लेकिन बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच सेना ने अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी इसका परीक्षण कर तैनात किया है। इसके सर्दी में काम करने में सक्षम संस्करण का लद्दाख में भी सफल परीक्षण किया जा चुका है। दोहरे मोर्चे की चुनौती से निपटने की तैयारी यह कदम पाकिस्तान और चीन के साथ एक साथ पैदा होने वाली किसी भी आकस्मिक स्थिति (टू-फ्रंट वॉर) से निपटने के लिए सेना की बढ़ती तैयारियां दर्शाता है। यह सौदा थार रेगिस्तान से लेकर चीन के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा तक सेना की रही सही कमियों को दूर कर देगा। नौसेना को 449 करोड़ में मिलेंगे स्वदेशी सैटेलाइट जैमर्स रक्षा मंत्रालय ने नौसेना की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को मजबूत करने के लिए 449 करोड़ रुपये की लागत से 20 उन्नत ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) जैमर्स की खरीद का समझौता किया है। बंगलूरू स्थित एकॉर्ड सॉफ्टवेयर एंड सिस्टम्स प्रा.लि. से खरीदे जाने वाले ये जैमर्स दुश्मन के सैटेलाइट आधारित नेविगेशन संकेतों को बाधित करते में सक्षम होंगे। इस अनुबंध पर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इन जैमर्स में न्यूनतम 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी में बढ़ती आत्मनिर्भरता दर्शाता है। नौसेना के बेड़े में शामिल होने वाले इन जैमर्स की क्षमता बेहद मारक है। यह प्रणाली दुश्मन के ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम रिसीवर की सिग्नल हासिल करने और ट्रैक करने की क्षमता को पूरी तरह कमजोर या ठप कर सकती है। साथ ही दुश्मन के नेविगेशन सिस्टम को भटकाने के लिए सिग्नल स्पूफिंग या जैमिंग की जा सकती है। हर खतरे से सतर्क इन जैमर्स के नौसेना में शामिल होने से भारतीय युद्धपोतों और जहाजों को किसी भी चुनौतीपूर्ण या खतरे वाले समुद्री वातावरण में सुरक्षित रूप से संचालन की क्षमता मिलेगी। आधुनिक युद्ध में अधिकांश आधुनिक मिसाइलें, ड्रोन, जहाज और सैन्य प्लेटफॉर्म जीपीएस व अन्य ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर रहते हैं। यह जैमर जरूरत पड़ने पर दुश्मन के सैटेलाइट संकेतों को गलत दिशा की जानकारी दे सकता है।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Jun 11, 2026, 04:25 IST
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