High Court : जन्म प्रमाणपत्र रद्द हुए बिना अमान्य नहीं, यह है पूरा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत जारी जन्म प्रमाणपत्र तब तक वैध माना जाएगा, जब तक उसे रद्द न कर दिया जाए या उसमें जालसाजी सिद्ध न हो जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने विमल सिंह की याचिका पर दिया। बांदा निवासी विमल सिंह का आरोप है कि उनके बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में जन्म तिथि एक जुलाई 2013 दर्ज थी, जबकि बांदा के दुरेंदी स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा छह में प्रवेश के लिए निर्धारित आयु सीमा एक मई 2013 से 30 जुलाई 2015 के बीच थी। स्कूल प्रशासन ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) की रिपोर्ट के आधार पर जन्म तिथि पर संदेह जताते हुए प्रवेश देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने सीएमओ की रिपोर्ट को निर्णायक मानने से इन्कार करते हुए कहा कि हड्डियों के विकास (बोन एज) की जांच पूरी तरह सटीक नहीं होती है और इसमें लगभग दो साल तक का अंतर संभव है। कोर्ट ने कहा कि केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर जन्म प्रमाण पत्र को दरकिनार करना शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत बच्चे के शिक्षा के अधिकार का हनन है। कोर्ट ने कहा कि आयु निर्धारण के लिए जरूरी दस्तावेजों में सक्षम बोर्ड की ओर से जारी हाईस्कूल का प्रमाणपत्र या उसके समकक्ष, बच्चे के पहले स्कूल में दर्ज जन्म तिथि का प्रमाणित रिकॉर्ड, नगर निगम, नगर पालिका या पंचायत की ओर से जारी जन्म प्रमाणपत्र जरूरी है। इन दस्तावेजों के न होने पर ही मेडिकल राय ली जा सकती है। हाईकोर्ट की टिप्पणी इस तरह के मामलों में केवल मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर वैधानिक दस्तावेजों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिसे रोका जाना आवश्यक है। कोर्ट ने संबंधित स्कूल को निर्देश दिया कि याची के बच्चे को कक्षा छह में प्रवेश दिया जाए।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Apr 18, 2026, 15:01 IST
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