जैसी करनी वैसी भरनी: ईरान में यहूदी-विरोधी राजनीति के खिलाफ जनविद्रोह
ईरान की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए जा रहे नारों में यह नारा खास है: न गाजा, न लेबनान, ईरान के लिए मेरी जान। यह सिर्फ वहां के शासन की विदेश नीति को नकारना नहीं है, बल्कि इस बात की याद दिलाता है कि यहूदी-विरोध की नीति अंततः यहूदी-विरोधी को ही खत्म कर देती है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से, इस शासन को यहूदियों से एक खास तरह की नफरत रही है। इस्राइल के प्रति गहरी नफरत उसी का नतीजा है। इस शासन का बुनियादी राजनीतिक ग्रंथ, अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी की यहूदियों का शासन, यहूदी-विरोध से भरा हुआ है। जैसे: शुरुआत से ही, इस्लाम के ऐतिहासिक आंदोलन को यहूदियों से निपटना पड़ा है, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले इस्लाम विरोधी दुष्प्रचार शुरू किया था। ईरान के मौजूदा नेता, अयातुल्ला अली खामनेई खुले तौर पर नरसंहार को नकारते हैं। हालांकि, ईरान आधिकारिक तौर पर अपने कम होते यहूदी समुदाय को बर्दाश्त करता है, पर ज्यादातर ईरानी यहूदी खतरनाक हालात में देश छोड़कर भाग गए हैं। ईरान की विदेश नीति स्वतंत्रतापूर्वक इस्राइल विरोधी भावनाओं को यहूदी विरोधी भावनाओं से मिलाती है। इसने हिज्बुल्लाह का समर्थन किया है, जिसने इस्राइल को खत्म करने की कसम खाई है, और चार दशकों में अरबों डॉलर खर्च किए हैं। इसने दूर से यहूदी विरोधी आतंकवादी हमलों का आदेश दिया है, जिसमें 1994 में ब्यूनस आयर्स में एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र पर बमबारी भी शामिल है, जिसमें 85 लोग मारे गए थे। इसने हमास को हथियार और प्रशिक्षण दिया, साथ ही यमन के हूतियों को बैलिस्टिक मिसाइलें भी दी हैं। इसने नरसंहार से इन्कार करने वालों का एक सम्मेलन और यहूदी विरोधी कार्टून प्रतियोगिताएं आयोजित करके बार-बार अंतरराष्ट्रीय नाराजगी मोल ली है। इस सरकार ने परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक चीजों को इकट्ठा करने में भी दशकों बिताए। इसका एक मकसद खुद को रोकना और आत्मरक्षा था। दूसरे मकसद का पता पूर्व राष्ट्रपति अयातुल्ला अली अकबर हाशमी रफसंजानी के 2001 के एक भाषण में किए गए इस डरावने लागत-लाभ विश्लेषण से चलता है- इस्राइल में एक परमाणु बम का इस्तेमाल करने से कुछ भी नहीं बचेगा, लेकिन इस्लामी दुनिया में सिर्फ नुकसान होगा। यह सब शायद तब समझ में आता, अगर ईरान और इस्राइल के बीच पुराने झगड़े या जमीनी विवाद होते। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। ईरान उन पहले मुस्लिम बहुल देशों में से था, जिसने इस्राइल को मान्यता दी थी, और जब शाह सत्ता में थे, तब यरूशलेम और तेहरान के बीच करीबी रिश्ते थे। एंटी-डिफेमेशन लीग द्वारा प्रकाशित सर्वे के अनुसार, आज भी आम ईरानी लोग दूसरे पश्चिम एशियाई देशों के लोगों की तुलना में यहूदियों के प्रति काफी कम नफरत रखते हैं। मौजूदा सरकार का यह जुनून पूरी तरह से इस्लामी विचारधारा का नतीजा है, न कि राष्ट्रीय हित का। यही उस सरकार विरोधी नारे की जड़ है। इस महीने की शुरुआत में, सरकार ने आसमान छूती महंगाई और गिरती मुद्रा के बीच अपने ज्यादातर नागरिकों को हर महीने सिर्फ सात डॉलर का भत्ता देकर प्रदर्शनकारियों को शांत करने की कोशिश की। फिर भी, उसी सरकार ने हिजबुल्ला को फिर से अपनी ताकत बनाने में मदद करने के लिए करीब एक अरब डॉलर भेजे, और अपने परमाणु कार्यक्रम पर खास रियायत देने से मना कर दिया, जिससे यूरोपीय प्रतिबंध लग गए तथा अर्थव्यवस्था और कमजोर हो गई। आम ईरानी सिर्फ आर्थिक कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ ही विद्रोह नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे एक ऐसे शासन के भी खिलाफ हैं, जो अपने लोगों को खाना खिलाने के बजाय यहूदी दुश्मन के खिलाफ लगातार जिहाद करना चाहता है। वर्षों तक, इस नीति की क्रूरता इसकी सफलता के पीछे छिपी रही, क्योंकि ईरानी प्रॉक्सी पूरे पश्चिम एशिया में मजबूत हो गए और यहूदी देश के चारों ओर आग का एक तथाकथित घेरा बना लिया। लेकिन सात अक्तूबर, 2023 के हमलों के बाद, इस्रराइल ने गाजा, बेरूत, दमिश्क, सना और आखिर में तेहरान में उस घेरे को सुनियोजित ढंग से खत्म कर दिया, जिसके आसमान पर जून में 12 दिन की लड़ाई के दौरान इस्राइली वायु सेना का दबदबा रहा। एक ही झटके में, इसने इस्राइल को खत्म करने की कोशिशों में लगे ईरान के दशकों के निवेश को मिट्टी और राख में मिला दिया। इसने ईरानी लोगों के सामने सरकार की सैन्य नाकामी और लाचारी को उजागर कर दिया और उन्हें याद दिलाया कि मुस्लिम देशों के लिए एक अलग रास्ता भी है-जैसे कि संयुक्त अरब अमीरात की तरह वे खुशहाल हो सकते हैं, इस्राइल के साथ शांति से रह सकते हैं, वह भी फारसी खाड़ी के ठीक दूसरी तरफ। सरकार की कमजोरी को देखते हुए ही जान-माल के बढ़ते नुकसान के बावजूद ईरान के लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। अब तक सरकार विरोधी प्रदर्शनों करीब 2,500 लोगों की जान जा चुकी है, जैसा कि खुद सरकार ने बताया है, हालांकि यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। ईरान के नेताओं को लगता है कि उनका शासन खत्म होने वाला है, इसीलिए वे विरोध प्रदर्शनों का जवाब क्रूरता और कूटनीतिक लचीलेपन से दे रहे हैं। हो सकता है कि यह कुछ समय के लिए काम कर जाए। लेकिन जब यह शासन खत्म होगा, जो देर-सबेर जरूर होगा, तो इसकी यहूदी विरोधी राजनीति इसकी बर्बादी में एक बड़ी भूमिका निभाएगी। यह देखते हुए कि खुमैनी और खामनेई का इरादा क्या था, यह एक ऐतिहासिक विरोधाभास है। यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी है : यहूदियों पर फारसियों का एहसान तब से है, जब साइरस महान ने 2,564 साल पहले बेबीलोन की गुलामी खत्म कर यहूदियों को सियोन वापस लौटाया था। ऐसे समय में, जब यहूदी विरोधी राजनीति को व्यापक समर्थन मिल रहा है, यह एक बड़ा सबक है। यहूदी विरोधी भावना कई कारणों से बुरी है, लेकिन यह मूर्खतापूर्ण भी है, क्योंकि यह भयानक साजिशों के सिद्धांत को बढ़ावा देती है; राष्ट्रीय नाकामियों के लिए जिम्मेदारी लेने के बजाय बलि का बकरा ढूंढती है; और एक मेहनती तथा पढ़े-लिखे अल्पसंख्यक समुदाय को बदनाम करती व दबाती है। जिन समाजों ने अपने यहूदी समुदायों को देश से निकाल दिया या उन पर अत्याचार किया, स्पेन से लेकर रूस और अरब दुनिया तक, वे सभी लंबे समय तक पतन के शिकार हुए। यही बात आज के ईरान के लिए भी सच है। ऐसा हमेशा नहीं रहना चाहिए। एक ऐसा शासन, जिसने यहूदियों पर अपनी ही बुराई थोपने की कोशिश की, उसे जल्द ही अपने किए की सजा मिल सकती है। और ईरानी लोग, जो एक व्यक्ति के तौर पर अपनी आजादी का फिर से दावा करते हैं, वे एक राष्ट्र के तौर पर अपनी समझदारी भी वापस पा सकते हैं। ©The New York Times 2026
#Opinion #National #Iran #DonaldTrump #Us #Anti-semitic #Gaza #Lebanon #VaranasiLiveNews
- Source: www.amarujala.com
- Published: Jan 15, 2026, 07:11 IST
जैसी करनी वैसी भरनी: ईरान में यहूदी-विरोधी राजनीति के खिलाफ जनविद्रोह #Opinion #National #Iran #DonaldTrump #Us #Anti-semitic #Gaza #Lebanon #VaranasiLiveNews
