कट्टरपंथियों की कठपुतली: यूनुस सरकार के उदारवाद के सारे नकाब उतर रहे, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी भयावह

पिछले कुछ दिनों में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और बर्बरता की जो वारदातें हुई हैं, वे मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के शासन में 2024 से निरंतर जारी हिंसा का ही चरम हैं। एक हिंदू विधवा महिला के साथ सामूहिक दुराचार के बाद पेड़ पर लटकाकर उसकी पिटाई और फिर उसका वीडियो वायरल किया जाना मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है। इसके अलावा, पिछले चौबीस घंटों के भीतर दो हिंदुओं की हत्या कर दी गई, जिसमें एक पत्रकार भी था। किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और सांविधानिक मुल्क में ऐसे अपराध न केवल कानून-व्यवस्था की विफलता को दर्शाते हैं, बल्कि मानवीय मूल्यों पर भी गहरा आघात करते हैं। मानवाधिकारों का घनघोर उल्लंघन करने वाली इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए यूनुस सरकार को ठोस कदम उठाकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और दोषियों को शीघ्र कठोर दंड देकर पीड़ितों को न्याय व पुनर्वास प्रदान करना चाहिए। सवाल सिर्फ अपराधियों की गिरफ्तारी या सजा का नहीं है, बल्कि उस वैचारिक और राजनीतिक माहौल का है, जो ऐसे अपराधों को जन्म देता है या उन्हें रोकने में विफल रहता है। मोहम्मद यूनुस और उनसे जुड़े उदारवादी-प्रगतिशील तबकों ने वर्षों तक सामाजिक न्याय तथा मानवाधिकारों की बात की है, पर जब वास्तविक परीक्षा सामने आई है, तो सारे नकाब उतरते दिख रहे हैं। विडंबना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं के खिलाफ लंदन और कनाडा में तो हिंदू एकजुट होकर प्रदर्शन कर रहे हैं, पर भारत में यह विरोध सोशल मीडिया तक ही सीमित है। अल्पसंख्यकों की हत्या पर भारत सरकार के बार-बार आगाह करने के बावजूद बांग्लादेश सरकार ने सिर्फ आश्वासन ही दिया है, जो उसके दावों की पोल खोलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यूनुस सरकार कट्टरपंथियों की कठपुतली बनकर रह गई है। राजनीतिक या सामाजिक दबाव में ऐसे अपराधों को कम करके आंकना या चुप्पी साध लेना, स्थिति को और भयावह बनाता है। कहा जा रहा है कि फरवरी में चुनाव होने तक ऐसी घटनाएं वहां और बढ़ेंगी, तो क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय एवं मानवाधिकार संगठनों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे हस्तक्षेप करें और हिंदुओं की सुरक्षा के लिए सरकार पर दबाव बनाएं यह दबाव केवल बयानबाजी तक सीमित न रहे, बल्कि निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और पीड़ितों को न्याय सुनिश्चित कराने पर केंद्रित होना चाहिए। क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा अनिवार्य है। बांग्लादेशी समाज को भी अपनी सरकार को यह संदेश देना चाहिए कि वह नफरत, हिंसा और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर अंकुश लगाए। कानून का राज, संवेदनशील प्रशासन और सामाजिक एकजुटता ही ऐसे अपराधों पर स्थायी रोक लगा सकती है।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 07, 2026, 06:43 IST
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