जब एंटीबायोटिक बेअसर होने लगे: सुपरबग्स का गंभीर संकट, फार्मेसियों की निगरानी की जरूरत

पेनिसिलिन की खोज, और उसके बाद इलाज में दूसरे एंटीबायोटिक्स के आने से चिकित्सा विज्ञान में क्रांति आ गई और इसे बीसवीं सदी की सबसे बड़ी चिकित्सकीय सफलता माना जाता है। एंटीबायोटिक्स ने जानलेवा बीमारियों को ठीक होने वाली बीमारियों में बदल दिया और आधुनिक दवाइयों को संभव बनाया। अनुमान है कि अकेले एंटीबायोटिक्स ने इन्सानों की औसत जीवन प्रत्याशा को लगभग 23 साल बढ़ा दिया है। फिर भी, 1928 में पेनिसिलिन की खोज के सौ साल से भी कम समय में, एक नया और गंभीर संकट सामने आया है। बैक्टीरिया उपलब्ध एंटीबायोटिक्स के प्रति तेजी से प्रतिरोधी होते जा रहे हैं। जो दवाएं कुछ दशक पहले बहुत असरदार थीं, वे आज अक्सर उन्हीं संक्रमण का इलाज करने में नाकाम रहती हैं। इस घटना को एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (रोगाणुरोधी प्रतिरोध), या एएमआर के नाम से जाना जाता है। इसकी गंभीरता को समझते हुए, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एएमआर को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए शीर्ष दस वैश्विक खतरों में से एक बताया है। रोगाणुरोधी प्रतिरोध बढ़ने से तथाकथित सुपरबग्स सामने आए हैं-ये ऐसे बैक्टीरिया हैं, जिन पर आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक्स का असर नहीं होता। जब एंटीबायोटिक्स काम करना बंद कर देती हैं, तो मामूली संक्रमण का इलाज भी मुश्किल या कभी-कभी नामुमकिन हो जाता है। सर्जरी, कीमोथेरेपी या समय से पहले पैदा हुए बच्चों की देखभाल जैसी रोजाना की चिकित्सकीय प्रक्रियाएं बहुत ज्यादा जोखिम भरी हो जाती हैं। अस्पताल में भर्ती रहने का समय व इलाज का खर्च बढ़ जाता है, और स्वास्थ्य प्रणाली एवं परिवारों पर बोझ बढ़ जाता है। इस संकट का सबसे बड़ा कारण एंटीबायोटिक्स का बड़े पैमाने पर और गलत इस्तेमाल है। भारत में, एंटीबायोटिक्स अक्सर वायरल बीमारियों, जैसे कि सामान्य सर्दी, खांसी, या मौसमी बुखार के लिए ली जाती हैं, जिन पर इन दवाओं का कोई असर नहीं होता है। कई लोग केमिस्ट, पड़ोसियों की सलाह पर एंटीबायोटिक्स लेना शुरू कर देते हैं या बची हुई दवाइयों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे हर गलत इस्तेमाल से बैक्टीरिया को खुद को ढालने, जिंदा रहने और मजबूत बनने का मौका मिलता है। यहां तक कि कभी-कभी डॉक्टर भी नैदानिक अनिश्चितता, मरीजों के दबाव या जटिलताओं के डर से बेवजह एंटीबायोटिक्स सुझाते हैं। एक और कारण जानवरों और खेती में एंटीबायोटिक्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल है। जानवरों में जो प्रतिरोधी बैक्टीरिया विकसित होते हैं, और एंटीबायोटिक्स के कुछ अंश, वे सिर्फ पशुशाला तक ही सीमित नहीं रहत, बल्कि वे भोजन, पानी और पर्यावरण के जरिये इन्सानों में भी फैलते हैं। खराब कचरा प्रबंधन इसे और भी बदतर बना देता है। एंटीबायोटिक के अवशेष और प्रतिरोधी रोगाणु नदियों, मिट्टी व भूजल में मिल जाते हैं, और अंततः खाद्य शृंखला में पहुंच जाते हैं। रोगाणुरोधी प्रतिरोध के आर्थिक और सामाजिक नतीजे बहुत गंभीर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि अगर मौजूदा प्रवृत्ति निर्बाध जारी रही, तो 2050 तक रोगाणुरोधी प्रतिरोध हर साल दुनिया भर में एक करोड़ लोगों की जान ले सकता है। अकेले भारत में अनुमान है कि, 2021 में लगभग 2.6 लाख मौतें ऐसे संक्रमण से जुड़ी थीं, जिनमें इस्तेमाल की गई एंटीबायोटिक्स प्रतिरोध के कारण बेअसर थीं। इस चुनौती का असर मध्य और निम्न आय वर्ग पर ज्यादा बुरा होता है। भारत में प्रतिरोधी संक्रमण की वजह से अक्सर बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है, बीमारी लंबे समय तक चलती है, वेतन का नुकसान होता है, और चिकित्सा खर्च बहुत अधिक हो जाता है। इसलिए, रोगाणुरोधी प्रतिरोध सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर परिवारों और उनकी आजीविका के लिए खतरा है। दुनिया भर के देश इस खतरे की गंभीरता को पहचानने लगे हैं। कई उच्च आय वाले देशों ने प्रतिरोधी पैटर्न का पता लगाने के लिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर सख्त नियम लागू किए हैं, और नई दवाएं तथा वैकल्पिक उपचार विकसित करने के लिए शोध में भारी निवेश किया है। भारत ने भी नीतिगत स्तर पर कदम उठाए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। एंटीबायोटिक्स सिर्फ वैध नुस्खे पर ही बेचे जाने चाहिए, और फार्मेसियों की निरंतर निगरानी के साथ उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। नए एंटीबायोटिक्स के शोध और विकास के लिए तुरंत ज्यादा निवेश की जरूरत है। लेकिन सिर्फ नीतियों से काम नहीं चलेगा, इसके लिए लोगों में जागरूकता और जिम्मेदार व्यवहार भी जरूरी है। हरेक नागरिक को हाथ साफ रखकर, स्वच्छ पीने का पानी, टीकाकरण और अच्छे पोषण से संक्रमण को रोकने का प्रयास करना चाहिए, तभी एंटीबायोटिक्स की जरूरत को कम किया जा सकता है। एंटीबायोटिक्स कभी भी डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेनी चाहिए, न ही किसी से साझा करनी चाहिए, और न ही बिना चिकित्सकीय सलाह के इस्तेमाल करनी चाहिए। एंटीबायोटिक्स को बिना डॉक्टर की सलाह के बंद या उनमें कोई बदलाव नहीं करना चाहिए, और संपूर्ण कोर्स पूरा करना चाहिए। पिछली बीमारियों के लिए बताई गई दवाइयों का इस्तेमाल वैसे ही लक्षणों के लिए दोबारा नहीं करना चाहिए, क्योंकि कारण अलग हो सकता है। बैक्टीरिया और वायरस से होने वाले संक्रमण के लक्षण एक जैसे हो सकते हैं, पर वायरस से होने वाले संक्रमण को रोकने में एंटीबायोटिक्स कारगर नहीं होती, क्योंकि वे सिर्फ बैक्टीरिया के खिलाफ असरदार होती हैं। एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल दवाओं का ज्यादा और कम इस्तेमाल, दोनों ही प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। ध्यान रहे कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध कोई नई बात नहीं है। प्रतिरोध रोगजनकों का प्राकृतिक रूप से जीवित रहने का तंत्र है। जो बात नई और चिंताजनक है, वह यह है कि प्रतिरोध कुछ वर्षों से तेजी से फैल रहा है, जिसका मुख्य कारण इन्सानों द्वारा एंटीबायोटिक्स का गलत तरीके से इस्तेमाल करना है, यानी यह संकट टाला या रोका जा सकता है। जहां दुनिया को तुरंत नई एंटीबायोटिक्स चाहिए, वहीं उसे मौजूदा एंटीबायोटिक्स का समझदारी से इस्तेमाल करने की जरूरत है। आज लक्ष्य केवल संक्रमण का इलाज करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी पक्का करना चाहिए कि ये जीवन बचाने वाली दवाएं हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी असरदार बनी रहें। हम अभी जो फैसले लेंगे, उनसे यह तय होगा कि एंटीबायोटिक्स इन्सानियत की सबसे बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धियों में से एक बनी रहेंगी या एक खोया हुआ चमत्कार बन जाएंगी।

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  • Source: www.amarujala.com
  • Published: Jan 08, 2026, 07:34 IST
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