चुनाव और शंकाएं: म्यांमार में चुनाव, क्या वाकई यह लोकतंत्र की बहाली का प्रयास?
म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद पहली बार राष्ट्रीय चुनावों की प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसे लेकर सैन्य जुंटा प्रमुख भले ही उत्साहित हों, और इसे बहुदलीय लोकतंत्र की वापसी का प्रतीक भी बता रहे हों, लेकिन इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय और वहां के लोकतंत्र समर्थक जो आशंकाएं जता रहे हैं, वे निर्मूल नहीं हैं। गौरतलब है कि म्यांमार ने 1948 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कई दौर देखे। 1962 में लोकतांत्रिक सरकार की जगह सैन्य शासन स्थापित हो गया। 2011 में एक बड़ा बदलाव आया, जब सेना ने धीरे-धीरे सैन्य-प्रभुत्व वाली नागरिक संसद के गठन की अनुमति दी। इससे नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की नेता आंग सान सू की के लिए राजनीतिक नेतृत्व की प्रमुख दावेदार के रूप में उभरने का मार्ग प्रशस्त हुआ। 2015 में आम चुनाव हुए, जिनमें एनएलडी ने आसानी से जीत हासिल की। फिर 2020 के चुनाव में भी नतीजों ने खुद को दोहराया, लेकिन सेना ने 2021 के तख्तापलट को सही ठहराने के लिए आरोप लगाया कि चुनावों में धांधली की गई थी। सेना ने सत्ता हथिया ली, सू की और उनके साथियों को कैद कर लिया गया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का क्रूर दमन हुआ, जिसने पूरे देश में सशस्त्र प्रतिरोध को जन्म दिया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक हजारों नागरिक मारे जा चुके हैं, लाखों विस्थापित हुए हैं और देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है। 2025 में आए भूकंप ने स्थितियों को बदतर ही बनाया है। म्यांमार के घटनाक्रम पूर्वोत्तर भारत को सीधे प्रभावित करते हैं। हिंसा से भागकर शरणार्थी मिजोरम, मणिपुर और नगालैंड जैसे सीमावर्ती राज्यों में पहुंचते हैं और स्थानीय जनसांख्यिकी पर असर डालते हैं। इसके अतिरिक्त अवैध मादक पदार्थों की तस्करी तो एक पुराना मुद्दा है ही। म्यांमार के साथ लंबी सीमा साझा करने वाला चीन सिर्फ अपने ही हित देख रहा है, जिसने जुंटा और सशस्त्र संगठनों, दोनों से संबंध बनाए रखने की नीति अपनाई है। अब जो चुनाव शुरू हुए हैं, उनमें स्थिति यह है कि म्यांमार के वे राजनीतिक दल, जिन्होंने 2020 में 90 फीसदी सीटें जीती थीं, आज मैदान में ही नहीं हैं। इसके अलावा, देश के एक-तिहाई हिस्से में, जहां विद्रोही समूह सक्रिय हैं, मतदान ही नहीं होगा। एक पड़ोसी के रूप में भारत की नीति यही रही है कि म्यांमार की समस्याओं का समाधान खुद वहां के लोग करें, पर इसके लिए जरूरी है कि चुनावों की सिर्फ औपचारिकता न पूरी की जाए, बल्कि ये वास्तविक संवाद और समावेशन का माध्यम बनें। दुर्भाग्यवश फिलहाल वैसा होता दिख नहीं रहा।
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- Source: www.amarujala.com
- Published: Dec 29, 2025, 07:40 IST
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