धर्मवीर भारती: लौटोगे अपनी हर यात्रा के बाद यहीं

झुरमुट में दुपहरिया कुम्हलाई खेतों पर अंधियारी छाई पश्चिम की सुनहरी धुंधराई टीलों पर, तालों पर इक्के दुक्के अपने घर जाने वालों पर धीरे-धीरे उतरी शाम! आंचल से छू तुलसी की थाली दीदी ने घर की ढिबरी बाली जमुहाई ले लेकर उजियाली जा बैठी ताखों में धीरे-धीरे उतरी शाम! इस अधकच्चे से घर के आंगन में जाने क्यों इतना आश्वासन पाता है यह मेरा टूटा मन लगता है इन पिछले वर्षों में सच्चे झूठे संघर्षों में इस घर की छाया थी छूट गई अनजाने जो अब छुककर मेरे सिराहने कहती है "भटको बेबात कहीं लौटोगे अपनी हर यात्रा के बाद यहीं!" धीरे धीरे उतरी शाम! हमारे यूट्यूब चैनल कोSubscribeकरें।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jul 10, 2026, 17:09 IST
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