ईरान युद्ध के दलदल से कैसे निकलेंगे डोनाल्ड ट्रंप? सामने बढ़ती चुनौती और सीमित विकल्प
राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका पहले ही ईरान के दलदल में फंस चुके हैं। भले ही ट्रंप ईरान पर बमबारी रोक सकते हैं, पर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल के गुजरने को रोकना जारी रख सकता है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी, जबकि उर्वरक, जेनेरिक दवाएं, हीलियम और होर्मुज पर निर्भर अन्य उत्पाद दुर्लभ हो जाएंगे, जिससे अमेरिकी और विश्व अर्थव्यवस्था—दोनों पर ही दबाव बढ़ेगा। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने जोर देकर कहा है कि 'इस युद्ध को समाप्त करने का एकमात्र तरीका' यह है कि अमेरिका तीन बड़ी रियायतें दे: 'ईरान के वैध अधिकारों' (संभवतः यूरेनियम संवर्धन के अधिकार) को मान्यता दे; ईरान को युद्ध क्षतिपूर्ति का भुगतान करे; और ईरान के विरुद्ध 'भविष्य में होने वाले किसी भी हमले के विरुद्ध' अंतरराष्ट्रीय गारंटी प्रदान करे। ऐसे में लगता नहीं कि इन शर्तों पर बातचीत संभव है। लेकिन ईरानी अधिकारी अड़े हुए हैं कि युद्ध तब तक जारी रहेगा, जब तक उन्हें यह भरोसा नहीं हो जाए कि भविष्य में उन पर कोई हमला नहीं होगा। डर है कि ट्रंप तनाव बढ़ाकर खुद को इस मुश्किल से निकालने की कोशिश करेंगे। यह हो सकता है कि वे खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लें, जो ईरान के तेल उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है। वर्ष 1988 में, ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका बहुत कमजोर है और अगर सत्ता उनके हाथ में होती, तो वह खार्ग द्वीप पर जोरदार हमला करके, उसे अपने कब्जे में ले लेते। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि समुद्री सैनिक, होर्मुज को खुला रखने के प्रयास में, वहां ईरान के नियंत्रण वाले कई द्वीपों पर कब्जा कर लें। पर ईरानी क्षेत्र पर कब्जा करने पर भी क्या होगा अगर ईरान ने हार नहीं मानी, तो क्या मरीन सैनिक महीनों तक ईरानी इलाके पर कब्जा जमाए रखेंगे इस दौरान, ईरान शायद ड्रोन और मिसाइल हमलों से जहाज मालिकों को डराकर, या समुद्र में बिछाई गई सुरंगों के जरिये होर्मुज से तेल की आवाजाही को रोक सकता है। वह यमन के हूतियों से लाल सागर से होने वाले यातायात को रोकने के लिए कहकर तनाव बढ़ा सकता है, जिससे तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भी अधिक बाधित हो जाएगा और वह इस क्षेत्र में तेल से जुड़े अन्य बुनियादी ढांचों पर भी हमला कर सकता है। हो सकता है कि वह साइबर या आतंकवादी हमलों को भी अंजाम दे। ट्रंप इस्फहान में जमीनी सैनिक भेजने पर विचार कर रहे हैं, ताकि वहां जमा अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम को हासिल करने की कोशिश की जा सके। यह भी बेहद जोखिम भरा कदम होगा, क्योंकि यह भी साफ नहीं है कि वहां यूरेनियम है या नहीं। कोई भी पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि क्या होगा। हो सकता है कि ईरान के ड्रोन और मिसाइलें खत्म हो जाएं, या अमेरिका कामयाब हो जाए, या फिर कल ईरान के ही कुछ नरमपंथी सैन्य अधिकारी तख्तापलट कर दें, जो अमेरिका के साथ कोई समझौता करना चाहते हों। कुछ भी हो सकता है। लेकिन फिलहाल लगता है कि ट्रंप ने अमेरिका को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। पिछले सर्वोच्च नेता ने यूरेनियम को समृद्ध करने की गलती तो की, पर कभी परमाणु हथियार नहीं बनाया। नया नेतृत्व शायद तेजी से परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगा, ताकि एक निवारक शक्ति हासिल की जा सके। खतरा वास्तविक है, लेकिन इस नाकाम युद्ध पर और जोर देने से अमेरिका शायद इस दलदल में और भी गहरे धंस जाए। अमेरिका और इस्राइल को अब तक ईरान में बार-बार ऐसी रणनीतिक सफलताएं मिली हैं, जिनका किसी सुसंगत रणनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला अली खामनेई को मार गिराया, और उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनके और भी कट्टरपंथी बेटे को पाया। इस्राइल ने शासन के एक शीर्ष व्यक्ति, अली लारीजानी को मार डाला, और अब शायद वहां बातचीत के जरिये शांति स्थापित करने के लिए कोई मजबूत नेता ही न बचा हो। हर सफलता के साथ अमेरिका और भी दलदल में फंसता जा रहा है। यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका ने ईरान पर निशाना साधा और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी हो। 1960 के दशक में, अमेरिका ने अपने सैन्य हितों की रक्षा के लिए ईरान के साथ सेना की स्थिति को लेकर एक कड़ा समझौता किया था। लेकिन रूहोल्ला खुमैनी ने इस असमान समझौते की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ईरान में एक अमेरिकी कुत्ते को भी एक ईरानी नागरिक से ज्यादा कीमती माना जाता है और उनकी इस आलोचना ने उन्हें विपक्षी आंदोलन का नेता बनने में मदद की, और अंततः वे इस्लामिक क्रांति के सूत्रधार बने। फिर 1990 के दशक में, अमेरिका ने सऊदी अरब में सैन्य अड्डे स्थापित करने के लिए बातचीत की और सोचा कि इससे उसके सुरक्षा हितों को बढ़ावा मिलेगा। इन अड्डों से ओसामा बिन लादेन भड़क उठा और इसी के चलते अमेरिकियों के खिलाफ वर्षों तक आतंकवादी हमले हुए। इनसे मिलने वाला सबक यह है कि हमेशा ऐसी रणनीतियां अपनाई जाएं, जो हमारे रणनीतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाएं और ईरान के मामले में अपनी जिद पर अड़े रहने से ऐसा नहीं होगा। ट्रंप के पास सबसे कम बुरा विकल्प वही है, जो उन्होंने पिछले साल चीन और यमन के प्रति अपनी नीति में गड़बड़ी होने पर किया था। दोनों ही मामलों में उन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास से जीत की घोषणा की, और फिर बड़ी ही तेजी से बातचीत शुरू कर दी। अंततः अमेरिका को ही नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन हालात शांत जरूर हो गए। अत: ट्रंप को यह घोषणा करनी चाहिए कि ईरान में उनके युद्ध के लक्ष्य हासिल हो गए हैं। इसके बाद उन्हें इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर जोर डालना चाहिए कि वह भी हिजबुल्ला और ईरान, दोनों के खिलाफ अपनी शत्रुता समाप्त कर दें। फिर व्हाइट हाउस ओमान से गुजारिश करे कि वह ईरान को गुप्त बातचीत के लिए वार्ता की मेज पर लाने में मदद करे। मुझे नहीं पता कि कोई समझौता संभव है या नहीं, और इसके लिए बहुत ज्यादा सूझ-बूझ की जरूरत होगी। लेकिन ईरान को राजस्व और निवेश की जरूरत तो है ही, और प्रतिबंधों में कमी उसके लिए बहुत आकर्षक होगी। अगर कोई नया सौदा संभव होता है, तो इससे सर्वोच्च नेता की हत्या के बदले में अमेरिकियों पर साइबर या आतंकवादी हमलों की आशंका भी कम हो जाएगी। इस युद्ध को और तेज करने तथा लंबा खींचने का विकल्प, अंततः सभी को हारा हुआ ही छोड़ेगा। ©The New York Times 2026
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Mar 23, 2026, 04:22 IST
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