Air Pollution: प्रदूषण से बचाव के लिए सिर्फ सरकार के भरोसे ना रहें, विशेषज्ञ बोले- अपनी लड़ाई खुद भी लड़ें

दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इन दिनों जिस स्तर के वायु प्रदूषण की चपेट में हैं, वह केवल असुविधा नहीं बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति बन चुका है। हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक दर्ज की जा रही है। सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में फौरी राहत संभव है, लोग खुद को किस हद तक सुरक्षित रख सकते हैं और क्या घरों के अंदर रहना वास्तव में सुरक्षित विकल्प है। विशेषज्ञ बोले- प्रदूषण के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद लड़ें विशेषज्ञों का कहना है कि तात्कालिक उपाय सीमित जरूर हैं, लेकिन सही वैज्ञानिक रणनीति अपनाई जाए तो जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए प्रदूषण से बचाव के लिए सरकार के भरोसे ना रहें, अपनी और अपने परिवार की लड़ाई खुद लड़ें। आईआईटी कानपुर और आईआईटी दिल्ली के वायु गुणवत्ता अध्ययनों के अनुसार सर्दियों की शुरुआत में तापमान में गिरावट और हवा की रफ्तार कम होने से तापीय उलटाव की स्थिति बन जाती है। आईआईटी कानपुर के वायु गुणवत्ता विशेषज्ञ बताते हैं कि इस स्थिति में प्रदूषक कण जमीन के पास ही फंसे रहते हैं और ऊपर की ओर नहीं जा पाते। वाहनों का उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियां और स्थानीय स्रोत मिलकर स्मॉग की मोटी परत बना देते हैं।डब्ल्यूएचओ, एम्स दिल्ली, आईआईटी कानपुर और हार्वर्ड टीएच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदूषण को तुरंत खत्म करना संभव नहीं, लेकिन इसके प्रभाव को अस्थायी रूप से घटाया जा सकता है। चेयरमैन इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट सर्जरी, मेदांता अस्पताल डॉ. अरविंद कुमार के अनुसार फौरी राहत का मतलब प्रदूषण हटाना नहीं बल्कि शरीर में जाने वाले जहरीले कणों की मात्रा कम करना है। इसके लिए सबसे प्रभावी उपाय हैं अनावश्यक बाहर निकलने से बचना, सुबह और देर रात की सैर बंद करना और प्रदूषण चरम पर होने के समय शारीरिक श्रम न करना। मास्क है बचाव में प्रभावी वैज्ञानिक दृष्टि से केवल एन 95 या एन 99 स्तर के मास्क ही पीएम 2.5 कणों को प्रभावी ढंग से रोक पाते हैं। एम्स दिल्ली के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. जीसी. खत्री के मुताबिक कपड़े या सर्जिकल मास्क प्रदूषण से लगभग कोई सुरक्षा नहीं देते। सही फिटिंग वाला मास्क नाक और मुंह दोनों को पूरी तरह ढकता हो, तभी उसका लाभ मिलता है। विशेषज्ञ चिकित्सकों के अनुसार स्टीम लेने से वायु प्रदूषण के जहरीले कण सीधे तौर पर फेफड़ों से साफ नहीं होते, लेकिन इसके कुछ लक्षणात्मक और सहायक लाभ जरूर मिलते हैं। एम्स दिल्ली के पल्मोनोलॉजी विभाग से जुड़े डॉक्टरों के मुताबिक प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से नाक, गले और ऊपरी श्वसन मार्ग की श्लेष्मा परत सूख जाती है और उसमें सूजन आ जाती है। गर्म भाप लेने से इस परत में नमी लौटती है, जिससे जमा हुआ गाढ़ा म्यूकस ढीला पड़ता है और सांस लेने में अस्थायी राहत मिलती है। यह प्रक्रिया नाक के भीतर मौजूद सिलिया (सूक्ष्म बालनुमा संरचनाएं) की कार्यक्षमता को बेहतर करती है, जो बाहरी कणों और बैक्टीरिया को बाहर निकालने का प्राकृतिक तंत्र हैं। वैज्ञानिक रूप से देखें तो स्टीम का असर पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कणों को निष्क्रिय करने पर नहीं, बल्कि श्वसन मार्ग की सूजन कम करने और वायु प्रवाह सुधारने पर होता है। डॉ. अरविंद कुमार के अनुसार स्टीम से रक्त वाहिकाओं का अस्थायी फैलाव होता है, जिससे स्थानीय रक्त प्रवाह बढ़ता है और गले-नाक की जलन कम होती है। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि अस्थमा, सीओपीडी या हृदय रोग से ग्रस्त लोगों को अत्यधिक गर्म भाप से बचना चाहिए, क्योंकि इससे सांस की तकलीफ बढ़ सकती है। इसलिए स्टीम को उपचार नहीं बल्कि लक्षणों से अस्थायी राहत देने वाला सहायक उपाय माना जाना चाहिए, न कि प्रदूषण से बचाव का पूर्ण समाधान। घर के अंदर कितने सुरक्षित हैं लोग यह आम धारणा है कि घर के अंदर हवा सुरक्षित होती है, लेकिन विशेषज्ञ इसे आधा सच मानते हैं।डब्ल्यूएचओ से जुड़े पर्यावरण स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर घर के दरवाजे-खिड़कियां खुली हों या वेंटिलेशन सिस्टम में फिल्टर न लगे हों तो बाहरी प्रदूषक कण आसानी से अंदर प्रवेश कर जाते हैं। हालांकि बंद कमरों में एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करने से पीएम 2.5 स्तर को 50 से 70 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है।आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर गीता शर्मा बताती हैं कि घर के अंदर धूपबत्ती, अगरबत्ती, धूम्रपान और ज्यादा तले भोजन से भी सूक्ष्म कण पैदा होते हैं, इसलिए इनसे परहेज जरूरी है।बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं सबसे अधिक जोखिम में हैं, इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इन वर्गों को यथासंभव घर के अंदर नियंत्रित वातावरण में रखा जाए। ये भी पढ़ें-प्रदूषण-कोहरे का डबल अटैक:दिसंबर में दूसरी बार हुई इतनी खराब हवा, कई इलाकों में AQI आपात स्तर के करीब मोबाइल फोन बन सकता है प्रदूषण से बचाव का सबसे प्रभावी सार्वजनिक उपकरण विशेषज्ञों के अनुसार सरकार अगर डिजिटल और नई टेक्नोलॉजी का रणनीतिक उपयोग करे तो मोबाइल फोन प्रदूषण से बचाव का सबसे प्रभावी सार्वजनिक उपकरण बन सकता है। उदाहरण के तौर पर, रियल-टाइम एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग को मोबाइल नेटवर्क से जोड़कर लोकेशन-आधारित अलर्ट भेजे जा सकते हैं।जैसे किसी इलाके में पीएम 2.5 खतरनाक स्तर पर पहुंचते ही लोगों के फोन पर सीधा संदेश आए कि बाहर निकलना सीमित रखें, एन 95 मास्क का उपयोग करें, बच्चों और बुजुर्गों को घर में रखें और खुले में व्यायाम न करें। यूएस ईपीए के एयरनाउ और दक्षिण कोरिया के सियोल मॉडल में ऐसे अलर्ट ने नागरिक व्यवहार में तुरंत बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मोबाइल ऐप के जरिए व्यक्तिगत सलाह दे सकती है जो उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और इलाके के प्रदूषण स्तर के आधार पर यह बताए कि किसी व्यक्ति के लिए उस दिन क्या सुरक्षित है।उदाहरण के लिए अस्थमा मरीज को नेबुलाइजेशन या दवा साथ रखने की सलाह, जबकि सामान्य व्यक्ति को समय-आधारित बाहर निकलने का सुझाव। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब जानकारी सामान्य चेतावनी की जगह व्यक्तिगत और व्यवहारिक होती है, तो लोग उसे अपनाते हैं। इस तरह मोबाइल तकनीक न केवल सूचना देने का माध्यम बनेगी, बल्कि सरकार और नागरिक के बीच स्वास्थ्य-साझेदारी का पुल भी तैयार करेगी, जिसमें प्रदूषण से बचाव एक साझा जिम्मेदारी बन सके।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 16, 2025, 04:14 IST
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