ज्ञानेन्द्रपति: कर्म का संगीत धीरे-धीरे बन जाता है संगीत का क्रम

कपड़े पछींटता हुआ आदमी अपने अनजाने संगीतकार बन जाता है संगीत में मस्त हो जाता है कर्म का संगीत धीरे-धीरे बन जाता है संगीत का क्रम धुल जाता है कपड़े का देहाकार दुख मन तक निखर जाता है तब कभी मद्धिम आवाज़ में कहता है कपड़ा-- बहुत हुआ छोड़ो भी मुझे तुम्हें कोई काम करना है या नहीं पता नहीं मेरे आगे उज्ज्वल भविष्य है पसीने की महक वाला हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Dec 31, 2025, 15:09 IST
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