दूधनाथ सिंह की कविता- परिचित दीवारों को छू कर लौट आऊँगा

जब तुम्हें लिखकर भी भूल नहीं पाऊँगा। तो चुप हो जाऊँगा। इस प्रेत-मठ के जंगलों पर नहीं लटकाऊँगा तुम्हें तुम्हारी हड्डियों में सूराख़ कर फूल-मालाएँ पिन्हाऊँगा नहीं। सीढ़ियों पर से आवाज़ नहीं दूँगा गहरी नींद से जगाऊँगा नहीं; परिचित दीवारों को छू कर लौट आऊँगा। खुले चौराहों, अधखुली ऋतुओं या काँपते मकानों औंधी किताबों या सपने बहाती नदियों की काली-काली धाराओं ख़ून को तलाशती हवाओं या घन होती संध्या-रेती के बीच तुम्हारी आहट पकड़ कर टटोलूँगा नहीं! बारिश में झरे हुए फूल, हरे रंग, बीते आकाश की फुहार पीले वसन में निर्वसन कोई धूप-रूप, एकत्र नहीं करूँगा, तुम्हारे कानों में गुनगुनाया हुआ कोई गीत—फिर, फिर गुनगुनाता, सड़कों का अंत नहीं करूँगा; एकाकी दुपहर के दुःख से तिलमिला हरी-हरी घास में मुँह डाल धरती—माँ से कुछ कहूँगा नहीं। निर्णय भी किसी से माँगूँगा नहीं उसे भी तुम्हीं पर छोड़—फिर किसी वन की सीमा-रेखा पर पतझर के झर-झर भोर में देखूँगा सदाबहार वृक्षों से चिड़ियों का उड़ते जाना उड़ते जाना उड़ते जाना जब तुम्हें लिखकर भी मेरे कवि! भूल नहीं पाऊँगा। हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 10, 2026, 20:26 IST
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